उत्तरम् (पुस्तकस्य परिभाषा) — आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते। आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति।
(हिन्दी — मुँह के भीतर करण जिस प्रयत्न (बल) से स्थान को छूता है अथवा स्थान के समीप जाता है, वही प्रयत्न ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ कहलाता है। यह पाँच प्रकार का होता है।)
परिभाषा को तीन टुकड़ों में तोड़िए —
- आस्यस्य अभ्यन्तरे — यह प्रयत्न मुँह के भीतर होता है। इसीलिए इसका नाम ‘आभ्यन्तर’ है; जो प्रयत्न बाहर श्वास, नाद, घोष आदि के रूप में दिखता है वह ‘बाह्य’ कहलाता है।
- करणं … स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति — दो ही सम्भावनाएँ हैं : या तो करण स्थान को छू ले, या पास तक जाए। यही दो सम्भावनाएँ आगे पाँच प्रयत्नों में बँट जाती हैं।
- येन प्रयत्नेन — पूछा यह जा रहा है कि किस मात्रा में छुआ या कितने पास गया। मात्रा बदलते ही वर्ण बदल जाता है।
| क्रमः | आभ्यन्तर-प्रयत्नः | करण क्या करता है | उससे बनने वाले वर्ण |
|---|---|---|---|
| १ | स्पृष्ट-प्रयत्नः | स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृशति’ — पूरी तरह छूता है | स्पर्श-व्यञ्जनानि (क् … म् — २५) |
| २ | ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः | स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’ — बहुत थोड़ा छूता है | अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (य् र् ल् व् — ४) |
| ३ | ईषद्-विवृत-प्रयत्नः | छूता नहीं, ‘बहु समीपं याति’ — बीच में ‘लघुः विवरः’ रहता है | ऊष्म-व्यञ्जनानि (श् ष् स् ह् — ४) तथा अयोगवाहौ (अनुस्वार-विसर्गौ — २) |
| ४ | विवृत-प्रयत्नः | छूता नहीं, ‘किञ्चित् समीपं याति’ — बीच में ‘स्फुटः विवरः’ रहता है | अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे स्वराः (२१) |
| ५ | संवृत-प्रयत्नः | कण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘संकोचः’ भवति — कण्ठ सिकुड़ जाता है | केवलम् अ-कारः (ह्रस्वः — ०१) |