शारदा अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
वीरस्य भुजयोः बलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहे।
उत्तर

उत्तरम् — भुजबलम् (हिन्दी — भुजाओं का बल, बाहुबल।)

विग्रहः — भुजयोः बलम्
समस्तपदम् — भुजबलम्
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः (‘भुजयोः’ षष्ठी द्विवचन का लोप होकर पूर्वपद ‘भुज’ शेष रहा)
षष्ठी-तत्पुरुष ही क्यों: विग्रह-वाक्य में जो विभक्ति है, समास का नाम उसी से पड़ता है। यहाँ ‘भुजयोः’ षष्ठी में है, अतः यह षष्ठी-तत्पुरुष है। ध्यान दीजिए — समास बनते ही द्विवचन का चिह्न लुप्त हो जाता है, पर अर्थ में दोनों भुजाएँ ही रहती हैं। पाठ में यह पद ‘भुजबलमाश्रित्य’ के रूप में आया है (भुजबलम् + आश्रित्य)।
पाठ से जोड़िए: यही ‘भुजबल’ भीम की पहचान है — युधिष्ठिर कहते हैं ‘यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे’, और भीम स्वयं श्लोक में कहता है ‘इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम’। दोनों वाक्य एक ही बात कहते हैं।
प्र2.
भवता धर्माणां सङ्ग्रहः द्रष्टव्यः।
उत्तर

उत्तरम् — धर्मसङ्ग्रहः (हिन्दी — धर्मों का समुच्चय।)

विग्रहः — धर्माणां सङ्ग्रहः
समस्तपदम् — धर्मसङ्ग्रहः
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः (षष्ठी बहुवचन ‘धर्माणाम्’ का लोप)
भीम इसे ‘सङ्ग्रह’ क्यों कहता है: यहाँ एक साथ अनेक धर्म सध रहे हैं — (१) उपकार का प्रत्युपकार, (२) माता की आज्ञा का पालन, (३) निर्बल की रक्षा, (४) क्षत्रिय का कर्तव्य। इसलिए भीम कहता है ‘धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः’ — ‘आप धर्म जानते हैं, तो देखिए, यहाँ तो धर्मों का ढेर लगा है।’ एक शब्द से पूरा तर्क खड़ा हो जाता है।
सन्धि भी देखिए: पाठ में यह ‘धर्मसङ्ग्रहोऽत्र’ रूप में है = धर्मसङ्ग्रहः + अत्र (विसर्गसन्धिः) — यही अभ्यास के प्रश्न ४ (झ) का उत्तर है। ‘सङ्ग्रहः’ स्वयं सम् + ग्रहः से बना है (परसवर्ण-सन्धि)।
प्र3.
नहि मातुः आज्ञा प्रत्यादेशमर्हति।
उत्तर

उत्तरम् — मातुराज्ञा (मातृ-आज्ञा)। (हिन्दी — माता की आज्ञा।)

विग्रहः — मातुः आज्ञा
समस्तपदम् — मातुराज्ञा
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः
सन्धिः — मातुः + आज्ञा → मातुराज्ञा (विसर्गसन्धिः — विसर्ग का ‘र्’, क्योंकि आगे स्वर है)
यहाँ दो बातें एक साथ सधती हैं: पहले समास बनता है (मातुः आज्ञा → मातृ + आज्ञा) और फिर सन्धि होकर ‘मातुराज्ञा’ रूप बनता है। ऐसे प्रश्नों में उत्तर वही रूप लिखिए जो पाठ में छपा है — ‘मातुराज्ञा’। ‘मातृ’ ऋकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द है, इसकी षष्ठी एकवचन ‘मातुः’ होती है (पितृ → पितुः की तरह)।
वाक्य का महत्त्व: ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ पाठ का सूत्र-वाक्य है और अभ्यास के प्रश्न २ (ङ) तथा प्रश्न ३ (१) — दोनों में आता है। एक ही वाक्य तीन प्रश्नों का उत्तर देता है।
प्र4.
धनुः धरति इति अहम् अनुगमिष्यामि।
उत्तर

उत्तरम् — धनुर्धरः (हिन्दी — धनुष धारण करने वाला, धनुर्धर।)

