ऋषभः जनानां जीवने शान्तिं सुरक्षां न्यायिकव्यवस्थां च पुनः सुदृढां कृतवान्। ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च ‘विनिता’ नाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत्। समाजस्य उत्कर्षेण सः जनानां मनस्सु सुप्रतिष्ठितं स्थानं प्राप्तवान्। अतः तं प्रजाः प्रेम्णा ‘राजा ऋषभदेवः’ इति कथयन्ति स्म।
(हिन्दी — ऋषभ ने लोगों के जीवन में शान्ति, सुरक्षा और न्याय-व्यवस्था को फिर से मज़बूत किया। उसके कुशल शासन और कौशल से ‘विनिता’ नाम के नगर का निर्माण हुआ। समाज के उत्कर्ष के कारण उसने लोगों के मन में अच्छी तरह जमा हुआ स्थान पा लिया। इसीलिए प्रजा उसे प्रेम से ‘राजा ऋषभदेव’ कहती थी।)
| विषयः | पाठस्य कथनम् | हिन्दी |
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| नगरनिर्माणम् | ऋषभस्य दक्षशासनेन कौशलेन च विनितानाम्नः नगरस्य निर्माणम् अभवत् | ‘विनिता’ नगर बसा — यही आगे भरत को दिया गया |
| नामकरणम् | तं प्रजाः प्रेम्णा राजा ऋषभदेवः इति कथयन्ति स्म | प्रजा ने प्रेम से ‘ऋषभदेव’ कहा — नाम राजा ने नहीं रखा, प्रजा ने दिया |
| पुत्राः | शते पुत्रेषु विशेषरूपेण भरतः बाहुबलिः च अत्यन्तं सुविख्यातौ | सौ पुत्रों में भरत तथा बाहुबलि विशेष प्रसिद्ध |
| पुत्र्यौ | ब्राह्मी सुन्दरी चेति द्वे कन्ये अपि गणितादिषु शास्त्रेषु प्रवीणे प्रसिद्धे च आस्ताम् | ब्राह्मी तथा सुन्दरी — दोनों गणित आदि शास्त्रों में प्रवीण और प्रसिद्ध |
| ब्राह्मीलिपिः | जैनसम्प्रदायानुगुणं ‘ब्राह्मीलिप्याः’ विकासः ब्राह्मीद्वारैव कृता इति श्रूयते; तस्यामेव लिप्यां शिलालेखाः उपलभ्यन्ते | जैन परम्परा के अनुसार ब्राह्मी लिपि का विकास ब्राह्मी के द्वारा ही हुआ, ऐसा सुना जाता है; उसी लिपि में शिलालेख मिलते हैं |