शारदा अध्याय 10 पाठः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठस्य प्रथमस्य गद्यांशस्य आशयं लिखत — “आसीत् युगानाम् आरम्भे प्रजानां प्रियः नाभिनामकः कश्चन महाराजः। सः राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासनादिषु च समर्थः। तस्य पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती करुणाशालिनी च। तयोः एव प्रियपुत्रः ऋषभः। ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञश्च आसीत्। यौवनेन विलसन्तं तं राजकुमारं वीक्ष्य नाभिः तस्मै राज्यभारं समर्पयितुम् अचिन्तयत्।”
उत्तर

आशयः — युगानाम् आरम्भे नाभिः नाम कश्चन महाराजः आसीत्, यः प्रजानां प्रियः, राजनीतौ युद्धतन्त्रे प्रशासने च समर्थः च आसीत्। तस्य पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती करुणाशालिनी च आसीत्। तयोः प्रियः पुत्रः ऋषभः सर्वगुणसम्पन्नः, विद्यायाम् अधीतः, राजनीतिज्ञः च आसीत्। यौवनेन शोभमानं तं राजकुमारं दृष्ट्वा नाभिः तस्मै राज्यभारं दातुं चिन्तितवान्।

(हिन्दी — युगों के आरम्भ में नाभि नाम का एक महाराज था, जो प्रजा को प्रिय था तथा राजनीति, युद्धतन्त्र और प्रशासन आदि में समर्थ था। उसकी पत्नी मरुदेवी बुद्धिमती और करुणामयी थी। उन्हीं दोनों का प्रिय पुत्र था ऋषभ — सब गुणों से युक्त, पढ़ा-लिखा और राजनीति का जानकार। यौवन से शोभित उस राजकुमार को देखकर नाभि ने सोचा कि उसे राज्य का भार सौंप दिया जाए।)

पदम्व्याकरण-रूपःअर्थः
युगानाम् आरम्भेष.ब.व. + स.ए.व.युगों के आरम्भ में — कथा को अत्यन्त प्राचीन काल में रखने वाला वाक्यांश
नाभिनामकःबहुव्रीहि, पुं.प्र.ए.व.नाभिः नाम यस्य सः — नाभि नाम वाला
करुणाशालिनीस्त्री.प्र.ए.व.दयायुक्ता — दयालु (पुस्तक का शब्दार्थ)
अधीतविद्यःबहुव्रीहि, पुं.प्र.ए.व.अधीता विद्या येन सः — जिसने विद्या पढ़ ली, पढ़ा-लिखा
विलसन्तम्शतृ-कृदन्त, पुं.द्वि.ए.व.शोभमानम् — शोभा पाते हुए (को)
वीक्ष्यल्यबन्त (वि + √ईक्ष् + ल्यप्)दृष्ट्वा — देखकर
समर्पयितुम्तुमुन्नन्तदातुम् — सौंपने के लिए
अचिन्तयत्√चिन्त्, लङ्, प्र.पु.ए.व.चिन्तितवान् — विचार किया (पुस्तक का शब्दार्थ)
यह गद्यांश पाठ की भूमिका कैसे बनाता है: तीन बातें यहीं तय हो जाती हैं और पूरी कथा उन्हीं पर चलती है। (१) वंश — नाभि तथा मरुदेवी का पुत्र ऋषभ; (२) पात्रता — ऋषभ केवल राजपुत्र नहीं, ‘सर्वगुणसम्पन्नः, अधीतविद्यः, राजनीतिज्ञश्च’ है, अर्थात् राज्य उसे जन्म के कारण नहीं, योग्यता के कारण मिलने वाला है; (३) माँ का गुण — मरुदेवी ‘बुद्धिमती करुणाशालिनी’ है, और आगे ऋषभ का शासन भी इन्हीं दो गुणों — बुद्धि तथा करुणा — का मेल दिखाएगा। इसीलिए लेखक ने रानी के लिए ये दो ही विशेषण चुने।
ध्यान दें: ‘राजनीतिज्ञश्च’ = राजनीतिज्ञः + च — विसर्गसन्धि (अः + च → अश्च, श्चुत्व)। ‘तयोः’ द्विवचन षष्ठी है — ‘उन दोनों का’, अर्थात् माता-पिता दोनों का; यहाँ सम्बन्धे षष्ठी है।
प्र2.
“अथैकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः समुद्भवन्…” इति द्वितीयस्य गद्यांशस्य आशयं लिखत, ऋषभस्य समस्या-विश्लेषणं च स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

