कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन2026-09-19

प्र1.
…………………… मृष्टान्नम्।
उत्तर

उत्तरम् — शकटपूरं मृष्टान्नम्। (हिन्दी — गाड़ी भर स्वादिष्ट भोजन।)

पाठ की पंक्ति — ‘भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरयित्वा प्रेषणीयं भवति राक्षसाय।’ (कुन्ती, पृष्ठ ११४)
विशेष्य ‘मृष्टान्नम्’ — नपुंसकलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन
अतः विशेषण भी वही रूप — शकटपूरम्
विशेषण का नियम: ‘विशेषणं विशेष्यनिघ्नम्’ — विशेषण सदा अपने विशेष्य के लिङ्ग, वचन तथा विभक्ति का अनुसरण करता है। मञ्जूषा के सात पदों में से केवल ‘शकटपूरम्’ ही नपुंसकलिङ्ग एकवचन में है और अर्थ की दृष्टि से भी भोजन के साथ ही जुड़ता है। शेष पद या तो पुंलिङ्ग हैं (प्रतिवेशी, खरदंष्ट्रः, जठरस्थः, कौन्तेयः), या स्त्रीलिङ्ग (क्षत्रियाणी), या द्विवचन (पीवरौ)।
शब्द-रचना: ‘शकटपूरम्’ = शकटं पूरयति इति — गाड़ी को भर देने वाला (उपपद-तत्पुरुष)। ‘मृष्टान्नम्’ = मृष्टम् अन्नम् (कर्मधारय) — यही अभ्यास के प्रश्न ८ का ‘यथा’ भी है।
प्र2.
…………………… ब्राह्मणः।
उत्तर

उत्तरम् — प्रतिवेशी ब्राह्मणः। (हिन्दी — पड़ोसी ब्राह्मण।)

पाठ की पंक्ति — ‘तदिदानीं पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य।’ (कुन्ती, पृष्ठ ११५)
तथा — ‘श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति।’ (भीमः, पृष्ठ ११४)
विशेष्य ‘ब्राह्मणः’ — पुंलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन → विशेषण प्रतिवेशी (नकारान्त पुंलिङ्ग, प्रथमा एकवचन)
अर्थ भी नियम भी: पाठ में यही जोड़ी दो बार आई है, इसलिए उत्तर पर सन्देह नहीं। व्याकरण की दृष्टि से भी ‘प्रतिवेशी’ (प्रतिवेशिन् शब्द) पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन का रूप है, ठीक ‘ब्राह्मणः’ की तरह। शब्दार्थ-तालिका इसका अर्थ देती है — ‘प्रतिवेशी = निकट गृहवासी = पड़ोसी’।
ध्यान दें: पाठ में यह पद तीन विभक्तियों में मिलता है — प्रतिवेशिने (चतुर्थी : ‘प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय’), प्रतिवेशी (प्रथमा), प्रतिवेशिनः (षष्ठी : ‘प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य’)। तीनों जगह विशेष्य ‘ब्राह्मण’ ही है और विशेषण उसी की विभक्ति में ढलता गया है।
प्र3.
…………………… मृगाधिपः।
उत्तर

उत्तरम् — खरदंष्ट्रः मृगाधिपः। (हिन्दी — तीखी दाढ़ों वाला मृगराज (सिंह)।)

पाठ की पंक्ति — ‘न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।’ (भीमः, पृष्ठ ११५)
सन्धिविच्छेदः — खरदंष्ट्रः + मृगाधिपः (विसर्गसन्धिः, अः + म् → ओ)
दोनों पुंलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन
समास पहचानिए: ‘खरदंष्ट्रः’ = खराः दंष्ट्राः यस्य सः — जिसकी दाढ़ें तीखी हों, वह — यह बहुव्रीहि समास है, इसीलिए यह विशेषण की तरह चलता है और उसे कोई विशेष्य चाहिए। ‘मृगाधिपः’ = मृगाणाम् अधिपः (षष्ठी-तत्पुरुष) — यह संज्ञा है। इसलिए ‘खरदंष्ट्रः’ विशेषण और ‘मृगाधिपः’ विशेष्य — यही जोड़ी बनेगी।
भाव: यह वाक्य अर्जुन के प्रस्ताव का उत्तर है — ‘सिंह को सहायक की आवश्यकता नहीं होती।’ यहाँ सिंह का उल्लेख भीम के लिए है (अप्रस्तुतप्रशंसा), और अगला श्लोक ‘सिंहः क्षुद्रमृगं यथा’ इसी बात को खोलकर कह देता है।
प्र4.
…………………… भीमः।
उत्तर

