शारदा अध्याय 9 नाट्यांशः ३

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘बकः — मानुषापसद, परिवेषय मे भोजनम्। भीमः — सर्वं परिवेषितं मदीय-जठरस्थाय भगवते हुताशनाय। त्वां धर्मदूषणं हन्तुम् आगतोऽहम्। बकः — कथं, कः खलु अधर्मः मया सेवितः ? (सहासमुदरं परिमृजन्) भीमः — नरभक्षणम्। बकः — नरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः। भीमः — नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः। बकः — क्षत्रियोऽसि ? भीमः — बाढम्, क्षत्रियोऽस्मि।’ — अस्य आशयं लिखत तथा अत्र विद्यमानं धर्मविवादं स्पष्टयत।
उत्तर

आशयः — बकः आदिशति — ‘हे निकृष्ट मानव ! मह्यं भोजनं परिवेषय।’ भीमः वदति — ‘सर्वं भोजनं मम उदरे स्थिताय भगवते अग्नये परिवेषितम् (अहं स्वयम् एव खादितवान्)। त्वां धर्मस्य दूषकं हन्तुम् अहम् आगतः।’ बकः उदरं मृजन् सहासं पृच्छति — ‘कथम् ? मया कः अधर्मः आचरितः ?’ भीमः वदति — ‘नरभक्षणम्।’ बकः वदति — ‘नरभक्षणं तु मांसभक्षकाणां राक्षसानां धर्मः अस्ति।’ भीमः वदति — ‘तर्हि नररक्षणं तु पृथिवीपालानां क्षत्रियाणां धर्मः अस्ति।’ बकः पृच्छति — ‘किं त्वं क्षत्रियः असि ?’ भीमः वदति — ‘निश्चयेन, अहं क्षत्रियः अस्मि।’

(हिन्दी — बक आदेश देता है — ‘हे नीच मनुष्य! मुझे भोजन परोस।’ भीम कहता है — ‘सारा भोजन मेरे पेट में बैठे भगवान् अग्निदेव को परोस दिया गया है। तुझ धर्म को दूषित करने वाले को मारने मैं आया हूँ।’ बक पेट सहलाता हुआ हँसकर पूछता है — ‘क्यों? मैंने कौन-सा अधर्म किया है?’ भीम कहता है — ‘नरभक्षण।’ बक कहता है — ‘नरभक्षण तो मांसभक्षी राक्षसों का धर्म है।’ भीम कहता है — ‘तो नररक्षण भूमिपालक क्षत्रियों का धर्म है।’ बक पूछता है — ‘क्या तू क्षत्रिय है?’ भीम कहता है — ‘निश्चय ही, मैं क्षत्रिय हूँ।’)

