शारदा अध्याय 11 (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ कः उच्यते ? सः कतिविधः भवति ?
उत्तर

उत्तरम् (पुस्तकस्य परिभाषा) — आस्यस्य अभ्यन्तरे करणं येन प्रयत्नेन स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति, सः प्रयत्नः ‘आभ्यन्तर-प्रयत्नः’ इति उच्यते। आभ्यन्तर-प्रयत्नः पञ्चविधः भवति।

(हिन्दी — मुँह के भीतर करण जिस प्रयत्न (बल) से स्थान को छूता है अथवा स्थान के समीप जाता है, वही प्रयत्न ‘आभ्यन्तर-प्रयत्न’ कहलाता है। यह पाँच प्रकार का होता है।)

परिभाषा को तीन टुकड़ों में तोड़िए —

  • आस्यस्य अभ्यन्तरे — यह प्रयत्न मुँह के भीतर होता है। इसीलिए इसका नाम ‘आभ्यन्तर’ है; जो प्रयत्न बाहर श्वास, नाद, घोष आदि के रूप में दिखता है वह ‘बाह्य’ कहलाता है।
  • करणं … स्थानं स्पृशति, स्थानस्य समीपं वा याति — दो ही सम्भावनाएँ हैं : या तो करण स्थान को छू ले, या पास तक जाए। यही दो सम्भावनाएँ आगे पाँच प्रयत्नों में बँट जाती हैं।
  • येन प्रयत्नेन — पूछा यह जा रहा है कि किस मात्रा में छुआ या कितने पास गया। मात्रा बदलते ही वर्ण बदल जाता है।
क्रमःआभ्यन्तर-प्रयत्नःकरण क्या करता हैउससे बनने वाले वर्ण
स्पृष्ट-प्रयत्नःस्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृशति’ — पूरी तरह छूता हैस्पर्श-व्यञ्जनानि (क् … म् — २५)
ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःस्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’ — बहुत थोड़ा छूता हैअन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (य् र् ल् व् — ४)
ईषद्-विवृत-प्रयत्नःछूता नहीं, ‘बहु समीपं याति’ — बीच में ‘लघुः विवरः’ रहता हैऊष्म-व्यञ्जनानि (श् ष् स् ह् — ४) तथा अयोगवाहौ (अनुस्वार-विसर्गौ — २)
विवृत-प्रयत्नःछूता नहीं, ‘किञ्चित् समीपं याति’ — बीच में ‘स्फुटः विवरः’ रहता हैअ-कारं विहाय अन्ये सर्वे स्वराः (२१)
संवृत-प्रयत्नःकण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘संकोचः’ भवति — कण्ठ सिकुड़ जाता हैकेवलम् अ-कारः (ह्रस्वः — ०१)
पाँचों को एक रेखा पर रखिए: स्थान और करण के बीच की दूरी घटती-बढ़ती जाती है — पूरा स्पर्श → थोड़ा स्पर्श → बहुत छोटा अन्तराल → स्पष्ट अन्तराल। यह एक सीढ़ी है, चार अलग-अलग खाने नहीं। पाँचवाँ (संवृत) इस सीढ़ी से बाहर का अपवाद है — उसमें दूरी बढ़ती नहीं, कण्ठ स्वयं सिकुड़ जाता है।
हाथ से जाँचिए: क् — प् — ट् बोलिए, दोनों अङ्ग पूरी तरह मिलते हैं (स्पृष्ट)। अब य् — व् बोलिए, स्पर्श होता तो है पर ढीला (ईषत्-स्पृष्ट)। अब श् — स् — ह् बोलकर हथेली मुँह के आगे रखिए — वायु लगातार बहती मिलेगी, क्योंकि रास्ता कहीं बन्द ही नहीं हुआ (ईषद्-विवृत)। और आ — ई — ऊ बोलिए — मुँह पूरा खुला (विवृत)।
प्र2.
‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ कदा भवति ? तेन के वर्णाः उत्पद्यन्ते ? (पृष्ठ १४६)
उत्तर

उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृशति’, तदा करणस्य ‘स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य स्पृष्ट-प्रयत्नेन → स्थाने स्पर्श-व्यञ्जनानि उत्पद्यन्ते।

(हिन्दी — करण जब स्थान को पूरी तरह, स्पष्ट रूप से छू लेता है, तब करण का ‘स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। इसी प्रयत्न से उस स्थान पर स्पर्श-व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं।)

वर्ण-वर्गःस्थानम्करणम्वर्णाःजिस शब्द में सुनिए
कण्ठ्याःकण्ठःकण्ठः (स्वस्थानम्)क् ख् ग् घ् ङ्मलम्, गः, जः, टः, वाङ्मयम्
तालव्याःतालुजिह्वा-मध्यःच् छ् ज् झ् ञ्न्द्रः, त्रम्, लम्, ङ्कारः, याञ्चा
मूर्धन्याःमूर्धाजिह्वा-उपाग्रःट् ठ् ड् ढ् ण्ङ्कः, क्कुरः, मरुः, मूः, गु
दन्त्याःदन्तःजिह्वा-अग्रःत् थ् द् ध् न्रुः, रः, न्तः, नम्, दी
ओष्ठ्याःओष्ठःओष्ठः (स्वस्थानम्)प् फ् ब् भ् म्ुष्पम्, लम्, ालकः, ानुः, ाता
‘स्पर्श’ नाम ही परिभाषा है: पच्चीस वर्गीय व्यञ्जनों को ‘स्पर्शाः’ इसीलिए कहा जाता है कि इनमें करण स्थान को सचमुच छू लेता है और वायु का मार्ग क्षण भर के लिए पूरा बन्द हो जाता है। यही कारण है कि इन्हें लम्बा खींचकर नहीं बोला जा सकता — ‘स्’ को आप खींच सकते हैं, ‘क्’ को नहीं। पुस्तक ने उदाहरण के लिए हर बार मूर्धन्य वर्ण चुने हैं, क्योंकि जीभ के मुड़ने से चित्र में अन्तर सबसे स्पष्ट दिखता है।
ध्यान दें: पाँचवाँ वर्ण (ङ् ञ् ण् न् म्) दो स्थानों वाला है — वह अपने वर्ग के स्थान का भी है और नासिका का भी, क्योंकि उसमें वायु नाक से निकलती है। पृष्ठ १५७ की सारणी में ये पाँचों वर्ण नासिक्य पंक्ति में फिर से आते हैं।
प्र3.
‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ कदा भवति ? तेन के वर्णाः जायन्ते ? (पृष्ठ १४६)
उत्तर

उत्तरम् — करणं यदा स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’, तदा करणस्य ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नेन → स्थाने अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि जायन्ते।

(हिन्दी — करण जब स्थान को बहुत थोड़ा ही छूता है, तब करण का ‘ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्न’ होता है। इसी से उस स्थान पर अन्तःस्थ व्यञ्जन उत्पन्न होते हैं।)

