शारदा अध्याय 11 स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम्’ इति सूत्र-समूहः अत्र किमर्थं दीयते ? पूर्वकक्षयोः ‘स्थान-प्रकरणेन’ ‘करण-प्रकरणेन’ च सह अस्य कः सम्बन्धः ? नव सूत्राणि क्रमेण लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — यत् पाठे चित्रैः पेटिकाभिः च बोधितम्, तदेव अत्र पाणिनीय-शिक्षायाः मूल-सूत्र-रूपेण दीयते, येन छात्रः परिभाषां शास्त्र-वाक्यं च संयोज्य पश्येत्। षष्ठ-कक्षायां ‘स्थान-प्रकरणम्’, अष्टम-कक्षायां ‘करण-प्रकरणम्’ पठितम्; अधुना नवम-कक्षायाम् ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम्’।

पाणिनीय-शिक्षा के तीन प्रकरण, तीन कक्षाएँ —

प्रकरणम्कक्षा / पुस्तकक्या बताता है
स्थान-प्रकरणम्कक्षा ६कौन-सा वर्ण मुँह के किस स्थान से निकलता है
करण-प्रकरणम्कक्षा ८ — दीपकम्उस स्थान को कौन-सा करण छूता है (जिह्वा-मध्य/उपाग्र/अग्र, स्वस्थान)
आभ्यन्तर-प्रयत्न-प्रकरणम्कक्षा ९ — शारदा (यही पाठ)करण उस स्थान तक किस प्रयत्न से जाता है

नव सूत्राणि क्रमेण —

१. प्रयत्नोऽपि द्विविधः।
२. आभ्यन्तरो बाह्यश्च।
३. स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्।
४. स्पृष्ट–करणाः – स्पर्शाः।
५. ईषत्-स्पृष्ट–करणा – अन्तस्थाः।
६. ईषद्-विवृत–करणा – ऊष्माणः।
७. विवृत–करणाः – स्वराः।
८. संवृतस्त्वकारः।
९. इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः।
सूत्र-शैली की खूबी: नौ सूत्रों में पूरा प्रकरण समा गया है। पहले दो सूत्र विभाजन करते हैं (प्रयत्न दो प्रकार का), तीसरा विषय-प्रवेश कराता है (अभी आभ्यन्तर की बात), बीच के पाँच सूत्र नियम देते हैं (कौन-सा प्रयत्न कौन-से वर्ण बनाता है), और अन्तिम सूत्र उपसंहार करता है। आरम्भ-सूचक और समापन-सूचक सूत्र — यही शास्त्र-ग्रन्थों की पहचान है; कक्षा ८ में ‘करणम् अपि’ और ‘इत्येतत् करणम्’ ठीक यही काम कर रहे थे।
ध्यान दीजिए — नियम-सूत्रों में उलटा क्रम है: पाठ में क्रम था ‘प्रयत्न → कौन-से वर्ण’; सूत्रों में क्रम है ‘कौन-से करण वाले → वे ही वर्ण’ (स्पृष्ट-करणाः = स्पर्शाः)। अर्थात् सूत्र वर्ण की परिभाषा ही प्रयत्न से कर देते हैं — ‘स्पर्श वे हैं जिनका करण स्पृष्ट हो’। इसीलिए ये सूत्र केवल वर्णन नहीं, परिभाषा हैं।
प्र2.
सूत्रम् — ‘प्रयत्नोऽपि द्विविधः।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — (वर्णोच्चारणार्थं) ‘प्रयत्नः’ द्विप्रकारकः भवति। (वर्णोच्चारण के लिए किया जाने वाला ‘प्रयत्न’ दो प्रकार का होता है।)

‘अपि’ क्यों: ‘अपि’ का अर्थ है ‘भी’। स्थान भी अनेक थे, करण भी अनेक थे — अब कहा जा रहा है कि प्रयत्न भी एक ही प्रकार का नहीं। यह सूत्र नए प्रकरण का द्वार खोलता है, ठीक वैसे ही जैसे कक्षा ८ में ‘करणम् अपि।’ ने खोला था।
सन्धि: ‘प्रयत्नः + अपि’ में विसर्ग के पहले ‘अ’ और बाद में भी ‘अ’ है, अतः विसर्ग-सन्धि (पूर्वरूप) से ‘प्रयत्नोऽपि’ बना — विसर्ग का ‘ओ’ हुआ और आगे का ‘अ’ लुप्त होकर अवग्रह (ऽ) से दिखाया गया। यही नियम ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’ में भी लगा है।
प्र3.
सूत्रम् — ‘आभ्यन्तरो बाह्यश्च।’ अस्य अर्थः कः ? ‘बाह्य-प्रयत्नः’ इति किम् ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ ‘बाह्य-प्रयत्नः’ च इति (एतौ द्वौ प्रकारौ भवतः)। (प्रयत्न के दो प्रकार हैं — आभ्यन्तर-प्रयत्न तथा बाह्य-प्रयत्न।)

