उत्तरम् (पुस्तकस्य वाक्यम्) — आस्ये विद्यमानानाम् एतेषां स्थान–करण–आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सम्यक्-ज्ञानेन, तथा पुनःपुनः अभ्यासेन च वयं प्रत्येक-वर्णस्य एवञ्च सर्वेषां शब्दानां सुस्पष्टं शुद्धं च उच्चारणं कर्तुं प्रभवामः।
(हिन्दी — मुँह के भीतर विद्यमान इन स्थान, करण तथा आभ्यन्तर-प्रयत्न के सम्यक् ज्ञान से और बार-बार के अभ्यास से ही हम प्रत्येक वर्ण का तथा सभी शब्दों का सुस्पष्ट और शुद्ध उच्चारण कर पाते हैं।)
उपसंहार में पुस्तक तीन लाभ गिनाती है —
- शुद्ध उच्चारण — हर वर्ण का और हर शब्द का ‘सुस्पष्टं शुद्धं च’ उच्चारण सम्भव होता है।
- स्वर-व्यञ्जन का भेद — ‘एवमेव वर्णमालायां स्वर-व्यञ्जनयोः मध्ये का भिन्नता ? इत्यपि यथावत् अवबोधामः।’ अर्थात् अब हम ठीक-ठीक समझ पाते हैं कि स्वर और व्यञ्जन में अन्तर क्या है।
- व्यञ्जनों के भीतर का भेद — ‘पुनश्च, व्यञ्जनानां मध्ये अपि — स्पर्शाः, अन्तःस्थाः, ऊष्माणः, अयोगवाहौ चेति ये भेदाः सन्ति; तेषाम् अपि परस्पर-भिन्नतां यथोचितम् अवगच्छामः।’
ध्यान दीजिए — ‘ज्ञानेन’ अकेला नहीं, ‘अभ्यासेन च’ भी: पुस्तक दोनों को एक साथ रखती है। केवल सारणी याद कर लेने से उच्चारण शुद्ध नहीं होता; बोल-बोलकर जीभ को वह स्थिति सिखानी पड़ती है। इसीलिए अभ्यास-खण्ड का नाम भी ‘अभ्यासाद् जायते सिद्धिः’ है — सिद्धि अभ्यास से ही आती है। यही इस पाठ के तीनों खण्डों को जोड़ने वाला सूत्र है।
यही उपसंहार आगे के पन्नों की भूमिका है: वाक्य में जो दो प्रश्न उठाए गए — ‘स्वर और व्यञ्जन में क्या अन्तर ?’ तथा ‘व्यञ्जनों के चार भेदों में क्या अन्तर ?’ — उन्हीं के उत्तर पृष्ठ १५२ की तीन तुलना-सारणियों में दिए गए हैं। पाठ प्रश्न पहले उठाता है, उत्तर तीन पन्ने बाद देता है।