उत्तरम् — कौन्तेयः भीमः। (हिन्दी — कुन्तीपुत्र भीम।)

पाठ की पंक्ति — ‘मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान् ?’ (बकः) तथा ‘कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः।’ (भीमसेनः, पृष्ठ ११७)
कुन्त्याः अपत्यं पुमान् = कौन्तेयः (कुन्ती + ढक् प्रत्ययः)
पुंलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन — ठीक ‘भीमः’ की तरह
यह पद क्यों महत्त्वपूर्ण है: ‘कौन्तेय’ अपत्यवाचक (मातृनामाश्रित) पद है — कुन्ती का पुत्र। नाटक के चरम क्षण में बक इसी शब्द से चौंकता है, क्योंकि कौन्तेय का अर्थ है ‘वही, जिसने मेरे मित्र हिडिम्ब को मारा’। भीम भी उत्तर में इसी शब्द को दोहराता है — ‘कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः’। एक ही शब्द से परिचय, चुनौती और पूर्वकथा — तीनों जुड़ जाते हैं।
ऐसे और पद: कुन्ती → कौन्तेयः, राधा → राधेयः, गङ्गा → गाङ्गेयः, पृथा → पार्थः। ये सब तद्धित प्रत्ययों से बने अपत्यवाचक शब्द हैं और महाभारत में बहुत आते हैं।
प्र5.
…………………… कुन्ती।
उत्तर

उत्तरम् — क्षत्रियाणी कुन्ती। (हिन्दी — क्षत्राणी कुन्ती।)

पाठ की पंक्ति — ‘क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्।’ (भीमः, पृष्ठ ११४)
वहाँ पद तृतीया में है (क्षत्रियाण्या); यहाँ विशेष्य ‘कुन्ती’ प्रथमा एकवचन में है
अतः विशेषण भी प्रथमा एकवचन में — क्षत्रियाणी
लिङ्ग ही निर्णायक है: मञ्जूषा के सात पदों में केवल ‘क्षत्रियाणी’ स्त्रीलिङ्ग है, और विशेष्य ‘कुन्ती’ भी स्त्रीलिङ्ग है — इसलिए मेल तुरन्त बन जाता है। यही ‘विशेषणं विशेष्यनिघ्नम्’ नियम का सबसे सरल प्रयोग है : पहले विशेष्य का लिङ्ग देखिए, फिर उसी लिङ्ग का विशेषण उठाइए।
शब्द-रचना: क्षत्रियस्य पत्नी = क्षत्रियाणी (क्षत्रिय + ङीष् + आनुक् आगम)। इसी प्रकार — आचार्यस्य पत्नी = आचार्यानी, इन्द्रस्य पत्नी = इन्द्राणी, मातुलस्य पत्नी = मातुलानी। भीम इस शब्द से माता को याद दिलाता है कि उन्होंने केवल एक माता की तरह नहीं, एक क्षत्राणी की तरह निर्णय लिया है — इसीलिए वह निर्णय उचित है।
प्र6.
…………………… हुताशनः।
उत्तर

उत्तरम् — जठरस्थः हुताशनः। (हिन्दी — पेट में विद्यमान अग्नि (जठराग्नि)।)

पाठ की पंक्ति — ‘सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय।’ (भीमः, पृष्ठ ११६)
वहाँ दोनों पद चतुर्थी में हैं (जठरस्थाय … हुताशनाय)
यहाँ विशेष्य ‘हुताशनः’ प्रथमा में है → विशेषण भी प्रथमा में — जठरस्थः
दो पदों की समान विभक्ति ही मेल का प्रमाण है: पाठ में ‘जठरस्थाय … हुताशनाय’ दोनों चतुर्थी एकवचन में साथ-साथ चलते हैं — यही सिद्ध करता है कि वे विशेषण-विशेष्य हैं। प्रश्न में विभक्ति बदल गई है, इसलिए उत्तर की विभक्ति भी बदलेगी। पाठ का पद ज्यों का त्यों उठाकर लिख देना यहाँ अशुद्ध होगा — ‘जठरस्थाय’ नहीं, ‘जठरस्थः’ चाहिए।
अलङ्कार: ‘जठरस्थः हुताशनः’ में रूपक है — पेट की पाचन-अग्नि (जठराग्नि) पर यज्ञ के अग्निदेव का आरोप। भीम मज़ाक में कहता है कि सारा भोजन उसने ‘अपने पेट में बैठे अग्निदेव को आहुति के रूप में’ दे दिया — अर्थात् स्वयं खा गया। एक ही वाक्य में हास्य भी और चुनौती भी।
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