कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 11 स्थानानुसारं वर्णाः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
‘कण्ठ्याः वर्णाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वर्णाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लिखत। (पृष्ठ १५४, १५५)
उत्तर

उत्तरम् — कण्ठ्यानां वर्णानां स्थानम् — कण्ठः (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः) तथा करणम् अपि कण्ठः (कण्ठस्य अग्र-भागः) — अर्थात् अत्र ‘स्वस्थानम् एव करणम्’।

वर्ण-भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःउदाहरण-शब्दः
अ-स्वरःअसंवृत-प्रयत्नःअश्वः, अयम्
शेष-समानाक्षराणिआ · अ३विवृत-प्रयत्नःआकाशः · ‘हे राम३’ (प्लुतः)
सन्ध्यक्षराणिए ए३ · ऐ ऐ३ · ओ ओ३ · औ औ३विवृत-प्रयत्नःएकः · ऐक्यम् · ओष्ठः · औषधम्
स्पर्शाःक ख ग घ · ङस्पृष्ट-प्रयत्नःकमलम्, खगः, गजः, घटः, वाङ्मयम्
अन्तःस्थाः——कण्ठ-स्थाने कोऽपि अन्तःस्थ-वर्णः नास्ति
ऊष्माणःहईषद्-विवृत-प्रयत्नःहंसः, हरिः
अयोगवाहौअः (विसर्गः)ईषद्-विवृत-प्रयत्नःरामः, बालकः
चित्र क्या दिखाता है: पुस्तक कण्ठ्य वर्णों के लिए दो आवर्धित चित्र देती है। पहले चित्र में (‘अ’ के लिए) कण्ठ के भीतर दोनों भाग पास-पास दिखाए गए हैं और बीच में लहरदार रेखाएँ हैं — यही संकोच है। दूसरे चित्र में (आ, ए, ऐ, ओ, औ के लिए) वही कण्ठ खुला दिखाया गया है — यही ‘स्फुटः विवरः’ है। एक ही स्थान, एक ही करण — केवल खुलाव अलग, इसलिए वर्ण अलग।
कण्ठ्य वर्णों की विशेषता: यही एक ऐसा स्थान है जहाँ पाँचों में से चार प्रयत्न मिल जाते हैं — संवृत (अ), विवृत (आ, ए…), स्पृष्ट (क-वर्ग) और ईषद्-विवृत (ह, विसर्ग)। केवल ईषत्-स्पृष्ट यहाँ नहीं मिलता, क्योंकि कोई कण्ठ्य अन्तःस्थ वर्ण है ही नहीं।
प्र2.
‘तालव्याः वर्णाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वर्णाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लिखत। (पृष्ठ १५४, १५५)
उत्तर

उत्तरम् — तालव्यानां वर्णानां स्थानम् — तालु तथा करणम् — जिह्वा (विशेषतः जिह्वा-मध्यः)।

वर्ण-भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःउदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः——अ-वर्णः कण्ठ्यः एव, न तालव्यः
शेष-समानाक्षराणिइ · ई · इ३विवृत-प्रयत्नःइन्द्रः · ईशः
सन्ध्यक्षराणिए ए३ · ऐ ऐ३विवृत-प्रयत्नःएकः · ऐश्वर्यम् (कण्ठतालव्यौ)
स्पर्शाःच छ ज झ · ञस्पृष्ट-प्रयत्नःचन्द्रः, छत्रम्, जलम्, झङ्कारः, याञ्चा
अन्तःस्थाःयईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःयमुना, यज्ञः
ऊष्माणःशईषद्-विवृत-प्रयत्नःशिवः, शान्तिः
अयोगवाहौ——तालु-स्थाने अयोगवाहः नास्ति
इ · य् · श् — एक ही परिवार: तीनों का स्थान तालु और करण जिह्वा-मध्य है; अन्तर केवल प्रयत्न का है — इ (विवृत) → य् (ईषत्-स्पृष्ट) → श् (ईषद्-विवृत)। ‘इ’ को धीरे-धीरे सँकरा करते जाइए तो पहले ‘य्’ जैसा और फिर ‘श्’ जैसा सुनाई देने लगेगा। सन्धि का नियम ‘इ + अ = य’ (इको यणचि) इसी सम्बन्ध की व्याकरणिक स्वीकृति है।
ए और ऐ यहाँ भी क्यों: क्योंकि ये द्वि-स्थानी हैं — कण्ठ भी और तालु भी। इसलिए पृष्ठ १५४ की सारणी में ये कण्ठ्य पंक्ति में भी हैं और तालव्य पंक्ति में भी। इन्हें ‘कण्ठतालव्यौ’ कहा जाता है।
प्र3.
‘मूर्धन्याः वर्णाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वर्णाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लिखत। (पृष्ठ १५४, १५५)
उत्तर