प्रयत्न-प्रकारःकुत्र भवतिअस्मिन् पाठे
आभ्यन्तर-प्रयत्नःआस्यस्य अभ्यन्तरे — करणस्य स्थानं प्रति गतिःविस्तरेण चर्चितः — पञ्चविधः
बाह्य-प्रयत्नःआस्यात् बहिः — वायोः निर्गमने, नादे, घोषे च यः प्रयत्नःकेवलं नाम उक्तम्, विवेचनं न कृतम्
पाठ यहीं रुक जाता है — और यह जान-बूझकर है: पाठ का अन्तिम सूत्र ही कहता है ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’ — यहाँ तक केवल आभ्यन्तर-प्रयत्न की चर्चा हुई। बाह्य-प्रयत्न (जिसमें अल्पप्राण-महाप्राण, घोष-अघोष, संवार-विवार जैसे भेद आते हैं) आगे के अध्ययन के लिए छोड़ दिया गया है। ठीक वैसे ही जैसे कक्षा ८ ने आभ्यन्तर-प्रयत्न को इस कक्षा के लिए छोड़ा था।
सन्धि: ‘बाह्यः + च’ में विसर्ग के बाद ‘च्’ आने पर विसर्ग ‘श्’ हो गया — विसर्ग-सन्धि (श्चुत्व) — अतः ‘बाह्यश्च’। यही नियम ‘रामः + च = रामश्च’ में भी है।
प्र4.
सूत्रम् — ‘स्वस्थाने आभ्यन्तरस्तावत्।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — वर्णस्य स्वकीयं स्थानं प्रति (करणस्य) यः प्रयत्नः, सः → ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ भवति; तद् अधुना जानीमः।

(हिन्दी — वर्ण के अपने स्थान की ओर करण का जो प्रयत्न होता है, वही ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ है — अब हम उसे जानते हैं।)

यह सूत्र वही परिभाषा है जो पृष्ठ १४६ पर दी गई थी: ‘आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति…’। सूत्र इसे चार शब्दों में कह देता है — स्वस्थाने (अपने स्थान की ओर), आभ्यन्तरः (यही आभ्यन्तर है), तावत् (फ़िलहाल, पहले)। ‘तावत्’ शब्द विशेष है — इसका अर्थ है ‘पहले यह, फिर आगे और’। अर्थात् सूत्रकार स्वयं संकेत दे रहा है कि बाह्य-प्रयत्न बाद में आएगा।
सन्धि: ‘आभ्यन्तरः + तावत्’ में विसर्ग के बाद ‘त्’ (खर्) आने पर विसर्ग ‘स्’ हो गया — विसर्ग-सन्धि (सत्व) — अतः ‘आभ्यन्तरस्तावत्’।
प्र5.
सूत्रम् — ‘स्पृष्ट–करणाः – स्पर्शाः।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — स्पर्शानां वर्णानाम् उच्चारणे, करणं → ‘स्पृष्ट-प्रयत्नेन’ स्थानं (स्पष्टरूपेण) स्पृशति।

(हिन्दी — स्पर्श वर्णों के उच्चारण में करण ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ से स्थान को स्पष्ट रूप से छूता है।)

