प्र1.
अधोलिखितवाक्यानाम् उचितभावैः सह सम्मेलनं कुरुत — (क) धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि। (ख) भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ? (ग) अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? (घ) हनिष्यामि तं दुरात्मानम्। (ङ) स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते। (च) मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। ॥ १. हासः २. निराशा ३. ग्लानिः ४. अधिकारः ५. ओजः ६. धैर्यम्
उत्तर
शुद्धं सम्मेलनम् — (क)–६, (ख)–२, (ग)–१, (घ)–५, (ङ)–३, (च)–४।
| क्रमः | वाक्यम् | वक्ता | भावः | क्यों यही भाव |
|---|---|---|---|---|
| यथा | प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्। | भीमः | हर्षः | इतना सारा भोजन देखकर भीम प्रसन्न है — शुद्ध आनन्द का भाव। |
| (क) | धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि। | अर्जुनः | ६. धैर्यम् | राक्षस के सामने भाई के साथ जाने का प्रस्ताव — यह भय का नहीं, साहस और स्थिरता का वचन है। |
| (ख) | भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ? | युधिष्ठिरः | २. निराशा | ‘कथं नु’ में हताशा है — जिस भाई के बल पर सब टिका है, उसी को भेजा जा रहा है; बड़े भाई का मन बैठ गया है। |
| (ग) | अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? | सहदेवः | १. हासः | ‘क्या दोनों हाथों से खाओगे?’ — यह छोटे भाई का परिहास है, गम्भीर प्रश्न नहीं। |
| (घ) | हनिष्यामि तं दुरात्मानम्। | भीमः | ५. ओजः | ‘मैं उस दुष्ट को मार डालूँगा’ — यह पराक्रम और तेज का उद्घोष है; ‘ओजः’ का अर्थ ही है तेज, बल। |
| (ङ) | स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते। | कुन्ती | ३. ग्लानिः | इकलौते पुत्र वाले ब्राह्मण का विलाप सुनकर मन का भारीपन तथा खिन्नता — यही ‘ग्लानि’ है। |
| (च) | मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। | बकः | ४. अधिकारः | ‘हे नीच मनुष्य, मुझे भोजन परोस’ — यह आदेश है, प्रार्थना नहीं; बक अपने को स्वामी मानकर अधिकार जता रहा है। |
भाव कैसे पहचानें — तीन सङ्केत: (१) क्रिया का लकार: लोट् लकार (परिवेषय, गृहाण) प्रायः आदेश/अधिकार बताता है; लृट् लकार (हनिष्यामि, अनुगमिष्यामि) संकल्प बताता है। (२) प्रश्नवाचक शब्द: ‘कथं नु’, ‘किमर्थम्’ में प्रायः विस्मय या हताशा रहती है; ‘अपि … ?’ में कभी-कभी परिहास। (३) सम्बोधन: ‘मानुषापसद’, ‘वाचाट’, ‘क्षत्रियडिम्भ’ जैसे तिरस्कारसूचक सम्बोधन दर्प और अधिकार का चिह्न हैं।
भावों के अर्थ: हासः = हँसी, परिहास; निराशा = आशा का टूटना, हताशा; ग्लानिः = मन का भारीपन, खिन्नता; अधिकारः = स्वामित्व का भाव, आदेश देने की मुद्रा; ओजः = तेज, पराक्रम; धैर्यम् = स्थिरता, साहस।
ध्यान दें: ‘ओजः’ तथा ‘धैर्यम्’ को मिलाइए मत। ओज में शत्रु को मारने की घोषणा है (भीम), जबकि धैर्य में साथ खड़े रहने की स्थिरता है (अर्जुन)। यदि (क) और (घ) को उलट दें, तो भाव तो चलेगा, पर भीम की चुनौती में जो तेज है वह ‘धैर्य’ शब्द से पूरा नहीं होता — इसलिए यही मेल शुद्ध है।