शारदा अध्याय 10 पाठः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
ऋषभः ‘राजा ऋषभदेवः’ इति कथं ख्यातः ? तस्य सन्ततिविषये ब्राह्मीलिपिविषये च पाठः किम् आह ?
उत्तर

ऋषभः जनानां जीवने शान्तिं सुरक्षां न्यायिकव्यवस्थां च पुनः सुदृढां कृतवान्। ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च ‘विनिता’ नाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत्। समाजस्य उत्कर्षेण सः जनानां मनस्सु सुप्रतिष्ठितं स्थानं प्राप्तवान्। अतः तं प्रजाः प्रेम्णा ‘राजा ऋषभदेवः’ इति कथयन्ति स्म।

(हिन्दी — ऋषभ ने लोगों के जीवन में शान्ति, सुरक्षा और न्याय-व्यवस्था को फिर से मज़बूत किया। उसके कुशल शासन और कौशल से ‘विनिता’ नाम के नगर का निर्माण हुआ। समाज के उत्कर्ष के कारण उसने लोगों के मन में अच्छी तरह जमा हुआ स्थान पा लिया। इसीलिए प्रजा उसे प्रेम से ‘राजा ऋषभदेव’ कहती थी।)

विषयःपाठस्य कथनम्हिन्दी
नगरनिर्माणम्ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च विनितानाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत्‘विनिता’ नगर बसा — यही आगे भरत को दिया गया
नामकरणम्तं प्रजाः प्रेम्णा राजा ऋषभदेवः इति कथयन्ति स्मप्रजा ने प्रेम से ‘ऋषभदेव’ कहा — नाम राजा ने नहीं रखा, प्रजा ने दिया
पुत्राःशते पुत्रेषु विशेषरूपेण भरतः बाहुबलिः च अत्यन्तं सुविख्यातौसौ पुत्रों में भरत तथा बाहुबलि विशेष प्रसिद्ध
पुत्र्यौब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये अपि गणितादिषु शास्त्रेषु प्रवीणे प्रसिद्धे च आस्ताम्ब्राह्मी तथा सुन्दरी — दोनों गणित आदि शास्त्रों में प्रवीण और प्रसिद्ध
ब्राह्मीलिपिःजैनसम्प्रदायानुगुणं ‘ब्राह्मीलिप्याः’ विकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते; तस्यामेव लिप्यां शिलालेखाः उपलभ्यन्तेजैन परम्परा के अनुसार ब्राह्मी लिपि का विकास ब्राह्मी के द्वारा ही हुआ, ऐसा सुना जाता है; उसी लिपि में शिलालेख मिलते हैं
ध्यान देने योग्य दो बातें: (१) पाठ ब्राह्मीलिपि के विषय में ‘जैनसम्प्रदायानुगुणं … इति श्रूयते’ कहता है — अर्थात् यह जैन परम्परा की मान्यता है, ऐसा पाठ स्वयं स्पष्ट करता है। उत्तर लिखते समय यही सावधानी रखनी चाहिए : ‘जैनपरम्परायाः अनुसारं’ जोड़कर लिखिए। (२) पुत्रियों के लिए ‘गणितादिषु शास्त्रेषु प्रवीणे’ कहा गया है — प्राचीन कथा में भी कन्याओं की शास्त्रीय विद्वत्ता का उल्लेख है, केवल गुण-सौन्दर्य का नहीं। यह पाठ का एक सुन्दर संकेत है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘सुविख्यातौ’, ‘प्रवीणे’, ‘प्रसिद्धे’, ‘आस्ताम्’ — सब द्विवचन के रूप हैं, क्योंकि दो-दो व्यक्तियों की बात है (भरत-बाहुबलि; ब्राह्मी-सुन्दरी)। ‘आस्ताम्’ = अस् धातु, लङ्, प्रथमपुरुष द्विवचन। ‘प्रेम्णा’ = प्रेमन् शब्द का तृतीया एकवचन (भावे तृतीया — ‘प्रेम से’)। ‘ब्राह्मीद्वारैव’ = ब्राह्मीद्वारा + एव, यही सन्धि अभ्यास के प्रश्न ५ (च) में पूछी गई है। पुस्तक में छपा एक विसंगत रूप: ‘विकासः … कृता’ में कर्ता ‘विकासः’ पुल्लिङ्ग है, अतः शुद्ध रूप कृतः होना चाहिए (अथवा वाक्य ‘ब्राह्मीलिपेः रचना … कृता’ रूप में)। परीक्षा में पाठ का वाक्य ज्यों का त्यों उद्धृत कीजिए, किन्तु अपने वाक्य में ‘कृतः’ लिखिए।
प्र2.
पाठे उद्धृतस्य द्वितीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, शब्दार्थम्, हिन्दी-अर्थं भावं च लिखत — “दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्। संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥”
उत्तर
दैवाधीनं जगत्सर्वं जन्मकर्मशुभावहम्।
संयोगश्च वियोगश्च न च दैवात्परं बलम्॥

