प्र1.
वीरस्य भुजयोः बलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे।
उत्तर
उत्तरम् — भुजबलम्। (हिन्दी — भुजाओं का बल, बाहुबल।)
विग्रहः — भुजयोः बलम्
समस्तपदम् — भुजबलम्
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः (‘भुजयोः’ षष्ठी द्विवचन का लोप होकर पूर्वपद ‘भुज’ शेष रहा)
समस्तपदम् — भुजबलम्
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः (‘भुजयोः’ षष्ठी द्विवचन का लोप होकर पूर्वपद ‘भुज’ शेष रहा)
षष्ठी-तत्पुरुष ही क्यों: विग्रह-वाक्य में जो विभक्ति है, समास का नाम उसी से पड़ता है। यहाँ ‘भुजयोः’ षष्ठी में है, अतः यह षष्ठी-तत्पुरुष है। ध्यान दीजिए — समास बनते ही द्विवचन का चिह्न लुप्त हो जाता है, पर अर्थ में दोनों भुजाएँ ही रहती हैं। पाठ में यह पद ‘भुजबलमाश्रित्य’ के रूप में आया है (भुजबलम् + आश्रित्य)।
पाठ से जोड़िए: यही ‘भुजबल’ भीम की पहचान है — युधिष्ठिर कहते हैं ‘यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे’, और भीम स्वयं श्लोक में कहता है ‘इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम’। दोनों वाक्य एक ही बात कहते हैं।