शारदा अध्याय 9 नाट्यांशः २

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘युधिष्ठिरः — (विलोक्य) अये ! हर्षेण उत्फुल्लाक्ष इव वत्सो भीमः। भीमः — प्रभूतमुपस्थितं मे भोजनम्। अर्जुनः — स्थाने खलु प्रहर्षः औदरिकस्य। नकुलः — ओष्ठौ स्फुरतः इवाग्रजस्य। भीमः — पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः। सहदेवः — अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ? भीमः — तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनमुपस्थितम्। आयोधनमपि।’ — अस्य आशयं लिखत तथा अत्र विद्यमानं हास्यं स्पष्टयत।
उत्तर

आशयः — युधिष्ठिरः भीमं दृष्ट्वा वदति — ‘अरे ! वत्सः भीमः हर्षेण विकसितनयनः इव दृश्यते।’ भीमः वदति — ‘मम भोजनं प्रभूतम् उपस्थितम् अस्ति।’ अर्जुनः परिहसति — ‘औदरिकस्य (भोजनप्रियस्य) एतादृशः हर्षः उचितः एव।’ नकुलः वदति — ‘अग्रजस्य ओष्ठौ स्फुरतः इव।’ भीमः वदति — ‘पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः।’ सहदेवः पृच्छति — ‘किं हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ?’ भीमः वदति — ‘तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनम् उपस्थितम्, अपि तु युद्धम् अपि।’

(हिन्दी — युधिष्ठिर भीम को देखकर कहते हैं — ‘अरे! बेटा भीम तो हर्ष से खिली हुई आँखों वाला दिख रहा है।’ भीम कहता है — ‘मेरा भोजन बहुत सारा आ लगा है।’ अर्जुन हँसी करता है — ‘पेटू का ऐसा हर्ष उचित ही है।’ नकुल कहता है — ‘बड़े भैया के तो होंठ फड़क रहे हैं।’ भीम कहता है — ‘देखो, भुजाएँ भी फड़क रही हैं।’ सहदेव पूछता है — ‘क्या दोनों हाथों से खाओगे?’ भीम कहता है — ‘वह भी होगा। केवल भोजन ही नहीं आया, युद्ध भी आया है।’)

पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
विलोक्यदृष्ट्वा — देखकर (ल्यप् प्रत्ययः); यह नेपथ्य-निर्देश है
उत्फुल्लाक्षःउत्फुल्ले अक्षिणी यस्य सः — खिली हुई आँखों वाला (बहुव्रीहि समासः)
स्थानेयुक्तम्, उचितम् — ‘ठीक ही है’ (अव्ययवत् प्रयुक्तम्)
औदरिकस्यभोजनप्रियस्य — पेटू का (उदर + ठक्/इक् प्रत्ययः)
स्फुरतःकम्पेते — फड़कते हैं (√स्फुर्, लट्, प्रथमपुरुष द्विवचन — क्योंकि ओष्ठ/बाहु दो हैं)
इवाग्रजस्यइव + अग्रजस्य — बड़े भाई के (दीर्घसन्धिः)
भोक्ष्यसेभक्षयिष्यसि — खाओगे (√भुज्, लृट्, मध्यमपुरुष एकवचन, आत्मनेपदम्)
आयोधनम्युद्धम् — लड़ाई (अमरकोष भी यही पर्याय देता है)
यहाँ हास्य कैसे बनता है: हास्य अतिशयोक्ति तथा शब्द के दो अर्थों से बनता है। नकुल कहता है ‘होंठ फड़क रहे हैं’ — यह भोजन के लोभ का चिह्न है। भीम उसी बात को उठाकर कहता है ‘बाहू अपि स्फुरतः’ — भुजा का फड़कना युद्ध का शकुन है। इस प्रकार भीम भाइयों के परिहास को स्वीकार भी करता है और उसी शब्द को घुमाकर युद्ध की सूचना भी दे देता है। सहदेव का ‘अपि हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे?’ चरम हास्य है, और भीम का ‘तदपि भविष्यति’ उससे भी बड़ा। तुरन्त बाद ‘आयोधनमपि’ कहते ही हास्य टूटता है और नाटक गम्भीर हो जाता है — यही नाट्यकार की कुशलता है।
ध्यान दें: ‘आयोधनम्’ यहाँ पहली बार आता है और यही शब्द अभ्यास के प्रश्न ५ (पर्यायवाचि-मेलन) में ‘युद्धम्’ के साथ जोड़ना है; पृष्ठ १२६ के अमरकोष-अंश में भी उसका प्रमाण दिया है — ‘युद्धमायोधनं जन्यं प्रधनं प्रविदारणम्’।
प्र2.
‘युधिष्ठिरः — अम्ब ! किमिदानीमुपक्षिप्तम् ? कुन्ती — पुत्रकाः ! बकासुरस्य भोजनपरिकल्पनं जानीथ पौराणाम्। तदिदानीं पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य। युधिष्ठिरः — ततस्ततः। कुन्ती — स खल्वेकपुत्रस्तपस्वी भृशं परिदेवयते। युधिष्ठिरः — ज्ञातमवशिष्टं मातः ! न खलु भवत्या अध्यवसितं समर्थये। यस्य वीरस्य भुजबलमाश्रित्य वयं सुखं शेमहे, यच्च चिन्तयन् दुर्योधनो निद्रां न लभते, तस्य भीमस्य प्रेषणं कथं नु त्वया सङ्कल्पितम् ?’ — अस्य आशयं लिखत। युधिष्ठिरस्य आपत्तेः कारणं च स्पष्टयत।
उत्तर