पदच्छेदः — दैव-अधीनम् + जगत् + सर्वम् + जन्म-कर्म-शुभ-आवहम् । संयोगः + च + वियोगः + च + न + च + दैवात् + परम् + बलम् ।

अन्वयः — जन्मकर्मशुभावहं सर्वं जगत् दैवाधीनम् (अस्ति)। संयोगः च वियोगः च (दैवाधीनौ स्तः)। दैवात् परं बलं न च (अस्ति)।

पदम्व्याकरण-रूपःशब्दार्थः
दैवाधीनम्ष.तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व.दैवस्य अधीनम् — भाग्य के अधीन (पुस्तक का शब्दार्थ)
जगत्सर्वम्नपुं.प्र.ए.व.सर्वं जगत् — सारा संसार
जन्मकर्मशुभावहम्बहुव्रीहि/कर्मधारय, नपुं.प्र.ए.व.जन्मनः कर्मणः च शुभम् आवहति यत् — जन्म तथा कर्म के अनुसार शुभ (फल) लाने वाला
संयोगःपुं.प्र.ए.व.मेलनम् — मिलना (पुस्तक का शब्दार्थ)
वियोगःपुं.प्र.ए.व.पृथक्करणम् — बिछुड़ना (पुस्तक का शब्दार्थ)
दैवात् परम्पं.ए.व. + अव्ययम्दैव से बढ़कर, दैव से ऊपर
बलम्नपुं.प्र.ए.व.शक्ति, सामर्थ्य

हिन्दी अर्थ — जन्म तथा कर्म के अनुसार शुभ फल देने वाला यह सारा संसार दैव (नियति) के अधीन है। मिलना और बिछुड़ना — दोनों दैव के ही अधीन हैं; दैव से बढ़कर कोई बल नहीं है।

भावः तथा प्रसंग — पाठ इस श्लोक को ठीक उस मोड़ पर रखता है जहाँ कहता है — ‘परं को वा जानाति विधिलिखितम्। ऋषभदेवस्यापि जीवने काचित् तादृशी घटना संवृत्ता यया तस्य जीवनमेव परिवर्तितम्।’ अर्थात् जिसके पास सब कुछ था — राज्य, सन्तान, यश, समृद्धि — उसके जीवन में भी एक ऐसी घटना आ गई जिसने सब बदल दिया। श्लोक का काम यहाँ भाग्यवाद फैलाना नहीं, बल्कि यह दिखाना है कि मनुष्य के हाथ में उद्यम है, परिणाम पूरा-का-पूरा नहीं। ठीक इसी कारण अगले ही पृष्ठ पर नर्तकी की आकस्मिक मृत्यु ऋषभदेव के मन को झकझोर देती है और वे ‘इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति’ इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं।
दो पाठान्तर-सम्भव अर्थ: ‘जन्मकर्मशुभावहम्’ को दो प्रकार से पढ़ा जा सकता है — (क) बहुव्रीहि : जो संसार जन्म तथा कर्म के अनुसार शुभ-अशुभ फल लाता है; (ख) कर्मधारय-भाव : जन्म तथा कर्म का शुभ फल लाने वाला। दोनों में तात्पर्य एक ही है — फल जन्म तथा कर्म से बँधा है और वह क्रम दैवाधीन है। सन्धि: ‘संयोगश्च’, ‘वियोगश्च’ = संयोगः + च, वियोगः + च (विसर्गसन्धि — अः + च → अश्च); ‘दैवात्परम्’ = दैवात् + परम्; ‘दैवाधीनम्’ = दैव + अधीनम् (दीर्घ सन्धि)। छन्दः — अनुष्टुप्
प्र3.
ऋषभदेवस्य जीवनं परिवर्तयन्ती घटना का आसीत् ? तस्याः अनन्तरं सः किं किम् अकरोत् ?
उत्तर