वे वर्ण — क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ म — कुल २५

सूत्र वस्तुतः परिभाषा है: इसका शब्दशः अर्थ है — ‘जिनके करण स्पृष्ट हों, वे स्पर्श कहलाते हैं’। अर्थात् ‘स्पर्श’ नाम कोई मनमानी संज्ञा नहीं; वह उनके उच्चारण-प्रयत्न से ही निकला है। नाम में ही परिभाषा छिपी है — यही पाणिनीय शैली की सुन्दरता है।
व्याकरण: ‘स्पृष्ट-करणाः’ बहुव्रीहि समास है — ‘स्पृष्टं करणं येषां ते’ (जिनका करण स्पृष्ट हो, वे)। ‘स्पर्शाः’ प्रथमा बहुवचन में विधेय है। बहुव्रीहि इसीलिए, क्योंकि समस्त पद स्वयं करण की नहीं, वर्णों की बात कर रहा है।
प्र6.
सूत्रम् — ‘ईषत्-स्पृष्ट–करणा – अन्तस्थाः।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अन्तःस्थानां वर्णानाम् उच्चारणे, करणम् → ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन’ स्थानं (स्वल्पं) स्पृशति।

(हिन्दी — अन्तःस्थ वर्णों के उच्चारण में करण ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ से स्थान को थोड़ा-सा ही छूता है।)

वे वर्ण — य · र · ल · व — कुल ४

‘ईषत्’ ही पूरा अन्तर है: पिछले सूत्र और इस सूत्र में केवल एक शब्द का अन्तर है — ‘ईषत्’। स्पर्श में करण पूरा छूता है, अन्तःस्थ में ज़रा-सा। इसी ‘ज़रा-सा’ के कारण वायु का मार्ग पूरी तरह बन्द नहीं होता और ये वर्ण स्वर के नज़दीक पहुँच जाते हैं — इसीलिए पुस्तक इन्हें ‘अर्ध-स्वराः’ भी कहती है। ‘य’ को खींचकर बोलिए, वह ‘ई’ में बदल जाएगा; ‘व’ को खींचिए, वह ‘ऊ’ में।
ध्यान दें: सूत्र में ‘अन्तस्थाः’ छपा है, पाठ में ‘अन्तःस्थाः’ — दोनों एक ही शब्द के दो प्रचलित रूप हैं (अन्तः + स्थ = बीच में स्थित)। ‘करणा’ रूप में भी सूत्र-शैली की संक्षिप्तता है; पूरा रूप ‘करणाः’ होगा।
प्र7.
सूत्रम् — ‘ईषद्-विवृत–करणा – ऊष्माणः।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — ऊष्मणां वर्णानाम् उच्चारणे, करणम् → ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्नेन’ स्थानं प्रति (समीपं) याति।

(हिन्दी — ऊष्म वर्णों के उच्चारण में करण ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्न’ से स्थान के समीप तक जाता है — छूता नहीं।)

वे वर्ण — श · ष · स · ह — कुल ४; तथा इन्हीं के साथ अयोगवाहौ (अं, अः) भी इसी प्रयत्न से बनते हैं।

यहीं ‘स्पर्श’ से ‘गति’ की ओर मोड़ है: पहले दो सूत्रों में क्रिया थी ‘स्पृशति’ (छूता है); इस सूत्र से क्रिया बदलकर ‘याति’ (जाता है) हो जाती है। यही व्याकरणिक संकेत है कि यहाँ से स्पर्श समाप्त और अन्तराल आरम्भ। ‘स्’ बोलकर हथेली मुँह के आगे रखिए — वायु लगातार बहती मिलेगी, क्योंकि रास्ता कहीं बन्द ही नहीं हुआ।
सन्धि: ‘ईषत् + विवृत’ में ‘त्’ के बाद मृदु ‘व्’ आने से ‘त्’ का ‘द्’ हुआ — जश्त्व सन्धि — अतः ‘ईषद्-विवृत’। किन्तु ‘ईषत् + स्पृष्ट’ में आगे ‘स्’ (कठोर) है, इसलिए वहाँ ‘त्’ ज्यों का त्यों रहा।
प्र8.
सूत्रम् — ‘विवृत–करणाः – स्वराः।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — स्वराणां वर्णानाम् उच्चारणे, करणं → ‘विवृत-प्रयत्नेन’ स्थानं प्रति (किञ्चित्-दूर-पर्यन्तं) याति।

(हिन्दी — स्वरों के उच्चारण में करण ‘विवृत-प्रयत्न’ से स्थान की ओर कुछ ही दूर तक जाता है — मार्ग स्पष्ट खुला रहता है।)