उत्तरम् — मूर्धन्यानां वर्णानां स्थानम् — मूर्धा तथा करणम् — जिह्वा (विशेषतः जिह्वा-उपाग्रः)।

वर्ण-भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःउदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः———
शेष-समानाक्षराणिऋ · ॠ · ऋ३विवृत-प्रयत्नःऋषिः, ऋतुः
सन्ध्यक्षराणि——कोऽपि सन्ध्यक्षरः मूर्धन्यः नास्ति
स्पर्शाःट ठ ड ढ · णस्पृष्ट-प्रयत्नःटङ्कः, ठक्कुरः, डमरुः, मूढः, गुणः
अन्तःस्थाःरईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःरविः, रामः
ऊष्माणःषईषद्-विवृत-प्रयत्नःषट्, भाषा
अयोगवाहौ———
पुस्तक ने सारे उदाहरण-चित्र मूर्धन्य वर्णों के ही क्यों दिए: पृष्ठ १४६–१४७ पर चारों प्रयत्नों के नीचे हर बार ‘उदाहरणम् — मूर्धन्याः वर्णाः’ लिखा है। कारण सीधा है — मूर्धन्य वर्णों में जीभ पीछे की ओर मुड़कर ऊपर जाती है, इसलिए स्पर्श, अल्प-स्पर्श, छोटा अन्तराल और बड़ा अन्तराल — चारों अवस्थाएँ चित्र में सबसे स्पष्ट दिखती हैं। ऋ · र् · ष् · ट् — चारों को क्रम से बोलिए, जीभ की नोक एक ही जगह के आस-पास रहेगी, केवल उसका पास आना-दूर जाना बदलेगा।
ऋ की एक और खूबी: ‘ऋ’ स्वर है, पर उसका सम्बन्धी व्यञ्जन ‘र्’ है — इसीलिए ‘पितृ + आदेशः = पित्रादेशः’ में ऋ का र् हो जाता है (यण् सन्धि)। दोनों का स्थान मूर्धा है; अन्तर केवल प्रयत्न का — ऋ में विवृत, र् में ईषत्-स्पृष्ट।
प्र4.
‘दन्त्याः वर्णाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वर्णाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लिखत। (पृष्ठ १५६, १५७)
उत्तर

उत्तरम् — दन्त्यानां वर्णानां स्थानम् — दन्तः तथा करणम् — जिह्वा (विशेषतः जिह्वा-अग्रः)।

वर्ण-भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःउदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः———
शेष-समानाक्षराणिऌ · ऌ३विवृत-प्रयत्नःऌकारः (‘ऌ-वर्णस्य दीर्घा न सन्ति’)
सन्ध्यक्षराणि——कोऽपि सन्ध्यक्षरः दन्त्यः नास्ति
स्पर्शाःत थ द ध · नस्पृष्ट-प्रयत्नःतरुः, रथः, दन्तः, धनम्, नदी
अन्तःस्थाःल · वईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःलता, वनम्
ऊष्माणःसईषद्-विवृत-प्रयत्नःसत्यम्, सरः
अयोगवाहौ———
‘व’ दन्त्य पंक्ति में क्यों है: पृष्ठ १५७ की सारणी में ‘व’ दन्त्य पंक्ति में भी है और ओष्ठ्य पंक्ति में भी। कारण यह कि ‘व’ बोलते समय जिह्वा-अग्र दाँतों के पास जाता है और साथ ही अधरोष्ठ ऊपर के दाँतों के पास आता है — दोनों एक साथ। इसीलिए ‘व’ को दन्त्योष्ठ्यः कहते हैं और वह अकेला द्वि-स्थानी व्यञ्जन है।
त-वर्ग और ट-वर्ग का अन्तर: ‘त’ में जीभ की नोक दाँतों के मूल पर लगती है; ‘ट’ में जीभ मुड़कर उपाग्र से मूर्धा को छूती है। हिन्दी बोलने वाले प्रायः ‘त’ को दन्त्य ही बोलते हैं, पर अंग्रेज़ी का ‘t’ मूर्धन्य के पास पड़ता है — इसी कारण अंग्रेज़ी-अभ्यस्त विद्यार्थी संस्कृत के ‘त’ को अशुद्ध बोल जाते हैं। इसी अशुद्धि से बचाना इस पाठ का उद्देश्य है।
प्र5.
‘ओष्ठ्याः वर्णाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वर्णाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लिखत। (पृष्ठ १५६, १५७)
उत्तर

