प्र1.
पृष्ठ १५० की ‘वर्णमाला’ को उसी रूप में सारणी-रूप में लिखिए — वर्णों का भेद, उनके वर्ण तथा उनका आभ्यन्तर-प्रयत्न।
उत्तर
उत्तरम् — पुस्तकस्य ‘वर्णमाला’-पत्रस्य पूर्णा सारणी —
(१) स्वराः
| भेदः | वर्णाः | आभ्यन्तर-प्रयत्नः | सङ्ख्या |
|---|---|---|---|
| समानाक्षराणि — अ-कारः | अ | संवृत-प्रयत्नः | ०१ |
| समानाक्षराणि — शेषाणि | — · आ · अ३ · इ · ई · इ३ · उ · ऊ · उ३ · ऋ · ॠ · ऋ३ · ऌ · ऌ३ | विवृत-प्रयत्नः | १३ |
| सन्ध्यक्षराणि | ए · ए३ · ऐ · ऐ३ · ओ · ओ३ · औ · औ३ | विवृत-प्रयत्नः | ०८ |
(२) व्यञ्जनानि
| भेदः | वर्णाः | आभ्यन्तर-प्रयत्नः | सङ्ख्या |
|---|---|---|---|
| स्पर्शाः (वर्गीयाः) | क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ म | स्पृष्ट-प्रयत्नः | २५ |
| अन्तःस्थाः (अर्ध-स्वराः) | य · र · ल · व | ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः | ०४ |
| ऊष्माणः | श · ष · स · ह | ईषद्-विवृत-प्रयत्नः | ०४ |
| अयोगवाहौ — अनुस्वारः | अं | ईषद्-विवृत-प्रयत्नः | ०१ |
| अयोगवाहौ — विसर्गः | अः | ईषद्-विवृत-प्रयत्नः | ०१ |
चित्र में एक ‘—’ क्यों छपा है: समानाक्षरों की दूसरी पंक्ति ‘— आ अ३ इ ई इ३ …’ इस प्रकार आरम्भ होती है। वहाँ जो रिक्त-चिह्न (—) है, वह ह्रस्व ‘अ’ का खाली छोड़ा हुआ खाना है — क्योंकि ‘अ’ को उसकी अलग प्रयत्न-श्रेणी (संवृत) दिखाने के लिए ऊपर अकेला रख दिया गया है। इसी तरह ‘ऌ’ के आगे केवल ‘ऌ३’ है, ‘ॡ’ नहीं — क्योंकि पुस्तक स्वयं कहती है ‘ऌ-वर्णस्य दीर्घा न सन्ति’।
एक पन्ने में पूरा पाठ: यह पत्र-चित्र इस पाठ का सबसे उपयोगी पृष्ठ है — बायीं ओर वर्णों के भेद, बीच में स्वयं वर्ण, और दायीं ओर उनका आभ्यन्तर-प्रयत्न। परीक्षा से पहले केवल यही एक पन्ना दोहरा लेना पर्याप्त है; शेष सब इसी का विस्तार है।