धर्मविवादः — दोनों के तर्क आमने-सामने

पक्षःवाक्यम्तर्कःदोषः / गुणः
बकःनरभक्षणं नाम मांसाशिनां राक्षसानां धर्मः।‘मेरी जाति का स्वभाव ही यही है, अतः यह मेरा धर्म है।’यह स्वभाव को धर्म कह देना है। पर जो कर्म दूसरे का प्राण लेता है, वह स्वभाव हो सकता है, धर्म नहीं।
भीमःनररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः।‘तेरा धर्म मान भी लूँ, तो मेरा धर्म उसे रोकना है।’भीम बहस में नहीं उलझता; वह बक के ही वाक्य-साँचे में उत्तर देता है — ‘नर-भक्षण’ के सामने ‘नर-रक्षण’ रख देता है।
पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
मानुषापसदमानुषेषु अपसद — मनुष्यों में नीच (सप्तमी-तत्पुरुषः, सम्बोधनम्)
परिवेषयस्थापय, परिवेषणं कुरु — परोस (परि + √विष् + णिच्, लोट्, मध्यमपुरुष एकवचन)
जठरस्थाय हुताशनायजठरे तिष्ठति इति, तस्मै हुताशनाय — पेट में विद्यमान अग्नि के लिए (सम्प्रदाने चतुर्थी)
धर्मदूषणम्धर्मं दूषयति इति, तम् — धर्म को दूषित करने वाले को
सहासमुदरं परिमृजन्हास्येन सह उदरं मार्जयन् — हँसते हुए पेट सहलाता हुआ (नेपथ्यनिर्देशः)
मांसाशिनाम्मांसम् अश्नन्ति इति, तेषाम् — मांस खाने वालों का
भूमिपालानाम्भूमिं पालयन्ति इति, तेषाम् — पृथ्वी की रक्षा करने वालों का
यह संवाद क्यों सुन्दर है: भीम का पहला ही वाक्य दो काम एक साथ करता है — वह बताता है कि भोजन वह स्वयं खा चुका है (‘मेरे पेट के अग्निदेव को परोस दिया’) और साथ ही यह भी कि अब वह सेवक नहीं, वधकर्ता है। ‘जठरस्थाय भगवते हुताशनाय’ में रूपक अलङ्कार है — पेट की जठराग्नि पर यज्ञ के अग्निदेव का आरोप। इस एक वाक्य में उपहास, सूचना और चुनौती — तीनों हैं।
ध्यान दें: यह पूरा संवाद ही पाठ का नैतिक केन्द्र है। नाटककार बक को मूर्ख नहीं दिखाता — वह भी तर्क देता है। पर भीम का उत्तर श्रेष्ठ है, क्योंकि उसका धर्म दूसरों की रक्षा पर टिका है और बक का ‘धर्म’ दूसरों के नाश पर। जो धर्म दूसरे के प्राण की कीमत पर चले, वह धर्म नहीं — यही पाठ का सन्देश है।
प्र2.
‘बकः — अहह ! मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान् ? भीमसेनः — कामम् ! कौन्तेयोऽस्मि भीमसेनः। बकः — इदमस्ति मे भागधेयम्। चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्। श्लाघनीयोऽसि मे रिपुः। भीमसेनः — इदं मे स्वस्त्ययनं यन्मां श्लाघनीयं रिपुं मन्यसे। अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्। बकः — वाचाट ! क्षत्रियडिम्भ, गृहाण शस्त्रम्। शातयामि ते दर्पम्। भीमसेनः — अलं शस्त्रग्रहणविडम्बनेन, त्वन्मस्तकास्थिभिदुरोऽस्ति ममैष मुष्टिः। (उभौ प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवर्तते। हतः पतति बकः।)’ — अस्य आशयं लिखत तथा ‘चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्’ इति उक्तेः भावं स्पष्टयत।
उत्तर

आशयः — बकः विस्मयेन वदति — ‘अरे ! भवान् मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कुन्तीपुत्रः किम् ?’ भीमसेनः वदति — ‘निश्चयेन ! अहं कौन्तेयः भीमसेनः अस्मि।’ बकः वदति — ‘इदं मम भाग्यम्। चिरात् अन्विष्टः मृगः स्वयम् एव व्याघ्रस्य गुहां प्रविष्टः। त्वं मम प्रशंसनीयः शत्रुः असि।’ भीमसेनः वदति — ‘इदं मम मङ्गलम् एव यत् त्वं मां श्लाघनीयं शत्रुं मन्यसे। गच्छ, स्वमित्रं हिडिम्बम् अनुसर (तस्य एव मार्गं गच्छ)।’ बकः क्रुद्धः वदति — ‘हे वाचाल ! हे क्षत्रियबालक ! शस्त्रं गृहाण। अहं तव दर्पं नाशयामि।’ भीमसेनः वदति — ‘शस्त्रग्रहणस्य विडम्बनया अलम्; तव मस्तकस्य अस्थीनि भेत्तुं मम एषः मुष्टिः एव पर्याप्तः।’ ततः उभौ प्रहरतः, मल्लयुद्धं प्रवर्तते, हतः बकः पतति।

