उत्तरम् — आस्यस्य अभ्यन्तरे वर्णानाम् उत्पत्त्यर्थं त्रीणि तत्त्वानि आवश्यकानि भवन्ति — (क) स्थानम्, (ख) करणम्, (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्नः च।
(हिन्दी — मुँह के भीतर वर्ण उत्पन्न होने के लिए तीन तत्त्व आवश्यक होते हैं — (क) स्थान, (ख) करण तथा (ग) आभ्यन्तर-प्रयत्न।)
| क्रमः | तत्त्वम् | क्या है | कहाँ पढ़ा गया |
|---|---|---|---|
| (क) | स्थानम् | आस्य का वह स्थल जहाँ वायु वर्ण-रूप में प्रकट होती है — षट् स्थानानि | कक्षा ८ — दीपकम्, ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा १’ |
| (ख) | करणम् | आस्य का वह भाग जो उस स्थान को छूता है या उसके पास जाता है — षट् करणानि | कक्षा ८ — दीपकम्, ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा १’ |
| (ग) | आभ्यन्तर-प्रयत्नः | करण उस स्थान तक कितने बल से, कितने पास तक जाता है — पञ्च प्रयत्नाः | यही पाठ — कक्षा ९, शारदा, ‘वर्णोच्चारण-शिक्षा २’ |