शारदा अध्याय 9 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्।
उत्तर

उत्तरम् — क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती। (हिन्दी — क्षत्राणी ने किया।)

दत्तं वाक्यम् (कर्मवाच्यम्/भाववाच्यम्) — क्षत्रियाण्या अनुष्ठितम्।
परिवर्तितं वाक्यम् (कर्तृवाच्यम्) — क्षत्रियाणी अनुष्ठितवती।
नियम — कर्ता तृतीया से प्रथमा में आएगा (क्षत्रियाण्या → क्षत्रियाणी), और क्त प्रत्यय के स्थान पर क्तवतु प्रत्यय लगेगा (अनुष्ठितम् → अनुष्ठितवती), जो कर्ता के लिङ्ग-वचन का अनुसरण करेगा।
नियम को सूत्र-रूप में याद रखिए: ‘भवत्या प्रतिश्रुतम् → भवती प्रतिश्रुतवती’ — यही ‘यथा’ पूरे प्रश्न की कुंजी है। तीन काम करने हैं : (१) कर्ता की तृतीया हटाकर प्रथमा, (२) क्त के स्थान पर क्तवतु, (३) कर्ता के लिङ्ग-वचन के अनुसार रूप — स्त्रीलिङ्ग में ‘-वती’, पुंलिङ्ग में ‘-वान्’। यहाँ कर्ता ‘क्षत्रियाणी’ स्त्रीलिङ्ग एकवचन है, अतः ‘अनुष्ठितवती’।
पाठ का प्रसङ्ग: ‘क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्’ — भीम माता से कहता है। कर्तृवाच्य में यह होगा — ‘क्षत्रियाणी यदुचितं तत् अनुष्ठितवती।’ अर्थ वही रहता है, केवल बल बदल जाता है : कर्मवाच्य में कर्म पर बल, कर्तृवाच्य में कर्ता पर।
प्र2.
भवत्या सज्जीक्रियताम्।
उत्तर

उत्तरम् — भवती सज्जीकरोतु। (हिन्दी — आप तैयार कीजिए।)

दत्तं वाक्यम् (कर्मवाच्यम्) — भवत्या सज्जीक्रियताम्। (‘आपके द्वारा तैयार किया जाए’)
परिवर्तितं वाक्यम् (कर्तृवाच्यम्) — भवती सज्जीकरोतु।
नियम — यहाँ क्रिया लोट् लकार में है, अतः क्तवतु नहीं लगेगा; कर्मवाच्य लोट् (क्रियताम्) के स्थान पर कर्तृवाच्य लोट् (करोतु) आएगा, और कर्ता तृतीया से प्रथमा में जाएगा।
यह वाक्य शेष से भिन्न क्यों है: प्रश्न के अन्य वाक्यों में क्तप्रत्ययान्त भूतकालिक रूप हैं (अनुष्ठितम्, उपक्षिप्तम्, सङ्कल्पितम्), पर यहाँ आज्ञार्थक रूप है — ‘क्रियताम्’। इसलिए यहाँ ‘सज्जीकृतवती’ लिखना अशुद्ध होगा; लकार वही रहना चाहिए, केवल वाच्य बदलना है। यही परीक्षा में सबसे अधिक होने वाली भूल है।
‘सज्जीक्रियताम्’ की रचना: ‘सज्ज’ (तैयार) + च्वि प्रत्यय + √कृ = सज्जीकरोति (‘जो तैयार नहीं था उसे तैयार करना’)। च्वि लगते ही अन्तिम स्वर दीर्घ ‘ई’ हो जाता है — शुक्ल + च्वि + √भू = शुक्लीभवति। इसका कर्मवाच्य लोट् रूप ‘सज्जीक्रियताम्’ है।
प्र3.
भवत्या उपक्षिप्तम्।
उत्तर

उत्तरम् — भवती उपक्षिप्तवती। (हिन्दी — आपने (यह बात) छेड़ी।)