अन्तःस्थ-वर्णःस्थानम्करणम्तत्सदृशः स्वरःजिस शब्द में सुनिए
य्तालुजिह्वा-मध्यःमुना, ज्ञः
र्मूर्धाजिह्वा-उपाग्रःविः, ामः
ल्दन्तःजिह्वा-अग्रःता, ोकः
व्दन्तः + ओष्ठःजिह्वा-अग्रः + अधरोष्ठःनम्, िद्या
‘अन्तःस्थ’ नाम क्यों: ये चार वर्ण स्वर और व्यञ्जन के बीच में खड़े हैं — इसीलिए ‘अन्तःस्थाः’, और इसीलिए पुस्तक इन्हें ‘अर्ध-स्वराः’ भी कहती है। स्पर्श वर्णों जितना बन्द होना इनमें नहीं है, स्वरों जितना खुलापन भी नहीं। ध्यान दीजिए — य् : इ, र् : ऋ, ल् : ऌ, व् : उ — हर अन्तःस्थ वर्ण के ठीक सामने एक स्वर खड़ा है और दोनों का स्थान एक ही है। सन्धि का नियम ‘इको यणचि’ (इ→य्, उ→व्, ऋ→र्, ऌ→ल्) इसी ध्वनि-सम्बन्ध पर टिका है।
व् की विशेषता: ‘व्’ अकेला ऐसा व्यञ्जन है जो पृष्ठ १५७ की सारणी में दो पंक्तियों में आता है — दन्त्य में भी और ओष्ठ्य में भी। इसीलिए इसे दन्त्योष्ठ्यः (द्वि-स्थानी) कहते हैं : जीभ की नोक दाँतों के पास और नीचे का होंठ ऊपर के दाँतों के पास — दोनों एक साथ।
प्र4.
‘ईषद्-विवृत-प्रयत्नः’ कदा भवति ? तेन के वर्णाः जायन्ते ? (पृष्ठ १४७)
उत्तर

उत्तरम् — करणं यदा स्थानं न स्पृशति, परन्तु स्थानस्य बहु समीपं याति, तदा उभयोः स्थान-करणयोः मध्ये ‘लघुः विवरः’ इव स्वल्पः अन्तरालः जायते — तदा करणस्य ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य ईषद्-विवृत-प्रयत्नेन → स्थाने ऊष्म-व्यञ्जनानि जायन्ते, तथा च → स्थाने अयोगवाहौ — अनुस्वार-विसर्गौ अपि जायेते।

(हिन्दी — करण जब स्थान को छूता नहीं, पर उसके बहुत पास चला जाता है और दोनों के बीच एक छोटा-सा छेद जैसा अन्तराल रह जाता है, तब ‘ईषद्-विवृत-प्रयत्न’ होता है। इसी से ऊष्म व्यञ्जन तथा अयोगवाह — अनुस्वार और विसर्ग — बनते हैं।)

वर्णःभेदःस्थानम्करणम्जिस शब्द में सुनिए
श्ऊष्मातालुजिह्वा-मध्यःिवः, ान्तिः
ष्ऊष्मामूर्धाजिह्वा-उपाग्रःट्, भा
स्ऊष्मादन्तःजिह्वा-अग्रःत्यम्, रः
ह्ऊष्माकण्ठःकण्ठः (स्वस्थानम्)ंसः, रिः
अं (अनुस्वारः)अयोगवाहःनासिकानासिका (स्वस्थानम्)शः, सस्कृतम्
अः (विसर्गः)अयोगवाहःकण्ठःकण्ठः (स्वस्थानम्)राम, बालक
‘ऊष्मा’ का अर्थ ‘गरमी’ है: इन चार वर्णों में मार्ग कहीं बन्द नहीं होता, इसलिए वायु लगातार रगड़ खाती हुई निकलती है और उसमें एक ऊष्मा जैसी सरसराहट पैदा होती है — इसीलिए नाम ‘ऊष्माणः’। यही कारण है कि श्, ष्, स्, ह् को आप जितनी देर चाहें खींच सकते हैं, जबकि क्, ट्, प् को नहीं। ‘लघुः विवरः’ ही इनका पूरा रहस्य है — रास्ता ज़रा-सा खुला रहता है, इसलिए ध्वनि चलती रहती है।
अयोगवाह क्यों साथ आए: अनुस्वार और विसर्ग भी बिना रुकावट के, केवल संकरे रास्ते से निकलने वाली ध्वनियाँ हैं — इसलिए इनका प्रयत्न भी वही ‘ईषद्-विवृत’ है। ‘अयोगवाह’ का अर्थ ही है — ‘अयोगे (वर्णमाला के किसी वर्ग में योग न होने पर भी) वाहः (जो अर्थ को ढोता है)’। ये न पूरे स्वर हैं, न पूरे व्यञ्जन, फिर भी इनके बिना संस्कृत लिखी ही नहीं जा सकती।
प्र5.
‘विवृत-प्रयत्नः’ कदा भवति ? तेन के वर्णाः उच्चार्यन्ते ? ‘लघुः विवरः’ तथा ‘स्फुटः विवरः’ इत्यनयोः का भिन्नता ? (पृष्ठ १४७)
उत्तर

