शारदा अध्याय 11 अङ्गुली-मुरली-दृष्टान्तः तथा पाठस्य उपसंहारः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पृष्ठ १४९ के चित्र में मुरली (वंशी) तथा अङ्गुलियों का दृष्टान्त किस प्रकार स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न को समझाता है ?
उत्तर

उत्तरम् — पुस्तकस्य दृष्टान्तः त्रिभिः वाक्यैः पूर्णः भवति —

चित्रे यत् दृश्यतेपुस्तकस्य वाक्यम्उच्चारणे तत्तुल्यम्हिन्दी में
अङ्गुलिच्छिद्राणि (बाँसुरी के छेद)अङ्गुलिच्छिद्राणि → स्थानानि इवस्थानम्छेद स्थिर हैं, अपनी जगह से हिलते नहीं — जैसे कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ, नासिका
अङ्गुलयः (उँगलियाँ)अङ्गुलयः → करणानि इवकरणम्उँगलियाँ हिलती हैं और छेदों तक जाती हैं — जैसे जिह्वा, ओष्ठ आदि
अङ्गुलेः छिद्रं प्रति दबावःअङ्गुलेः — अङ्गुलिच्छिद्रं प्रति यः प्रयत्नः, सः → आभ्यन्तर-प्रयत्नः इवआभ्यन्तर-प्रयत्नःउँगली छेद को पूरा ढाँपे, आधा ढाँपे या ज़रा ऊपर रहे — यही ‘कितना’ ही प्रयत्न है
दृष्टान्त इतना अच्छा क्यों है: बाँसुरी में छेद वही रहते हैं और उँगलियाँ वही रहती हैं — फिर भी अनेक स्वर निकलते हैं। बदलता क्या है ? केवल उँगली और छेद का सम्बन्ध — पूरी तरह बन्द, आधा बन्द, या खुला। मुँह के भीतर भी छह स्थान और छह करण ही हैं, पर उनसे पचास से भी अधिक वर्ण निकल आते हैं (२२ स्वर + ३५ व्यञ्जन), क्योंकि हर बार प्रयत्न बदल जाता है। कक्षा ८ में यही दृष्टान्त केवल स्थान और करण तक था; इस पाठ ने उसमें तीसरा — और सबसे निर्णायक — तत्त्व जोड़ दिया।
करके देखिए: बाँसुरी न हो तो एक खाली बोतल लीजिए। मुँह पूरा ढककर फूँकिए — कोई ध्वनि नहीं (यह ‘स्पृष्ट’ जैसा बन्द है)। मुँह के ठीक ऊपर तिरछे फूँकिए — गूँज उठेगी (यह ‘ईषद्-विवृत’ जैसा है)। बहुत दूर से फूँकिए — केवल हवा की आवाज़ (‘विवृत’)। तीनों में होंठ और बोतल वही हैं, केवल प्रयत्न बदला।
प्र2.
‘आस्ये विद्यमानानाम् एतेषां स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्-ज्ञानेन, तथा पुनःपुनः अभ्यासेन च वयं किं कर्तुं प्रभवामः ?’ — पाठस्य उपसंहार-वाक्यानां आशयं लिखत।
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — आस्ये विद्यमानानाम् एतेषां स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्-ज्ञानेन, तथा पुनःपुनः अभ्यासेन च वयं प्रत्येक-वर्णस्य एवञ्च सर्वेषां शब्दानां सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः।

(हिन्दी — मुँह के भीतर विद्यमान इन स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न के सम्यक् ज्ञान से और बार-बार के अभ्यास से ही हम प्रत्येक वर्ण का तथा सभी शब्दों का सुस्पष्ट और शुद्ध उच्चारण कर पाते हैं।)