उत्तरम् — ओष्ठ्यानां वर्णानां स्थानम् — ओष्ठः तथा करणम् अपि ओष्ठः — अत्र अपि ‘स्वस्थानम् एव करणम्’ (उत्तरोष्ठः स्थानम्, अधरोष्ठः करणम्)।

वर्ण-भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःउदाहरण-शब्दः
अ-स्वरः———
शेष-समानाक्षराणिउ · ऊ · उ३विवृत-प्रयत्नःउदयः · ऊर्जा
सन्ध्यक्षराणिओ ओ३ · औ औ३विवृत-प्रयत्नःओदनम् · औषधम् (कण्ठौष्ठ्यौ)
स्पर्शाःप फ ब भ · मस्पृष्ट-प्रयत्नःपुष्पम्, फलम्, बालकः, भानुः, माता
अन्तःस्थाःवईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःविद्या, वायुः
ऊष्माणः——ओष्ठ-स्थाने ऊष्म-वर्णः नास्ति
अयोगवाहौ———
दर्पण के सामने परखिए: ओष्ठ्य ही एकमात्र ऐसा वर्ग है जिसे आप आँखों से देख सकते हैं। ‘प’ बोलिए — दोनों होंठ पूरी तरह मिलते हैं (स्पृष्ट)। ‘व’ बोलिए — नीचे का होंठ ऊपर के दाँतों को हल्के से छूता है (ईषत्-स्पृष्ट)। ‘उ’ बोलिए — होंठ गोल होकर आगे बढ़ते हैं पर मिलते नहीं (विवृत)। एक ही स्थान पर तीन प्रयत्न — पूरा पाठ आईने में दिख जाएगा।
ओ और औ यहाँ क्यों: क्योंकि ये कण्ठौष्ठ्य हैं — इनका एक स्थान कण्ठ है और दूसरा ओष्ठ। ‘ओ’ = अ (कण्ठ्य) + उ (ओष्ठ्य) की सन्धि से बना है, इसीलिए दोनों स्थान इसमें बने रहते हैं।
प्र6.
‘नासिक्याः वर्णाः’ — तेषां स्थानं, करणम्, वर्णाः तथा आभ्यन्तर-प्रयत्नाः लिखत। (पृष्ठ १५६, १५७)
उत्तर

उत्तरम् — नासिक्यानां वर्णानां स्थानम् — नासिका तथा करणम् अपि नासिका — अत्र अपि ‘स्वस्थानम् एव करणम्’।

