कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 9 कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ-परिचय — पुस्तक स्वयं आरम्भ में बताती है — ‘रामायणं महाभारतं चेति द्वौ प्रसिद्धौ इतिहास-ग्रन्थौ।’ महाभारत को आधार बनाकर अनेक ग्रन्थ रचे गए; उन्हीं में महामहोपाध्याय श्री रङ्गनाथशर्मा का लघुरूपक एकचक्रम् भी एक है। महाभारत में वर्णित बकासुरवध ही इसका कथावस्तु है, और यह पाठ्यभाग उसी रूपक के तृतीय-चतुर्थ अङ्कों से लिया गया है। पूर्वकथा — वारणावत के लाक्षागृह से बचकर पाण्डव एकचक्रा नगरी में एक ब्राह्मण के घर छिपकर रह रहे हैं। नगर के पास पर्वत पर रहने वाले बक नामक असुर के साथ नगरवासियों की सन्धि है — प्रतिदिन एक नगरवासी स्वयं जाकर उसका भक्ष्य बनेगा। उस दिन बारी उसी ब्राह्मण-परिवार की थी। रोने की आवाज़ सुनकर कुन्ती ने कारण पूछा और वचन दिया कि ‘अपने पुत्रों में से एक को मैं बकासुर के पास भेजूँगी’। कथावस्तु — कुन्ती भीम को अपनी प्रतिज्ञा बताती है। भीम तनिक भी नहीं हिचकता — वह कहता है कि ब्राह्मण
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| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी अर्थ | पाठ का वाक्य |
|---|---|---|---|
| आतिथेयः (पुं.प्र.ए.व.) | अतिथौ साधुः, अतिथिसेवाकारकः | अतिथि की सेवा करने वाला | आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन। |
| आयोधनम् (नपुं.) | युद्धम् | युद्ध | न केवलं भोजनमुपस्थितम्। आयोधनमपि। |
| उत्फुल्लाक्षः (बहुब्रीहि, पुं.प्र.ए.व.) | उत्फुल्ले अक्षिणी यस्य सः, विकसितनयनः | खिली हुई आँखों वाला | हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः। |
| औदरिकः (पुं.प्र.ए.व.) | भोजनप्रियः | केवल पेट भरने वाला | स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य। |
| क्षत्रियाण्या (स्त्री.तृ.ए.व.) | क्षत्रियस्य पत्नी, तया | क्षत्रिय की पत्नी ने | क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। |
| जठरस्थाय (पुं.च.ए.व.) | जठरे तिष्ठति इति, तस्मै | पेट में विद्यमान के लिए | सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। |
| निषूदकः (पुं.प्र.ए.व.) | विनाशकः | विनाश करने वाला | निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्। |
| परिदेवयते (परि + √दिव् + णिच्) | विलपति | विलाप करता है | स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते। |
| पीवरौ (पुं.प्र.द्वि.व.) | स्थूलौ | (दो) मोटे, पुष्ट | इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। |
| प्रतिवेशी (पुं.प्र.ए.व.) | निकटगृहवासी | पड़ोसी | श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। |
| प्रतिश्रवः (पुं.प्र.ए.व.) | प्रतिज्ञा | वचन, प्रतिज्ञा | युक्तोऽयं प्रतिश्रवः। |
| प्रत्यादेशम् (पुं.द्वि.ए.व.) | उल्लङ्घनम्, अवज्ञा | अवज्ञा, उल्लङ्घन | न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति। |
| मानुषापसद (सप्तमी-तत्पुरुषः, सम्बोधनम्) | मानुषेषु अपसद | हे नीच मनुष्य! | मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। |
| मृष्टान्नम् (कर्मधारयः) | मृष्टम् अन्नम् | स्वादिष्ट भोजन | भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरयित्वा… |
| व्याघ्रगह्वरम् (नपुं.द्वि.ए.व.) | व्याघ्रस्य गह्वरम् | बाघ की गुफा | चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्। |
| श्रोत्रियः (पुं.प्र.ए.व.) | श्रोत्रम् (वेदम्) अधीते इति | जिसने वेद पढ़ा हो | श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। |
| हुताशनाय (पुं.च.ए.व.) | हुतम् अशनं यस्य, तस्मै | अग्नि के लिए | मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। |
अभ्यास
- पाठ-परिचयः तथा पूर्वकथा
- नाट्यांशः १
- पाठस्य त्रयः श्लोकाः
- नाट्यांशः २
- नाट्यांशः ३
- सर्वं शब्देन भासते
- अत्र इदम् अवधेयम्
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः
- यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्