शारदा अध्याय 11 वर्णमाला

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पृष्ठ १५० की ‘वर्णमाला’ को उसी रूप में सारणी-रूप में लिखिए — वर्णों का भेद, उनके वर्ण तथा उनका आभ्यन्तर-प्रयत्न।
उत्तर

उत्तरम् — पुस्तकस्य ‘वर्णमाला’-पत्रस्य पूर्णा सारणी —

(१) स्वराः

भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःसङ्ख्या
समानाक्षराणि — अ-कारःसंवृत-प्रयत्नः०१
समानाक्षराणि — शेषाणि— · आ · अ३ · इ · ई · इ३ · उ · ऊ · उ३ · ऋ · ॠ · ऋ३ · ऌ · ऌ३विवृत-प्रयत्नः१३
सन्ध्यक्षराणिए · ए३ · ऐ · ऐ३ · ओ · ओ३ · औ · औ३विवृत-प्रयत्नः०८

(२) व्यञ्जनानि

भेदःवर्णाःआभ्यन्तर-प्रयत्नःसङ्ख्या
स्पर्शाः (वर्गीयाः)क ख ग घ ङ · च छ ज झ ञ · ट ठ ड ढ ण · त थ द ध न · प फ ब भ मस्पृष्ट-प्रयत्नः२५
अन्तःस्थाः (अर्ध-स्वराः)य · र · ल · वईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः०४
ऊष्माणःश · ष · स · हईषद्-विवृत-प्रयत्नः०४
अयोगवाहौ — अनुस्वारःअंईषद्-विवृत-प्रयत्नः०१
अयोगवाहौ — विसर्गःअःईषद्-विवृत-प्रयत्नः०१
चित्र में एक ‘—’ क्यों छपा है: समानाक्षरों की दूसरी पंक्ति ‘— आ अ३ इ ई इ३ …’ इस प्रकार आरम्भ होती है। वहाँ जो रिक्त-चिह्न (—) है, वह ह्रस्व ‘अ’ का खाली छोड़ा हुआ खाना है — क्योंकि ‘अ’ को उसकी अलग प्रयत्न-श्रेणी (संवृत) दिखाने के लिए ऊपर अकेला रख दिया गया है। इसी तरह ‘ऌ’ के आगे केवल ‘ऌ३’ है, ‘ॡ’ नहीं — क्योंकि पुस्तक स्वयं कहती है ‘ऌ-वर्णस्य दीर्घा न सन्ति’।
एक पन्ने में पूरा पाठ: यह पत्र-चित्र इस पाठ का सबसे उपयोगी पृष्ठ है — बायीं ओर वर्णों के भेद, बीच में स्वयं वर्ण, और दायीं ओर उनका आभ्यन्तर-प्रयत्न। परीक्षा से पहले केवल यही एक पन्ना दोहरा लेना पर्याप्त है; शेष सब इसी का विस्तार है।
प्र2.
वर्णमालायां शुद्ध-स्वराणां सङ्ख्या का ? तेषु कति स्वराः विवृत-प्रयत्नेन, कति च संवृत-प्रयत्नेन उच्चार्यन्ते ? गणनया दर्शयत।
उत्तर

उत्तरम् — शुद्ध-स्वराणां (निरनुनासिकानां स्वराणां) सङ्ख्या २२ अस्ति। तेषु २१ स्वराः विवृत-प्रयत्नेन तथा ०१ (केवलः ह्रस्वः अ-कारः) संवृत-प्रयत्नेन उच्चार्यते।

(हिन्दी — शुद्ध स्वर बाईस हैं; उनमें इक्कीस विवृत-प्रयत्न से और केवल एक — ह्रस्व ‘अ’ — संवृत-प्रयत्न से बोला जाता है।)

समानाक्षराणि — कण्ठ्यानि : अ, आ, अ३ = ३
समानाक्षराणि — तालव्यानि : इ, ई, इ३ = ३
समानाक्षराणि — मूर्धन्यानि : ऋ, ॠ, ऋ३ = ३
समानाक्षराणि — दन्त्यानि : ऌ, ऌ३ = २  (‘ऌ-वर्णस्य दीर्घा न सन्ति’)
समानाक्षराणि — ओष्ठ्यानि : उ, ऊ, उ३ = ३
समानाक्षराणि योगः = ३ + ३ + ३ + २ + ३ = १४

सन्ध्यक्षराणि : ए, ए३, ऐ, ऐ३, ओ, ओ३, औ, औ३ = ८

सर्वे स्वराः = १४ + ८ = २२
तेषु संवृत-प्रयत्नः → केवलः ह्रस्वः ‘अ’ = ०१
अतः विवृत-प्रयत्नः → २२ − १ = २१
पुस्तक की सारणी से मिलान: पृष्ठ १५२ की पहली सारणी में ठीक यही लिखा है — ‘स्वराः (२१) – विवृत-प्रयत्नः · अ-कारः (०१) – संवृत-प्रयत्नः’। और नीचे तारांकित टिप्पणी स्पष्ट करती है — ‘अत्र केवलं शुद्ध-स्वराः (अर्थात् निरनुनासिकाः स्वराः) एव गण्यन्ते, न तु अनुनासिक-स्वराः।’ अर्थात् यदि अनुनासिक स्वर (आँ, ईं आदि) भी गिने जाएँ तो संख्या दुगुनी हो जाएगी; पाठ उन्हें नहीं गिनता।
प्लुत क्या है: ‘अ३’, ‘इ३’, ‘ए३’ में जो ‘३’ लिखा है वह प्लुत का चिह्न है — तीन मात्रा तक खींचा गया स्वर, जो प्रायः दूर से पुकारने में आता है (जैसे ‘हे राम३’)। ह्रस्व एक मात्रा, दीर्घ दो मात्रा और प्लुत तीन मात्रा का होता है — इसीलिए पृष्ठ १५२ की सारणी स्वर को ‘एकमात्रः / द्विमात्रः / त्रिमात्रः वा’ कहती है।
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