आशयः — एकदा समाजे दुर्भिक्षादयः समस्याः उत्पन्नाः, जनेषु च परस्परं विद्वेषादयः भावनाः प्रादुर्भूताः। तदा नाभिः ‘अयं कालः ऋषभस्य राजनीतेः परीक्षार्थं सुयोग्यः’ इति मन्यमानः तस्मै राज्यं समर्पितवान्। ऋषभः यदा राजा अभवत्, तदा सः आदौ ‘जनानां समस्याः काः, दुर्भिक्षस्य कारणं किम्, जनेषु कुतः परस्परं विद्वेषः, समस्यानां समाधानोपायाः के’ — इत्यादिषु विषयेषु चिन्तनं कृतवान्। तेन काचित् स्पष्टकल्पना प्राप्ता — जनानाम् आलस्यं, कृषिकार्ये न्यूनता, प्रजासु उत्पादनक्षमतायाः अभावः च — एताः एव मूलसमस्याः सन्ति इति।

(हिन्दी — एक बार समाज में अकाल आदि समस्याएँ उठ खड़ी हुईं और लोगों में परस्पर द्वेष आदि भावनाएँ जाग उठीं। तब नाभि ने सोचा कि ‘यह समय ऋषभ की राजनीति की परीक्षा के लिए सबसे उपयुक्त है’ और उसे राज्य सौंप दिया। ऋषभ ने राजा बनते ही सबसे पहले यह विचार किया कि लोगों की समस्याएँ क्या हैं, अकाल का कारण क्या है, लोगों में परस्पर द्वेष क्यों है और समाधान के उपाय क्या हैं। इस चिन्तन से उसे एक स्पष्ट धारणा मिली — लोगों का आलस्य, खेती में कमी और प्रजा में उत्पादन-क्षमता का अभाव — यही मूल समस्याएँ हैं।)

ऋषभ का समस्या-विश्लेषण चार चरणों में —

चरणःपाठस्य वाक्यांशःक्या हो रहा है
१. लक्षणजनानां समस्याः काःपहले यह देखा कि दिखाई क्या दे रहा है — भूख, अभाव, झगड़ा
२. कारणदुर्भिक्षस्य कारणं किम्फिर पूछा — अकाल हुआ क्यों? लक्षण पर नहीं रुके
३. सामाजिक परिणामजनेषु कुतः परस्परं विद्वेषःयह भी देखा कि अभाव आपस के द्वेष में कैसे बदल जाता है
४. उपायसमाधानोपायाः केअन्त में हल पूछा — और तभी ‘स्पष्टकल्पना’ मिली
इस अंश का सन्देश: ऋषभ ने अन्न बाँटकर तुरन्त वाहवाही नहीं लूटी। उसने पहले कारण खोजा और पाया कि जड़ बाहर नहीं, भीतर है — आलस्यम्, कृषिकार्ये न्यूनता, उत्पादनक्षमतायाः अभावः। अकाल केवल वर्षा की कमी नहीं था, काम की कमी था। यही कारण है कि आगे उसका उपाय भी अन्न-दान नहीं, कौशल-प्रशिक्षण है। पाठ यहाँ एक स्थायी बात सिखाता है — जो शासक लक्षण का इलाज करता है वह बार-बार वही संकट झेलता है; जो कारण का इलाज करता है वह संकट को समाप्त कर देता है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘अथैकदा’ = अथ + एकदा (वृद्धि सन्धि — अ + ए → ऐ)। ‘समुद्भवन्’, ‘आविरभवन्’ — दोनों लङ् लकार, प्रथमपुरुष बहुवचन (भूतकाल)। ‘चेत्येतादृश्यः’ = च + इति + एतादृश्यः — यही सन्धि अभ्यास के प्रश्न ५ (ख) तथा (ङ) में पूछी गई है। ‘मन्यमानः’ शानच्-कृदन्त है — ‘मानता हुआ’।
प्र3.
ऋषभः प्रजाः केषु जीवनकौशलेषु प्रशिक्षितवान्, तस्य च कः परिणामः अभवत् — तृतीयस्य गद्यांशस्य आधारेण लिखत।
उत्तर