उत्तरम् — करणं यदा स्थानं न स्पृशति, अपितु स्थानस्य किञ्चित् समीपं याति, तदा उभयोः स्थान-करणयोः मध्ये ‘स्फुटः विवरः’ इव अन्तरालः जायते — तदा करणस्य ‘विवृत-प्रयत्नः’ भवति। करणस्य विवृत-प्रयत्नेन → स्थाने (अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे) स्वराः उच्चार्यन्ते।

(हिन्दी — करण जब स्थान को छूता नहीं, केवल कुछ ही पास तक जाता है और दोनों के बीच एक स्पष्ट खुला अन्तराल बन जाता है, तब ‘विवृत-प्रयत्न’ होता है। इससे ह्रस्व ‘अ’ को छोड़कर शेष सभी स्वर बोले जाते हैं।)

‘लघुः विवरः’ तथा ‘स्फुटः विवरः’ — भेदः —

तुलना-बिन्दुःईषद्-विवृत-प्रयत्नःविवृत-प्रयत्नः
करणं कियत् समीपं यातिस्थानस्य बहु समीपम्स्थानस्य किञ्चित् समीपम्
अन्तरालः कीदृशःलघुः विवरः’ इव स्वल्पः अन्तरालःस्फुटः विवरः’ इव अन्तरालः
वायोः गतिःसंकरे मार्गे घर्षणेन (सरसराहट के साथ)खुले मार्गे निर्बाधम्
उत्पद्यमानाः वर्णाःऊष्माणः (श् ष् स् ह्) तथा अयोगवाहौ (अं अः)अ-कारं विहाय सर्वे स्वराः (२१)

विवृत-प्रयत्न से बोले जाने वाले २१ स्वर —

भेदःस्थानम्स्वराः
समानाक्षराणिकण्ठ्याःआ, अ३
समानाक्षराणितालव्याःइ, ई, इ३
समानाक्षराणिमूर्धन्याःऋ, ॠ, ऋ३
समानाक्षराणिदन्त्याःऌ, ऌ३
समानाक्षराणिओष्ठ्याःउ, ऊ, उ३
सन्ध्यक्षराणिकण्ठ-तालव्याःए, ए३, ऐ, ऐ३
सन्ध्यक्षराणिकण्ठ-ओष्ठ्याःओ, ओ३, औ, औ३
गिनती मिलाइए: २ + ३ + ३ + २ + ३ = १३ समानाक्षर (ह्रस्व अ को छोड़कर) और सन्ध्यक्षर — कुल २१ स्वर विवृत-प्रयत्न वाले। इनमें ह्रस्व ‘अ’ जोड़ दीजिए तो कुल स्वर २२ हो जाते हैं। पृष्ठ १५२ की सारणी यही कहती है — ‘स्वराः (२१) – विवृत-प्रयत्नः; अ-कारः (०१) – संवृत-प्रयत्नः’। (यहाँ केवल शुद्ध अर्थात् निरनुनासिक स्वर गिने गए हैं, अनुनासिक स्वर नहीं — यह बात पुस्तक स्वयं तारांकित टिप्पणी में कहती है।)
पाठ का पेटिका-वाक्य (पृष्ठ १४७):कण्ठ्य-तालव्य-मूर्धन्य-दन्त्य-ओष्ठ्येषु पञ्च-प्रकारेषु वर्णेषु — स्थान-करणयोः मध्ये उपर्युक्ताः चतुर्विधाः आभ्यन्तर-प्रयत्नाः दृश्यन्ते।’ अर्थात् ऊपर के चारों प्रयत्न पाँचों प्रकार के वर्णों में दिखाई देते हैं; पाँचवाँ (संवृत) केवल कण्ठ में और केवल एक ही वर्ण के लिए है — यही अगले प्रश्न का विषय है।
प्र6.
‘संवृत-प्रयत्नः’ कस्य वर्णस्य उच्चारणे भवति ? सः कुत्र भवति ? ‘अ-कारः विशिष्टः स्वरः’ इति किमर्थम् उच्यते ? (पृष्ठ १४८–१४९)
उत्तर