उपसंहार में पुस्तक तीन लाभ गिनाती है —

  1. शुद्ध उच्चारण — हर वर्ण का और हर शब्द का ‘सुस्पष्टं शुद्धं च’ उच्चारण सम्भव होता है।
  2. स्वर-व्यञ्जन का भेद — ‘एवमेव वर्णमालायां स्वर-व्यञ्जनयोः मध्ये का भिन्नता ? इत्यपि यथावत् अवबोधामः।’ अर्थात् अब हम ठीक-ठीक समझ पाते हैं कि स्वर और व्यञ्जन में अन्तर क्या है।
  3. व्यञ्जनों के भीतर का भेद — ‘पुनश्च, व्यञ्जनानां मध्ये अपि — स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ चेति ये भेदाः सन्ति; तेषाम् अपि परस्पर-भिन्नतां यथोचितम् अवगच्छामः।’
ध्यान दीजिए — ‘ज्ञानेन’ अकेला नहीं, ‘अभ्यासेन च’ भी: पुस्तक दोनों को एक साथ रखती है। केवल सारणी याद कर लेने से उच्चारण शुद्ध नहीं होता; बोल-बोलकर जीभ को वह स्थिति सिखानी पड़ती है। इसीलिए अभ्यास-खण्ड का नाम भी ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ है — सिद्धि अभ्यास से ही आती है। यही इस पाठ के तीनों खण्डों को जोड़ने वाला सूत्र है।
यही उपसंहार आगे के पन्नों की भूमिका है: वाक्य में जो दो प्रश्न उठाए गए — ‘स्वर और व्यञ्जन में क्या अन्तर ?’ तथा ‘व्यञ्जनों के चार भेदों में क्या अन्तर ?’ — उन्हीं के उत्तर पृष्ठ १५२ की तीन तुलना-सारणियों में दिए गए हैं। पाठ प्रश्न पहले उठाता है, उत्तर तीन पन्ने बाद देता है।
प्र3.
‘वर्णमालायां स्वर-व्यञ्जनयोः मध्ये का भिन्नता ?’ — आभ्यन्तर-प्रयत्नस्य आधारेण संक्षेपेण उत्तरं लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — स्वराणाम् उच्चारणे करणं स्थानं न स्पृशति (विवृत-प्रयत्नः, अ-कारे संवृत-प्रयत्नः); व्यञ्जनानाम् उच्चारणे तु करणं स्थानं स्पृशति अथवा तस्य अतीव समीपं याति (स्पृष्ट-, ईषत्-स्पृष्ट-, ईषद्-विवृत-प्रयत्नाः)। इयम् एव मूला भिन्नता।

(हिन्दी — स्वरों के उच्चारण में करण स्थान को छूता ही नहीं — मार्ग खुला रहता है; व्यञ्जनों के उच्चारण में करण स्थान को छूता है या उसके बहुत पास चला जाता है — मार्ग रुकता या सँकरा हो जाता है। यही मूल अन्तर है।)

बिन्दुःस्वरःव्यञ्जनम्
करणस्य क्रियास्थानं स्पृशतिस्थानं स्पृशति, अथवा अतीव समीपं याति
आभ्यन्तर-प्रयत्नःविवृतः (२१), संवृतः (अ — ०१)स्पृष्टः (२५), ईषत्-स्पृष्टः (०४), ईषद्-विवृतः (०४ + ०२)
स्वातन्त्र्यम्स्वतन्त्रः वर्णः — उच्चारणार्थम् अन्य-वर्णः न आवश्यकःपरतन्त्रः वर्णः — उच्चारणार्थम् आधार-स्वरः आवश्यकः
मात्राएकमात्रः / द्विमात्रः / त्रिमात्रः वाअर्धमात्रः नित्यम्
दोनों कसौटियाँ एक ही तथ्य के दो चेहरे हैं: स्वर में मार्ग खुला रहता है, इसीलिए उसे जितना चाहें खींचा जा सकता है — और इसीलिए उसकी मात्रा एक, दो या तीन हो सकती है। व्यञ्जन में मार्ग रुक या सिकुड़ जाता है, इसीलिए वह अकेला टिक ही नहीं सकता — उसे सहारे के लिए स्वर चाहिए (क् + अ = क), और इसीलिए उसकी मात्रा सदा आधी मानी जाती है। प्रयत्न से मात्रा निकलती है और मात्रा से स्वातन्त्र्य — यही पृष्ठ १५२ की पहली सारणी का तर्क है।
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