ऋषभः मूलसमस्यानां परिष्काराय जनानां सुखमयजीवनाय च विविधाः योजनाः रचितवान्, विशेषरूपेण च एतानि जीवनकौशलानि प्रशिक्षितवान् — कृषिकार्यम्, विविधपदार्थैः भोजननिर्माणम्, तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणम्, गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनम्, काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः च गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणम्, पात्रनिर्माणम्, गृहनिर्माणम्, नगरनिर्माणम् इत्यादीनि च।

(हिन्दी — ऋषभ ने मूल समस्याओं के समाधान के लिए और लोगों के सुखमय जीवन के लिए अनेक योजनाएँ बनाईं, और विशेष रूप से इन जीवन-कौशलों का प्रशिक्षण दिया — खेती, अनेक पदार्थों से भोजन बनाना, धागों से कपड़ा बुनना, गाय-घोड़े आदि पशुओं का पालन, लकड़ी-धातु-पत्थर से घर की उपयोगी वस्तुएँ बनाना, बर्तन बनाना, घर बनाना और नगर बसाना।)

कौशलम् (पाठस्य शब्दैः)किस सामग्री सेकौन-सी आवश्यकता पूरी हुई
कृषिकार्यम्भूमिः, बीजम्अन्न — दुर्भिक्ष की जड़ पर सीधा प्रहार
विविधपदार्थैः भोजननिर्माणम्अन्नम्, शाकाः, पदार्थाःपका हुआ, विविध भोजन
तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणम्तन्तवः (धागे)वस्त्र
गवाम् अश्वादीनां पशूनां पालनम्पशवःदूध, खेती में सहायता, यातायात
गृहोपयोगिनां वस्तूनां निर्माणम्काष्ठैः, धातुभिः, शिलाभिःऔज़ार तथा घर की वस्तुएँ
पात्रनिर्माणम्मृत्तिका, धातुःबर्तन — भोजन पकाने-रखने के लिए
गृहनिर्माणम्, नगरनिर्माणम्शिलाः, काष्ठम्आश्रय तथा बसावट — आगे ‘विनिता’ नगर इसी का फल है

परिणामः — तेन क्रमशः जनाः सक्रियाः अभवन्, जीवनपद्धतिं च परिवर्तितवन्तः। क्रमशः जनानाम् आर्थिकस्थितिः अपि सुदृढा जाता। जनाः स्वयमेव गृहाणां, विविधभोज्यपदार्थानां, नित्योपयोगिवस्तूनां च निर्माणं कर्तुम् आरब्धवन्तः। कृषिकार्याणि अपि प्रचुरतया आरब्धानि। तेन जनानां समस्याः स्वयमेव परिहृताः, राज्यं पुनः सुभिक्षं च अभवत्।

(हिन्दी — इससे धीरे-धीरे लोग सक्रिय हो गए और उन्होंने अपनी जीवन-पद्धति बदल ली। क्रमशः उनकी आर्थिक स्थिति भी मज़बूत हो गई। लोग स्वयं ही घरों का, तरह-तरह के खाद्य पदार्थों का और नित्य उपयोग की वस्तुओं का निर्माण करने लगे। खेती भी बड़े पैमाने पर होने लगी। इससे लोगों की समस्याएँ अपने आप दूर हो गईं और राज्य फिर से सुभिक्ष हो गया।)