उत्तरम् — विशेषरूपेण ‘अ-कारस्य’ (ह्रस्वस्य) उच्चारणे ‘संवृत-प्रयत्नः’ भवति। सः केवलं कण्ठ-स्थाने एव भवति, तदपि केवलम् अ-कारस्य उच्चारणार्थम् एव। अतः स्वरेषु ‘अ-कारः’ कश्चिद् विशिष्टः स्वरः अस्ति।

(हिन्दी — विशेष रूप से ह्रस्व ‘अ’ के उच्चारण में ‘संवृत-प्रयत्न’ होता है। यह केवल कण्ठ स्थान में होता है, और वह भी केवल ‘अ’ के लिए। इसीलिए स्वरों में ‘अ’ एक विशिष्ट स्वर है।)

तर्क की पूरी शृंखला (पुस्तक के क्रम से) —

  1. ‘अ-वर्ण’ के तीन उपभेद हैं — अ-कारः (ह्रस्वः), आ-कारः (दीर्घः), अ३-कारः (प्लुतः)।
  2. ये तीनों ‘स्वराः’ भी हैं और ‘कण्ठ्य-वर्णाः’ भी। कण्ठ्य वर्णों में स्वस्थानम् एव करणं भवति — अर्थात् कण्ठ्य वर्णों का स्थान भी कण्ठ (कण्ठस्य पृष्ठ-भागः) और करण भी कण्ठ (कण्ठस्य अग्र-भागः)।
  3. इनमें से केवल आ-कार (दीर्घ) तथा अ३-कार (प्लुत) के उच्चारण में कण्ठ के भीतर स्थान और करण के बीच ‘स्फुटः विवरः’ जैसा अन्तराल बनता है — अतः अन्य स्वरों की तरह इन दोनों का प्रयत्न भी पूर्ववत् विवृत ही है।
  4. परन्तु अ-कार (ह्रस्व) में ऐसा नहीं होता। यहाँ कण्ठ में स्थान-करण के बीच ‘संकोचः’ हो जाता है — ‘कण्ठः संकुचितः संकीर्णः वा भवति’। कण्ठ का यही संकोच अथवा संकीर्णता ‘संवृतम्’ कहलाती है।
  5. अतः ‘कण्ठे करणस्य संवृत-प्रयत्नेन → स्थाने अ-कारः उच्चार्यते।’
अ-वर्णस्य उपभेदःमात्रास्थानम्करणम्आभ्यन्तर-प्रयत्नः
अ (ह्रस्वः)एकमात्रःकण्ठः (पृष्ठ-भागः)कण्ठः (अग्र-भागः)संवृत-प्रयत्नः — अपवादः
आ (दीर्घः)द्विमात्रःकण्ठः (पृष्ठ-भागः)कण्ठः (अग्र-भागः)विवृत-प्रयत्नः
अ३ (प्लुतः)त्रिमात्रःकण्ठः (पृष्ठ-भागः)कण्ठः (अग्र-भागः)विवृत-प्रयत्नः
स्वयं बोलकर देखिए:’ लम्बा बोलिए — कण्ठ और मुँह दोनों चौड़े खुलते हैं। अब झटके से ‘’ बोलिए — मुँह उतना नहीं खुलता, गला ज़रा-सा सिकुड़ा रहता है। दोनों का स्थान एक (कण्ठ) है, दोनों का करण भी एक है — फिर भी दोनों अलग सुनाई देते हैं, क्योंकि प्रयत्न अलग है। यही एक उदाहरण पूरे पाठ को सिद्ध कर देता है कि स्थान और करण के बाद तीसरा तत्त्व — प्रयत्न — क्यों आवश्यक है।
पुस्तक का पेटिका-वाक्य (पृष्ठ १४९):केवलं कण्ठ-स्थाने एव संवृत-प्रयत्नः भवति, तदपि केवलम् अ-कारस्य उच्चारणार्थम् एव।’ — दो बार ‘केवलम्’ आया है, इसलिए दो बन्धन याद रखिए : (१) केवल कण्ठ में, (२) केवल ह्रस्व अ के लिए। अभ्यास १ (च) ‘संवृत-प्रयत्नः कुत्र भवति ?’ का उत्तर इसी वाक्य से निकलता है।
प्र7.
पञ्चानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नानां सारणीं रचयत — प्रयत्नः, करणस्य क्रिया, उत्पद्यमानाः वर्णाः, तेषां सङ्ख्या च।
उत्तर