दत्तं वाक्यम् — भवत्या उपक्षिप्तम्।
परिवर्तितं वाक्यम् — भवती उपक्षिप्तवती।
कर्ता — भवत्या (तृ.ए.व., स्त्री.) → भवती (प्र.ए.व.)
क्रिया — उपक्षिप्तम् (क्त) → उपक्षिप्तवती (क्तवतु, स्त्रीलिङ्ग)
‘उपक्षिप्तम्’ का अर्थ: उप + √क्षिप् + क्त — ‘संकेत रूप में कही गई बात’, ‘छेड़ी गई बात’। युधिष्ठिर पूछते हैं ‘अम्ब ! किमिदानीमुपक्षिप्तम्?’ अर्थात् ‘माँ! अभी यह कौन-सी बात छेड़ी गई?’ ध्यान दीजिए — जब मूल क्रिया में उपसर्ग हो, तो क्तवतु बनाते समय उपसर्ग यथावत् रहता है, केवल प्रत्यय बदलता है।
‘भवती’ तथा ‘भवान्’: स्त्री के लिए ‘भवती’ (तृतीया — भवत्या), पुरुष के लिए ‘भवान्’ (तृतीया — भवता)। इस अभ्यास में (क), (ख), (ग) स्त्री-कर्ता वाले हैं (कुन्ती), और (ङ) पुरुष-कर्ता वाला (युधिष्ठिर) — इसी से उत्तर का रूप तय होता है।
प्र4.
त्वया सङ्कल्पितम्।
उत्तर

उत्तरम् — त्वं सङ्कल्पितवती। (पुंलिङ्गे — त्वं सङ्कल्पितवान्।) (हिन्दी — तुमने संकल्प किया।)

दत्तं वाक्यम् — त्वया सङ्कल्पितम्।
परिवर्तितं वाक्यम् — त्वं सङ्कल्पितवती।
कर्ता — त्वया (तृ.ए.व.) → त्वम् (प्र.ए.व.)
क्रिया — सङ्कल्पितम् (क्त) → सङ्कल्पितवती / सङ्कल्पितवान्
यहाँ ‘वती’ ही क्यों: ‘युष्मद्’ (त्वम्) शब्द का रूप स्त्री-पुरुष दोनों के लिए एक-सा होता है, अतः लिङ्ग का निर्णय सन्दर्भ से करना पड़ता है। पाठ में यह वाक्य युधिष्ठिर कुन्ती से कहते हैं — ‘तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम्?’ अतः कर्ता स्त्रीलिङ्ग (कुन्ती) है और उत्तर ‘सङ्कल्पितवती’ बनेगा। यदि सन्दर्भ न देखा जाए तो ‘सङ्कल्पितवान्’ भी व्याकरण की दृष्टि से शुद्ध है — इसीलिए दोनों दिए हैं।
सन्धि याद रहे: ‘सङ्कल्पितम्’ = सम् + कल्पितम् (परसवर्ण-सन्धि) — यही अभ्यास के प्रश्न ४ (ज) का उत्तर है।
प्र5.
भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः।
उत्तर

उत्तरम् — भवान् धर्मसङ्ग्रहं पश्येत् (द्रष्टुम् अर्हति)। (हिन्दी — आपको धर्मों का संग्रह देखना चाहिए।)

दत्तं वाक्यम् (कर्मवाच्यम्) — भवता धर्मसङ्ग्रहः द्रष्टव्यः।
परिवर्तितं वाक्यम् (कर्तृवाच्यम्) — भवान् धर्मसङ्ग्रहं पश्येत्।
तीन परिवर्तन — (१) कर्ता : भवता (तृतीया) → भवान् (प्रथमा); (२) कर्म : धर्मसङ्ग्रहः (प्रथमा) → धर्मसङ्ग्रहम् (द्वितीया); (३) क्रिया : द्रष्टव्यः (तव्यत्, कृत्य-प्रत्ययः) → पश्येत् (विधिलिङ् लकार)।
कृत्य-प्रत्यय का वाच्यपरिवर्तन: ‘तव्यत्’, ‘अनीयर्’ तथा ‘यत्’ — ये कृत्य प्रत्यय सदा कर्मवाच्य में आते हैं और ‘चाहिए’ का अर्थ देते हैं। इनका कर्तृवाच्य रूप विधिलिङ् लकार से बनता है, क्योंकि विधिलिङ् भी ‘चाहिए’ का ही अर्थ देता है। इसीलिए ‘द्रष्टव्यः’ का ‘पश्येत्’ बनेगा, ‘दृष्टवान्’ नहीं — ‘दृष्टवान्’ का अर्थ ‘देखा’ हो जाएगा, जो मूल अर्थ बदल देता है।
पाठ का प्रसङ्ग: भीम युधिष्ठिर से कहता है — ‘धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः।’ कर्तृवाच्य में — ‘धर्मं विजानन् भवान् अत्र धर्मसङ्ग्रहं पश्येत्।’ ध्यान दीजिए, ‘विजानता’ (तृतीया) भी बदलकर ‘विजानन्’ (प्रथमा) हो गया, क्योंकि विशेषण कर्ता का अनुसरण करता है।
प्र6.
पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः।
उत्तर