वर्ण-भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःउदाहरण-शब्दः
स्वराः (अ-स्वरः, समानाक्षराणि, सन्ध्यक्षराणि)——कोऽपि शुद्धः स्वरः नासिक्यः न गण्यते
स्पर्शाः (पञ्चमाः वर्णाः)ङ · ञ · ण · न · मस्पृष्ट-प्रयत्नःवाङ्मयम्, याञ्चा, गुणः, नदी, माता
अन्तःस्थाः———
ऊष्माणः———
अयोगवाहौअं (अनुस्वारः)ईषद्-विवृत-प्रयत्नःसंस्कृतम्, अंशः
पाँचवें वर्ण दो जगह क्यों गिने जाते हैं: ङ, ञ, ण, न, म — ये अपने-अपने वर्ग के भी हैं (कण्ठ्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य, ओष्ठ्य) और नासिक्य भी। कारण यह कि इनका उच्चारण करते समय मुख में तो अपने वर्ग का स्पर्श होता ही है, साथ ही वायु नाक से भी निकलती है। इसीलिए इन्हें ‘अनुनासिक व्यञ्जन’ कहते हैं। नाक बन्द करके ‘म’ बोलने की कोशिश कीजिए — ‘ब’ जैसा सुनाई देगा; यही प्रमाण है।
नासिक्य पंक्ति में स्वर क्यों नहीं: क्योंकि पाठ केवल शुद्ध (निरनुनासिक) स्वर गिनता है — यह बात पृष्ठ १५२ की तारांकित टिप्पणी में कही जा चुकी है। अनुनासिक स्वर (अँ, आँ) होते तो हैं, पर इस गणना में शामिल नहीं।
प्र7.
पृष्ठ १५४–१५७ की चारों सारणियों का सार एक ही सारणी में लिखिए — कस्मिन् स्थाने कति वर्णाः, तेषां करणं प्रयत्नाः च।
उत्तर

उत्तरम् — षट्सु स्थानेषु समग्रं वर्ण-विभाजनम् —

स्थानम्करणम्स्वराः (विवृतः / संवृतः)स्पर्शाः (स्पृष्टः)अन्तःस्थाः (ईषत्-स्पृष्टः)ऊष्माणः + अयोगवाहौ (ईषद्-विवृतः)
कण्ठःकण्ठः — स्वस्थानम्अ (संवृतः) · आ अ३ · ए ए३ ऐ ऐ३ ओ ओ३ औ औ३क ख ग घ ङ—ह · अः
तालुजिह्वा-मध्यःइ ई इ३ · ए ए३ ऐ ऐ३च छ ज झ ञयश
मूर्धाजिह्वा-उपाग्रःऋ ॠ ऋ३ट ठ ड ढ णरष
दन्तःजिह्वा-अग्रःऌ ऌ३त थ द ध नल · वस
ओष्ठःओष्ठः — स्वस्थानम्उ ऊ उ३ · ओ ओ३ औ औ३प फ ब भ मव—
नासिकानासिका — स्वस्थानम्—ङ ञ ण न म—अं

द्वि-स्थानी वर्णाः (जो दो पंक्तियों में आते हैं) —

वर्णाःद्वे स्थानेसंज्ञा
ए · ऐकण्ठः + तालुकण्ठतालव्यौ
ओ · औकण्ठः + ओष्ठःकण्ठौष्ठ्यौ
वदन्तः + ओष्ठःदन्त्योष्ठ्यः
ङ · ञ · ण · न · मस्ववर्गस्य स्थानम् + नासिकाअनुनासिकाः (पञ्चमाः वर्णाः)
सारणी को दो दिशाओं में पढ़िए: पंक्ति-वार पढ़ने पर पता चलता है कि एक ही स्थान से कितने भिन्न वर्ण निकलते हैं — केवल प्रयत्न बदलने से। स्तम्भ-वार पढ़ने पर पता चलता है कि एक ही प्रयत्न छहों स्थानों पर लगकर छह अलग वर्ण बना देता है। स्थान × प्रयत्न = वर्ण — यही पूरे पाठ का सूत्र है, और अभ्यास का प्रश्न ६ (वर्णसमुच्चय) सीधे इसी सारणी से हल हो जाता है।
एक पंक्ति खाली क्यों दिखती है: हर खाना भरा हुआ नहीं है — कण्ठ में कोई अन्तःस्थ नहीं, मूर्धा-दन्त-ओष्ठ में कोई सन्ध्यक्षर नहीं, ओष्ठ में कोई ऊष्म नहीं। ये खाली खाने भूल नहीं, तथ्य हैं : संस्कृत की वर्णमाला में उन जगहों पर कोई वर्ण बना ही नहीं। पुस्तक ने भी वहाँ ‘—’ चिह्न ही छापा है।
क्या यह उपयोगी रहा?