उत्तरम् — पञ्चविधानाम् आभ्यन्तर-प्रयत्नानां पूर्णा सारणी —

क्रमःआभ्यन्तर-प्रयत्नःपुस्तकस्य वाक्यम् (करणस्य क्रिया)उत्पद्यमानाः वर्णाःसङ्ख्याउदाहरणम्
स्पृष्ट-प्रयत्नःकरणं स्थानं ‘स्पष्ट-रूपेण स्पृशति’स्पर्श-व्यञ्जनानि (वर्गीयाः)२५क् च् ट् त् प्
ईषत्-स्पृष्ट-प्रयत्नःकरणं स्थानं ‘स्वल्पम् एव स्पृशति’अन्तःस्थ-व्यञ्जनानि (अर्ध-स्वराः)०४य् र् ल् व्
ईषद्-विवृत-प्रयत्नःकरणं न स्पृशति, ‘बहु समीपं याति’ — ‘लघुः विवरः’ऊष्म-व्यञ्जनानि + अयोगवाहौ०४ + ०२श् ष् स् ह् · अं अः
विवृत-प्रयत्नःकरणं न स्पृशति, ‘किञ्चित् समीपं याति’ — ‘स्फुटः विवरः’अ-कारं विहाय अन्ये सर्वे स्वराः२१आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ …
संवृत-प्रयत्नःकण्ठे स्थान-करणयोः मध्ये ‘संकोचः’ भवतिकेवलम् अ-कारः (ह्रस्वः)०१
सारणी को उलटकर भी पढ़िए — प्रश्न प्रायः दूसरी दिशा से पूछा जाता है : ‘इस वर्ण का प्रयत्न कौन-सा ?’ तब यह क्रम काम आएगा — वर्ग का वर्ण → स्पृष्ट; य र ल व → ईषत्-स्पृष्ट; श ष स ह तथा अं अः → ईषद्-विवृत; कोई भी स्वर → विवृत; केवल ह्रस्व अ → संवृत। अभ्यास का प्रश्न ३ (मेलनम्) ठीक इसी उलटी दिशा से पूछा गया है।
तीन प्रयत्न व्यञ्जनों के, दो स्वरों के: ध्यान दीजिए — पहले तीन प्रयत्न केवल व्यञ्जन बनाते हैं और अन्तिम दो केवल स्वर। इसीलिए पृष्ठ १५२ की सारणी में स्वर के खाने में ‘विवृत, संवृत’ और व्यञ्जन के खाने में ‘स्पृष्ट, ईषत्-स्पृष्ट, ईषद्-विवृत’ लिखे हैं। यह एक वाक्य में पूरा वर्गीकरण याद कर लेने का सूत्र है।
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