कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 10 णमो अरिहन्ताणम् के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ-परिचय — यह गद्यकथा है, कोई काव्य नहीं। कथा का नायक है ऋषभ — राजा नाभि तथा रानी मरुदेवी का पुत्र, जो आगे चलकर प्रजा के प्रेम से ‘ राजा ऋषभदेवः ’ कहलाया और जैनपरम्परा में प्रथम (आदि) तीर्थङ्कर माना जाता है। पाठ उसकी दो अवस्थाएँ दिखाता है — पहले एक कुशल, प्रजावत्सल राजा, फिर सब त्यागकर सत्य खोजने निकला महामुनि। कथावस्तु (राजा-भाग) — समाज में दुर्भिक्ष तथा परस्पर विद्वेष उठे। नाभि ने सोचा कि ऋषभ की राजनीति की परीक्षा का यही उपयुक्त काल है और उसे राज्य सौंप दिया। ऋषभ ने पहले कारण खोजा — जनता का आलस्य, कृषि में कमी, उत्पादनक्षमता का अभाव। फिर उपाय किया — कृषिकार्य, विविध पदार्थों से भोजननिर्माण, तन्तुओं से वस्त्रनिर्माण, गाय-घोड़े आदि पशुओं का पालन, काष्ठ-धातु-शिला से गृहोपयोगी वस्तुओं का निर्माण, पात्रनिर्माण, गृहनिर्माण तथा नगरनिर्माण — इन सब जीवनकौशलों का प्रशिक्षण । परिणाम — जनता सक्रिय
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| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी अर्थ | पाठ का वाक्य / प्रसंग |
|---|---|---|---|
| अरिहन्ताणम् (पुं.ष.ब.व.) | जितशत्रूणाम् | अरिहन्तों का (जिन्होंने भीतरी शत्रु जीत लिए) | ‘णमो अरिहन्ताणं’ — णमोकारमहामन्त्रस्य प्रथमा पङ्क्तिः (पृ. 134) |
| अनेकान्तवादः (पुं.प्र.ए.व.) | सत्यस्य बहुपक्षवादः | अनेकान्तवाद — सत्य के अनेक पक्ष होते हैं | जैनमतस्य प्रमुखाः सिद्धान्ताः — … अनेकान्तवादः (पृ. 134) |
| अपरिग्रहः (नञ्-तत्पुरुषः) | न परिग्रहः | आवश्यकता से अधिक संग्रह न करना | अपरिग्रहः (आवश्यकात् अधिकं संग्रहः न करणीयः) (पृ. 134) |
| आलस्यम् (नपुं.प्र.ए.व.) | प्रमादः | आलस्य | जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता … मूलसमस्याः सन्ति (पृ. 128) |
| इक्षुक्षेत्रम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) | इक्षोः (मधुदण्डस्य) क्षेत्रम् | गन्ने का खेत | हस्तिनापुरस्य समीपे स्थितस्य इक्षुक्षेत्रस्य पार्श्वमार्गात् गच्छति स्म (पृ. 133) |
| उपवासः (पुं.प्र.ए.व.) | निराहारव्रतम् | उपवास | चतुःशतं दिनानि नैरन्तर्येण उपवासं कृतवान् (पृ. 132) |
| केवलज्ञानम् (नपुं.प्र.ए.व.) | कैवल्यस्य ज्ञानम् | केवलज्ञान — पूर्ण, निरपेक्ष ज्ञान | प्रयागराजे अक्षयवटवृक्षस्य अधः केवलज्ञानं प्राप्तवान् (पृ. 133) |
| तीर्थङ्करः (पुं.प्र.ए.व.) | धर्ममार्गप्रदर्शकः | तीर्थंकर — धर्म का मार्ग दिखाने वाला | अयमेव जैनसम्प्रदाये आदिमः तीर्थङ्करः (पृ. 133) |
| दुर्भिक्षम् (अव्ययीभावः) | भिक्षायाः अभावः | अकाल | अथैकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुद्भवन् (पृ. 127) |
| दैवाधीनम् (षष्ठी-तत्पुरुषः) | दैवस्य अधीनम् | भाग्य के अधीन | दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम् (पृ. 130) |
| नवकारमन्त्रः (पुं.प्र.ए.व.) | जैनप्रार्थनामन्त्रः | नवकार (णमोकार) मन्त्र | तेषां परमो मन्त्रः नवकारमन्त्रः इति प्रसिद्धः (पृ. 134) |
| ब्राह्मीलिपिः (मध्यमपदलोपी कर्मधारयः) | ब्राह्मीनाम्नी लिपिः | ब्राह्मी नाम की लिपि | ‘ब्राह्मीलिप्याः’ विकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते (पृ. 130) |
| विक्षुब्धम् (नपुं.प्र.ए.व.) | उद्विग्नम् | विचलित, बेचैन | अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः सहसा विक्षुब्धम् अभवत् (पृ. 131) |
| शाश्वतम् (नपुं.प्र.ए.व.) | नित्यम् | शाश्वत, सदा रहने वाला | इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति (पृ. 131) |
| सङ्घः (पुं.प्र.ए.व.) | समूहः | संघ | स एव क्रमः जैनसङ्घः इति प्रसिद्धः वर्तते (पृ. 133) |
| सम्भ्रान्ताः (पुं.प्र.ब.व.) | किंकर्तव्यमूढाः | किंकर्तव्यविमूढ़, हैरान | भिक्षायां किं दातव्यमिति सम्भ्रान्ताः सन्तः (पृ. 132) |
| सुप्रतिष्ठितम् (नपुं.प्र.ए.व.) | दृढरूपेण स्थापितम् | अच्छी तरह जमा हुआ | जनानां मनस्सु सुप्रतिष्ठितं स्थानं प्राप्तवान् (पृ. 130) |
अभ्यास
- पाठः
- पाठः
- पाठः
- णमोकारमहामन्त्रः
- सर्वं शब्देन भासते
- अत्र इदम् अवधेयम्
- संस्कृत-वाक्यानां प्राकृतानुवादः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः
- यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्