यही सूत्र ‘स्वर’ की सबसे छोटी परिभाषा है:जिनका करण विवृत हो, वे स्वर’। यहीं से पृष्ठ १५२ की पहली सारणी की सारी बातें निकलती हैं — मार्ग खुला है, इसलिए ध्वनि टिकती है; ध्वनि टिकती है, इसलिए एक-दो-तीन मात्रा सम्भव है; और इसलिए स्वर स्वतन्त्र है। इस एक सूत्र से पूरी सारणी निकाली जा सकती है।
ध्यान दें — ‘किञ्चित्-दूर-पर्यन्तम्’: पिछले सूत्र में करण ‘समीपं’ जाता था, इस सूत्र में ‘किञ्चित्-दूर-पर्यन्तम्’। अर्थात् स्वरों में अन्तराल अधिक है — यही ‘लघुः विवरः’ और ‘स्फुटः विवरः’ का अन्तर है, जो पृष्ठ १४७ पर विस्तार से बताया गया था।
प्र9.
सूत्रम् — ‘संवृतस्त्वकारः।’ अस्य अर्थः कः ? अत्र ‘तु’ शब्दस्य कः प्रयोजनम् ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — [संवृतः तु अकारः] अ-कारस्य (ह्रस्वस्य) वर्णस्य उच्चारणे तु (अपवादरूपेण), (करणं) → ‘संवृत-प्रयत्नेन’ स्थानं प्रति संकुचितः भवति।

(हिन्दी — किन्तु ह्रस्व ‘अ’ के उच्चारण में — अपवाद के रूप में — करण ‘संवृत-प्रयत्न’ से स्थान की ओर सिकुड़ जाता है।)

‘तु’ ही इस सूत्र की जान है: ‘तु’ का अर्थ है ‘किन्तु, पर’। पिछला सूत्र कह चुका था ‘विवृत-करणाः – स्वराः’ — सब स्वर विवृत। तुरन्त यह सूत्र आकर कहता है ‘संवृतः तु अकारः’ — पर ‘अ’ संवृत है। शास्त्र में जहाँ ‘तु’ आता है, वहाँ समझ लीजिए कि पिछले नियम का अपवाद कहा जा रहा है। एक अक्षर के इस छोटे-से शब्द ने पूरे नियम में छेद बना दिया — और वही छेद इस पाठ की सबसे बड़ी सीख है।
सन्धि: ‘संवृतः + तु + अकारः’ → विसर्ग के बाद ‘त्’ आने से विसर्ग ‘स्’ हुआ (सत्व), और ‘तु + अकारः’ में उ + अ = व (यण् सन्धि) — अतः बना ‘संवृतस्त्वकारः’। पुस्तक ने कोष्ठक में विच्छेद देकर यही स्पष्ट किया है।
प्र10.
सूत्रम् — ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः।’ अस्य अर्थः कः ?
उत्तर

अर्थः (पुस्तकानुसारम्) — अत्र पर्यन्तम् एषः उच्चारणस्य ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ चर्चितः। (यहाँ तक उच्चारण के ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ की चर्चा हुई।)

यह उपसंहार-सूत्र है: जैसे ‘प्रयत्नोऽपि द्विविधः।’ ने प्रकरण खोला था, वैसे ही यह सूत्र उसे बन्द करता है। ध्यान दीजिए — सूत्र में ‘अन्तःप्रयत्नः’ शब्द है, ‘प्रयत्नः’ नहीं। अर्थात् सूत्रकार स्वयं बता रहा है कि केवल भीतरी प्रयत्न पूरा हुआ; बाह्य-प्रयत्न अभी शेष है। कक्षा ८ का समापन-सूत्र भी ऐसा ही था — ‘इत्येतत् करणम्।’
पुस्तक का समापन: यह शारदा (कक्षा ९) के अन्तिम पाठ का अन्तिम शास्त्र-वाक्य है। तीन कक्षाओं में स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न — तीनों तत्त्व पूरे हो गए। जो सीखा, उसे केवल याद मत रखिए — रोज़ थोड़ी देर संस्कृत ऊँचे स्वर में पढ़िए, क्योंकि ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’।
सन्धि: ‘इति + एषः + अन्तःप्रयत्नः’ → इति + एषः में इ + ए = ‘य्’ (यण् सन्धि) से ‘इत्येषः’, फिर ‘एषः + अन्तः’ में विसर्ग-सन्धि (पूर्वरूप) से ‘एषोऽन्तः’ — अतः ‘इत्येषोऽन्तःप्रयत्नः’।
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