शारदा अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
उपकृतः
उत्तर

उत्तरम् — अपकृतः। (हिन्दी — ‘उपकृत’ = जिस पर उपकार किया गया; इसका विलोम ‘अपकृत’ = जिसका अपकार/अहित किया गया।)

उप + √कृ + क्त = उपकृतः — भला किया हुआ
अप + √कृ + क्त = अपकृतः — बुरा किया हुआ
भेद केवल उपसर्ग का है — ‘उप’ (पास, अनुकूल) बनाम ‘अप’ (दूर, प्रतिकूल)
उपसर्ग से विलोम बनाने का नियम: संस्कृत में बहुत-से विलोम केवल उपसर्ग बदलकर बनते हैं — उपकारः/अपकारः, उत्थानम्/अवसानम्, प्रवेशः/निर्गमः, आगमनम्/गमनम्। इसीलिए विलोम पूछे जाने पर पहले देखिए कि शब्द में कोई उपसर्ग तो नहीं है; यदि है, तो प्रायः उसी का उलटा उपसर्ग उत्तर दे देता है।
पाठ से जोड़िए: श्लोक में ‘परैरुपकृता वयम्’ आया है — दूसरों ने हम पर उपकार किया। यदि वहाँ ‘अपकृताः’ होता, तो अर्थ उलट जाता — दूसरों ने हमारा अहित किया। इसी एक उपसर्ग पर पूरे नाटक का धर्म टिका है।
प्र2.
अग्रजस्य
उत्तर

उत्तरम् — अनुजस्य (अवरजस्य)। (हिन्दी — ‘अग्रज’ = बड़ा भाई; विलोम ‘अनुज’ = छोटा भाई।)

अग्रे जायते इति = अग्रजः — जो पहले जन्मा (बड़ा भाई)
अनु जायते इति = अनुजः — जो बाद में जन्मा (छोटा भाई)
प्रश्न में पद षष्ठी में है (अग्रजस्य), अतः उत्तर भी षष्ठी में — अनुजस्य
विभक्ति मिलाना क्यों आवश्यक है: विलोम पूछते समय भी उत्तर उसी विभक्ति-वचन में देना चाहिए जिसमें प्रश्न है। यहाँ ‘अग्रजस्य’ षष्ठी एकवचन है, इसलिए ‘अनुजः’ लिखना अधूरा उत्तर होगा — ठीक उत्तर अनुजस्य है। यही सावधानी प्रश्न ६ (ख) को (क), (ग), (घ) से अलग बनाती है।
पाठ से जोड़िए: ‘ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य’ — यह नकुल कहता है, और उसका ‘अग्रज’ भीम है। पाण्डवों का क्रम — युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव — याद रखिए, तभी ‘किसका अग्रज कौन’ स्पष्ट होगा।
प्र3.
उचितम्
उत्तर

उत्तरम् — अनुचितम्। (हिन्दी — ‘उचित’ = ठीक, योग्य; विलोम ‘अनुचित’ = अनुपयुक्त, अयोग्य।)

उचितम् + नञ् (न) = अन् + उचितम् = अनुचितम्
नियम — ‘नञ्’ समास में स्वरादि शब्द से पहले ‘न’ का ‘अन्’ तथा व्यञ्जनादि शब्द से पहले ‘’ होता है।
उदाहरण — अन् + उचितम् = अनुचितम्; अ + धर्मः = अधर्मः
यही नियम पाठ में भी काम आया है: बक पूछता है — ‘कः खलु अधर्मः मया सेवितः?’ यहाँ ‘अधर्मः’ = न धर्मः (नञ् तत्पुरुष, ‘धर्म’ व्यञ्जनादि है इसलिए केवल ‘अ’)। इसी प्रकार ‘अनुशोचितव्यम्’ में भी नञ् है (न + उपसर्गयुक्त पद)। एक ही नियम, अनेक शब्द — यही व्याकरण पढ़ने का लाभ है।
पाठ से जोड़िए: ‘क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्’ — भीम कहता है कि माता ने वही किया जो उचित था। यदि वह ‘अनुचितम्’ मानता, तो पूरा नाटक ही न होता।
प्र4.
हर्षः
उत्तर

उत्तरम् — विषादः (शोकः / दुःखम्)। (हिन्दी — ‘हर्ष’ = प्रसन्नता; विलोम ‘विषाद/शोक’ = खिन्नता, दुःख।)

हर्षः = आनन्दः, प्रसन्नता
विपरीतम् — विषादः, शोकः, दुःखम्, खेदः — सब स्वीकार्य
प्रश्न का पद प्रथमा एकवचन में है → उत्तर भी प्रथमा एकवचन में
पाठ में दोनों भाव आमने-सामने हैं: एक ओर युधिष्ठिर कहते हैं ‘हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः’ — भीम आनन्दित है; दूसरी ओर कुन्ती कहती है ‘तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति’ तथा ‘स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते’ — ब्राह्मण शोकमग्न है। यही विरोध नाटक में करुण और वीर रस को साथ-साथ चलाता है।
जोड़कर देखिए: अभ्यास के प्रश्न ९ में ‘प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्’ का भाव ‘हर्षः’ बताया गया है (यथा), और ‘स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते’ का भाव ‘ग्लानिः’ — अर्थात् वही हर्ष-विषाद की जोड़ी वहाँ भी है।
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