एकदा ऋषभदेवः राजप्रासादे नृत्यकलाप्रदर्शनम् आयोजितवान्। तत्र आगता काचित् नर्तकी नृत्यकलां प्रदर्शयन्ती सहसा भूमौ पतित्वा मृता। अनया घटनया ऋषभदेवस्य मनः सहसा विक्षुब्धम् अभवत् — इयम् एव तस्य जीवनपरिवर्तिनी घटना आसीत्।

(हिन्दी — एक बार ऋषभदेव ने राजमहल में नृत्यकला का प्रदर्शन आयोजित किया। वहाँ आई हुई कोई नर्तकी नृत्य दिखाते-दिखाते अचानक ज़मीन पर गिरकर मर गई। इस घटना से ऋषभदेव का मन सहसा विचलित हो गया — यही उनके जीवन को बदल देने वाली घटना थी।)

तस्य मनसि उत्पन्नाः प्रश्नाः — ‘कथं काचित् आरोग्यवती स्त्री सहसा मरणं प्राप्तवती ? किं नाम जीवनम् ? कथं जीवनीयम् ?’ इत्यादयः अनेके प्रश्नाः तस्य बुद्धौ आविरभवन्। ‘इह संसारे किमपि शाश्वतं नास्ति, इदं सुखं स्थायि नास्ति’ इति विचिन्त्य स्थिरसुखस्य प्राप्त्यर्थं सः सर्वम् अपि परित्यज्य भिक्षुरूपेण प्रस्थितवान्।

(हिन्दी — ‘एक स्वस्थ स्त्री अचानक मृत्यु को कैसे प्राप्त हो गई? जीवन क्या है? कैसे जीना चाहिए?’ — ऐसे अनेक प्रश्न उनकी बुद्धि में उठे। ‘इस संसार में कुछ भी शाश्वत नहीं है, यह सुख स्थायी नहीं है’ — यह सोचकर स्थिर सुख की प्राप्ति के लिए उन्होंने सब कुछ छोड़कर भिक्षु के रूप में प्रस्थान किया।)

क्रमःकार्यम् (पाठस्य शब्दैः)हिन्दी
स्वस्य विशालं साम्राज्यं स्वपुत्रेषु विभक्तवान्अपना विशाल साम्राज्य पुत्रों में बाँट दिया
‘विनिता’ राज्यं भरताय … समर्प्यविनिता राज्य भरत को दिया
तक्षशिलां बाहुबलये च समर्प्यतक्षशिला बाहुबलि को दी
जीवनस्य परमसत्यम् अन्वेष्टुं प्रस्थितोऽयं महामुनिःजीवन का परम सत्य खोजने के लिए महामुनि बनकर निकल पड़े
तम् अनेके जनाः शिष्यरूपेण अनुसृतवन्तःअनेक लोग शिष्य बनकर उनके पीछे चले
अरण्येषु मौनेन ध्यानं निरन्तरम् अध्ययनं च करोति स्मवनों में मौन रहकर निरन्तर ध्यान तथा अध्ययन करते रहे
यह घटना ही क्यों चुनी गई: नर्तकी का मरण कोई युद्ध या षड्यन्त्र नहीं था — वह सबसे सुन्दर, सबसे जीवन्त क्षण के ठीक बीच हुआ। इसी विरोध ने प्रश्न को तीखा बना दिया : यदि नृत्य करती हुई स्वस्थ स्त्री एक क्षण में समाप्त हो सकती है, तो ‘स्थायी सुख’ किस चीज़ में खोजा जाए? ध्यान दीजिए, ऋषभदेव ने भोग नहीं छोड़ा क्योंकि भोग बुरा था; उन्होंने इसलिए छोड़ा क्योंकि वह अस्थायी था — पाठ के अपने शब्द हैं ‘स्थिरसुखस्य प्राप्त्यर्थम्’। यह त्याग निराशा से नहीं, खोज से जन्मा है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘प्रदर्शयन्ती’ — शतृ/शानच् स्त्रीलिङ्ग कृदन्त, ‘दिखाती हुई’। ‘परित्यज्य’, ‘विचिन्त्य’, ‘समर्प्य’ — तीनों ल्यबन्त (उपसर्ग के साथ क्त्वा प्रत्यय ‘ल्यप्’ बन जाता है : परि + √त्यज् + ल्यप्)। ‘भरताय’, ‘बाहुबलये’ — सम्प्रदाने चतुर्थी (जिसे दिया जाए)। ‘प्रस्थितोऽयम्’ = प्रस्थितः + अयम् — यही सन्धि अभ्यास के प्रश्न ५ (छ) में पूछी गई है। ‘करोति स्म’ — लट् + ‘स्म’ मिलकर भूतकाल का अर्थ देते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