विग्रहः — धनुः धरति इति
समस्तपदम् — धनुर्धरः
समासः — उपपद-तत्पुरुषः (कर्म ‘धनुः’ + धातु ‘√धृ’ से बना कृदन्त पद)
सन्धिः — धनुः + धरः → धनुर्धरः (विसर्ग का ‘र्’)
उपपद-तत्पुरुष क्या है: जब समास के उत्तरपद में धातु से बना कृदन्त हो और पूर्वपद उसका कर्म हो, तब वह उपपद-तत्पुरुष कहलाता है। इसी प्रकार पाठ के अन्य पद — मानुषभोजी (मानुषान् भुङ्क्ते इति), राक्षसध्वंसी (राक्षसान् ध्वंसयति इति), भूमिपालाः (भूमिं पालयन्ति इति), शकटपूरम् (शकटं पूरयति इति)। ‘इति’ शब्द विग्रह में दिखे तो प्रायः उपपद-तत्पुरुष ही होता है।
पाठ का प्रसङ्ग: यह अर्जुन का वाक्य है — ‘धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि’ = धनुर्धरः + अहम् + अनुगमिष्यामि। अर्थात् ‘धनुर्धर मैं तुम्हारे साथ चलूँगा।’ इसी का उत्तर भीम ‘मा मैवम्’ कहकर देता है।
प्र5.
नहि खरदंष्ट्रः मृगाणाम् अधिपः सहायमपेक्षते।
उत्तर

उत्तरम् — मृगाधिपः (हिन्दी — मृगों का स्वामी, अर्थात् सिंह।)

विग्रहः — मृगाणाम् अधिपः
समस्तपदम् — मृगाधिपः
समासः — षष्ठी-तत्पुरुषः
सन्धिः — मृग + अधिपः → मृगाधिपः (दीर्घ-सन्धिः, अ + अ = आ)
‘मृगाधिप’ का अर्थ ‘हिरन’ नहीं: ‘मृग’ का सामान्य अर्थ पशु/हिरन है, पर ‘मृगों का अधिपति’ का अर्थ सिंह होता है — जैसे ‘मृगेन्द्र’, ‘मृगराज’। इसीलिए भीम कहता है — ‘तीखी दाढ़ों वाला सिंह सहायक नहीं ढूँढ़ता’। यदि इसे ‘हिरन’ समझ लिया जाए तो पूरा वाक्य निरर्थक हो जाएगा — यही इस प्रश्न की परीक्षा है।
जोड़कर देखिए: यही ‘मृग’ शब्द पाठ में तीन जगह और आया है — ‘सिंहः क्षुद्रमृगं यथा’ (श्लोक २, वहाँ अर्थ ‘तुच्छ पशु’), ‘चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्’ (बक का कथन, वहाँ अर्थ ‘शिकार’), तथा यहाँ ‘मृगाधिपः’ (अर्थ ‘सिंह’)। एक ही शब्द, तीन अर्थ — प्रसङ्ग ही अर्थ तय करता है।
प्र6.
अस्य पुरस्य न दूरे वर्तते पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।
उत्तर

उत्तरम् — अदूरवर्ति (पाठ में सप्तमी रूप — अदूरवर्तिनि)। (हिन्दी — दूर न स्थित, अर्थात् पास ही स्थित।)

विग्रहः — न दूरे वर्तते इति
समस्तपदम् — अदूरवर्ति → पर्वतस्य विशेषणरूपेण सप्तम्याम् — अदूरवर्तिनि
समासः — नञ्-तत्पुरुषः (न दूरम् = अदूरम्) तथा उसके बाद ‘वर्ति’ (√वृत् + णिनि) जुड़कर उपपद-रचना
नियम — नञ् समास में व्यञ्जनादि पद से पहले ‘न’ का ‘अ’ हो जाता है : न + दूरम् = अदूरम्
पाठ का प्रयोग: पृष्ठ ११२ पर कुन्ती कहती है — ‘अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः।’ अभ्यास ने उसी वाक्य को खोलकर ‘न दूरे वर्तते’ कर दिया है और समस्तपद बनाने को कहा है। पूर्वकथा में इसी अर्थ का दूसरा पद भी है — ‘नातिदूरस्थितेन बकनाम्ना असुरेण’ (न + अति + दूरस्थितेन)।
भाव: ‘अदूरवर्ति’ केवल दूरी नहीं बताता, भय की निकटता बताता है — राक्षस पास ही है, इसीलिए नगर उसकी शर्त मानने को विवश है। यही एक शब्द पूरे नगर की दुर्दशा का कारण स्पष्ट कर देता है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