(हिन्दी — बक चौंककर कहता है — ‘अरे! आप मेरे मित्र हिडिम्ब को मारने वाले कुन्तीपुत्र हैं?’ भीमसेन कहते हैं — ‘निश्चय ही! मैं कुन्तीपुत्र भीमसेन हूँ।’ बक कहता है — ‘यह तो मेरा सौभाग्य है। बहुत दिनों से खोजा जाने वाला मृग स्वयं ही बाघ की गुफा में आ गिरा। तू मेरा प्रशंसा के योग्य शत्रु है।’ भीमसेन कहते हैं — ‘यह मेरा मङ्गल ही है कि तू मुझे प्रशंसनीय शत्रु मानता है। जा, अपने मित्र हिडिम्ब के पीछे चला जा।’ बक क्रुद्ध होकर कहता है — ‘अरे बकवादी! अरे क्षत्रिय के बच्चे! शस्त्र उठा। मैं तेरा घमण्ड चूर करता हूँ।’ भीमसेन कहते हैं — ‘शस्त्र उठाने के नाटक की आवश्यकता नहीं; तेरे सिर की हड्डियाँ तोड़ने के लिए मेरी यह मुट्ठी ही काफ़ी है।’ फिर दोनों प्रहार करते हैं, मल्लयुद्ध होता है और बक मारा जाकर गिर पड़ता है।)

पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
कामम्निश्चयेन, आम् — ‘हाँ, अवश्य’ (अव्ययम्)
भागधेयम्भाग्यम् — भाग्य, सौभाग्य
चिरान्विष्टःचिरात् अन्विष्टः — बहुत समय से खोजा हुआ
व्याघ्रगह्वरम्व्याघ्रस्य गह्वरम् — बाघ की गुफा (द्वितीया — गति का लक्ष्य)
श्लाघनीयःप्रशंसनीयः — प्रशंसा के योग्य (√श्लाघ् + अनीयर्)
स्वस्त्ययनम्मङ्गलम्, कल्याणम् — शुभ, मङ्गल
अनुवर्तस्वअनुसर — पीछे-पीछे चला जा (अनु + √वृत्, लोट्, आत्मनेपदम्)
क्षत्रियडिम्भक्षत्रियस्य डिम्भः (बालकः) — क्षत्रिय के बच्चे! (तिरस्कारसूचकं सम्बोधनम्)
शातयामिनाशयामि, तनूकरोमि — चूर करता हूँ
त्वन्मस्तकास्थिभिदुरःतव मस्तकस्य अस्थीनि भिनत्ति इति — तेरे सिर की हड्डियाँ तोड़ने वाला
‘चिरान्विष्टो मृगः स्वयमुत्पतितो व्याघ्रगह्वरम्’ का भाव: यह लोकोक्ति जैसी उपमा है — ‘जिस हिरन को शिकारी बहुत दिन से खोज रहा था, वही स्वयं आकर बाघ की गुफ़ा में कूद पड़ा।’ बक अपने को व्याघ्र और भीम को मृग मान रहा है। यही उसकी सबसे बड़ी भूल है, क्योंकि भीम स्वयं को पहले ही ‘सिंह’ कह चुका है (‘सिंहः क्षुद्रमृगं यथा’)। इस प्रकार नाटककार ने दो उपमाओं को आमने-सामने रखकर दर्प और आत्मविश्वास का अन्तर दिखा दिया है — और अन्त में सही कौन था, यह ‘हतः पतति बकः’ बता देता है।
संवाद की मार्मिक व्यङ्ग्योक्ति:अनुवर्तस्व ते मित्रं हिडिम्बम्’ — ऊपर से यह ‘अपने मित्र के पीछे चले जाओ’ है, भीतर से इसका अर्थ है ‘जहाँ हिडिम्ब गया, वहीं तुम भी जाओ — अर्थात् मृत्यु को प्राप्त हो’। ऐसे दो-अर्थी वाक्य को व्याजोक्ति कहते हैं, और नाटक में यही सबसे तीखा प्रहार होता है — शस्त्र से पहले शब्द चलता है।
नाट्य-विधान: ‘उभौ प्रहरतः। मल्लयुद्धं प्रवर्तते। हतः पतति बकः।’ — तीन छोटे वाक्यों में पूरा युद्ध समाप्त। संस्कृत नाटक में वध प्रायः रंगमञ्च पर विस्तार से नहीं दिखाया जाता; इसी संयम को नाट्यशास्त्रीय औचित्य कहते हैं। ध्यान दीजिए — भीम शस्त्र नहीं उठाता, केवल मुष्टि से लड़ता है, इसीलिए इसे ‘मल्लयुद्धम्’ कहा गया।
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