‘स्वयमेव’ शब्द ही इस अंश की कुंजी है: पाठ दो बार यह शब्द रखता है — ‘जनाः स्वयमेव … निर्माणं कर्तुम् आरब्धवन्तः’ और ‘समस्याः स्वयमेव परिहृताः’। अर्थात् राजा ने समस्या हल नहीं की, उसने लोगों को समस्या हल करने योग्य बना दिया। यही ‘प्रशिक्षितवान्’ क्रिया का पूरा अर्थ है — दान नहीं, दक्षता। इसीलिए फल स्थायी हुआ और ‘राज्यं पुनः सुभिक्षम्’ हो गया।
करणे तृतीया: ‘तन्तुभिः वस्त्रनिर्माणम्’, ‘काष्ठैः धातुभिः शिलाभिः … निर्माणम्’, ‘विविधपदार्थैः भोजननिर्माणम्’ — इन सब में साधन (करण) के लिए तृतीया विभक्ति है, नियम है «कर्तृकरणयोस्तृतीया»। ‘गवाम्’ = गो शब्द का षष्ठी बहुवचन (अनियमित रूप — गौः, गावौ, गावः … गवाम्)।
प्र4.
पाठे उद्धृतस्य प्रथमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम्, अन्वयम्, शब्दार्थम्, हिन्दी-अर्थं भावं च लिखत — “प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्। नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥”
उत्तर
प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।
नात्मप्रियं हितं राज्ञः प्रजानां तु प्रियं हितम्॥

पदच्छेदः — प्रजा-सुखे + सुखम् + राज्ञः + प्रजानाम् + च + हिते + हितम् । न + आत्म-प्रियम् + हितम् + राज्ञः + प्रजानाम् + तु + प्रियम् + हितम् ।

अन्वयः — राज्ञः सुखं प्रजासुखे (अस्ति), प्रजानां हिते च (राज्ञः) हितम् (अस्ति)। राज्ञः आत्मप्रियं हितं न (भवति), प्रजानां प्रियं तु (राज्ञः) हितम् (भवति)।

पदम्व्याकरण-रूपःशब्दार्थः
प्रजासुखेष.तत्पुरुषः, नपुं.स.ए.व.प्रजायाः सुखे — प्रजा के सुख में
राज्ञःराजन्, पुं.ष.ए.व.राजा का
हितेनपुं.स.ए.व.भलाई में, कल्याण में
आत्मप्रियम्ष.तत्पुरुषः, नपुं.प्र.ए.व.आत्मनः प्रियम् — जो स्वयं को प्रिय लगे
प्रियम्नपुं.प्र.ए.व.जो अच्छा लगे (रुचिकर)
हितम्नपुं.प्र.ए.व.जो लाभकारी हो (कल्याणकर)
तुअव्ययम्किन्तु, ही (भेद दिखाने वाला अव्यय)

हिन्दी अर्थ — राजा का सुख प्रजा के सुख में है, और प्रजा के हित में ही राजा का हित है। जो राजा को स्वयं प्रिय लगे, वह उसका हित नहीं है; प्रजा को जो प्रिय है, वही राजा का हित है।

भावः — श्लोक ‘प्रिय’ और ‘हित’ का भेद खोलता है। प्रियम् वह है जो अच्छा लगे; हितम् वह है जो अच्छा करे। साधारण मनुष्य के लिए ये दोनों अलग-अलग हो सकते हैं, किन्तु राजा के लिए श्लोक एक कड़ी शर्त रखता है — राजा का हित उसकी अपनी रुचि में नहीं, प्रजा की रुचि में है। इसीलिए पाठ ने यह श्लोक ठीक उसी स्थान पर रखा है जहाँ ऋषभ का शासन सफल होता है : उसने वही किया जो प्रजा के लिए आवश्यक था, न कि वह जो राजा को सुखकर लगता। यह श्लोक कौटिल्य के अर्थशास्त्र का प्रसिद्ध वचन है और भारतीय राजधर्म का सार माना जाता है।
छन्दः तथा सन्धि: श्लोक अनुष्टुप् छन्द में है — चार चरण, प्रत्येक में आठ अक्षर। ‘नात्मप्रियम्’ = न + आत्मप्रियम् (दीर्घ सन्धि — अ + आ → आ)। ‘प्रजानाम्’ में सम्बन्धे षष्ठी तथा ‘प्रजासुखे’, ‘हिते’ में अधिकरणे सप्तमी है — ‘किसमें’ का उत्तर देने वाली विभक्ति।
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