उत्तरम् — पौरजनाः मानुषं प्रेषयेयुः। (हिन्दी — नगरवासियों को एक मनुष्य भेजना चाहिए।)

दत्तं वाक्यम् (कर्मवाच्यम्) — पौरजनैः मानुषः प्रेषयितव्यः।
परिवर्तितं वाक्यम् (कर्तृवाच्यम्) — पौरजनाः मानुषं प्रेषयेयुः।
तीन परिवर्तन — (१) कर्ता : पौरजनैः (तृतीया बहुवचन) → पौरजनाः (प्रथमा बहुवचन); (२) कर्म : मानुषः → मानुषम् (द्वितीया); (३) क्रिया : प्रेषयितव्यः (कृत्य) → प्रेषयेयुः (विधिलिङ्, प्रथमपुरुष बहुवचन)।
वचन मिलाना मत भूलिए: कर्ता ‘पौरजनैः’ बहुवचन में है, अतः कर्तृवाच्य की क्रिया भी बहुवचन में होगी — ‘प्रेषयेत्’ नहीं, ‘प्रेषयेयुः’। कर्मवाच्य में क्रिया कर्म के अनुसार चलती है (‘मानुषः’ एकवचन → ‘प्रेषयितव्यः’ एकवचन), पर कर्तृवाच्य में वह कर्ता के अनुसार चलती है — यही दोनों वाच्यों का मूल भेद है।
पाठ का आधार: यह वाक्य कुन्ती के कथन से बना है — ‘भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः।’ (पृष्ठ ११३) अर्थात् भोजन के साथ एक मनुष्य भी भेजना पड़ता है — यही बक के साथ हुई सन्धि की शर्त थी।
प्र7.
प्रश्न १० के दोनों स्तम्भों के शीर्षक ‘कर्तृवाच्यम्’ तथा ‘कर्मवाच्यम्’ हैं। ‘यथा’ के अनुसार कौन-सा स्तम्भ किस वाच्य का है — इसे स्पष्ट कीजिए।
उत्तर

उत्तरम् — पुस्तक में दिए गए ‘यथा’ के अनुसार दोनों शीर्षक वस्तुतः उलटे छपे हैं। जो वाक्य ‘कर्तृवाच्यम्’ स्तम्भ में दिए गए हैं वे कर्मवाच्य/भाववाच्य के हैं, और जो उत्तर ‘कर्मवाच्यम्’ स्तम्भ में भरना है वह कर्तृवाच्य का है।

पुस्तक का स्तम्भ-शीर्षकवहाँ जो वाक्य हैवह वास्तव में किस वाच्य का हैपहचान
कर्तृवाच्यम्भवत्या प्रतिश्रुतम्।कर्मवाच्यम् / भाववाच्यम्कर्ता तृतीया में (भवत्या) तथा क्रिया क्त प्रत्ययान्त — यही कर्मवाच्य का लक्षण है।
कर्मवाच्यम्भवती प्रतिश्रुतवती।कर्तृवाच्यम्कर्ता प्रथमा में (भवती) तथा क्रिया क्तवतु प्रत्ययान्त — यही कर्तृवाच्य का लक्षण है।
तो उत्तर किस दिशा में लिखें: ‘यथा’ ही अन्तिम प्रमाण है। पुस्तक जो नमूना देती है, अभ्यास उसी दिशा में करना है — अर्थात् दिए हुए कर्मवाच्य वाक्य को कर्तृवाच्य में बदलना है। ऊपर के छहों उत्तर इसी क्रम में दिए गए हैं। शीर्षकों की अदला-बदली मुद्रण की चूक है; उससे उत्तर नहीं बदलता।
दोनों वाच्यों का सूत्र (याद रखने योग्य):
कर्तृवाच्यम् — कर्ता प्रथमा में · कर्म द्वितीया में · क्रिया कर्ता के पुरुष-वचन के अनुसार। (उदा० — रामः ग्रन्थं पठति।)
कर्मवाच्यम् — कर्ता तृतीया में · कर्म प्रथमा में · क्रिया कर्म के पुरुष-वचन के अनुसार, आत्मनेपदी। (उदा० — रामेण ग्रन्थः पठ्यते।)
भाववाच्यम् — अकर्मक धातु में; कर्ता तृतीया में, क्रिया सदा प्रथमपुरुष एकवचन। (उदा० — मया हस्यते।)
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