आशयः — युधिष्ठिरः पृच्छति — ‘माता ! इदानीं किम् उक्तम् (किं प्रसङ्गः उपस्थापितः) ?’ कुन्ती वदति — ‘पुत्राः ! नगरवासिनां कृते बकासुरस्य भोजनव्यवस्थां यूयं जानीथ। इदानीं सा बारी प्रतिवेशिनः ब्राह्मणस्य आगता।’ युधिष्ठिरः वदति — ‘ततः ? ततः ?’ कुन्ती वदति — ‘सः एकपुत्रः तपस्वी अतिशयेन विलपति।’ युधिष्ठिरः वदति — ‘मातः ! अवशिष्टं मया ज्ञातम्। किन्तु भवत्या यत् निश्चितं तत् अहं न समर्थये। यस्य वीरस्य भुजबलम् आश्रित्य वयं निर्भयाः सुखेन शयामहे, यं च चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभते — तस्य एव भीमस्य प्रेषणं भवत्या कथं सङ्कल्पितम् ?’

(हिन्दी — युधिष्ठिर पूछते हैं — ‘माँ! अभी क्या बात छेड़ी गई है?’ कुन्ती कहती है — ‘बेटो! नगरवासियों के लिए बकासुर की भोजन-व्यवस्था तो तुम जानते ही हो। अब वह बारी पड़ोसी ब्राह्मण की आ गई है।’ युधिष्ठिर कहते हैं — ‘फिर? फिर क्या हुआ?’ कुन्ती कहती है — ‘वह इकलौते पुत्र वाला बेचारा ब्राह्मण बहुत विलाप कर रहा है।’ युधिष्ठिर कहते हैं — ‘माँ! शेष बात मैं समझ गया। पर आपने जो निश्चय किया, उसका मैं समर्थन नहीं करता। जिस वीर के भुजबल के सहारे हम निश्चिन्त होकर सुख से सोते हैं, और जिसका ध्यान करते-करते दुर्योधन को नींद नहीं आती — उसी भीम को भेजने का संकल्प आपने कैसे कर लिया?’)

युधिष्ठिर की आपत्ति के दो कारण —

क्रमःकारणम् (संस्कृतम्)हिन्दी में
यस्य वीरस्य भुजबलम् आश्रित्य वयं सुखं शेमहेभीम ही पाँचों भाइयों और माता की रक्षा का आधार है — वही न रहा तो शेष सब असुरक्षित हो जाएँगे।
यं चिन्तयन् दुर्योधनः निद्रां न लभतेशत्रु भी जिससे डरता है, वही हमारी सबसे बड़ी शक्ति है — ऐसी शक्ति को संकट में डालना बुद्धिमानी नहीं।
पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
उपक्षिप्तम्सूचितम्, प्रस्तावितम् — छेड़ी गई बात (उप + √क्षिप् + क्त)
पर्यायपतितम्पर्यायेण पतितम् — बारी से आ पड़ा
ततस्ततःततः + ततः — ‘फिर? फिर?’ (उत्सुकता की आवृत्ति)
खल्वेकपुत्रःखलु + एकपुत्रः (गुणसन्धिः) — निश्चय ही जिसका एक ही पुत्र है
परिदेवयतेविलपति — विलाप करता है (परि + √दिव् + णिच्, आत्मनेपदम्)
अध्यवसितम्निश्चितम् — जो निश्चय किया गया (अधि + अव + √सो + क्त)
शेमहेस्वपिमः — हम सोते हैं (√शी, लट्, उत्तमपुरुष बहुवचन, आत्मनेपदम्)
सङ्कल्पितम्निश्चितम् — संकल्प किया गया (सम् + √कॢप् + क्त; सम् + कल्पितम् — परसवर्णसन्धिः)
युधिष्ठिर का चरित्र यहीं खुलता है: वे माता का विरोध नहीं करते, असहमति जताते हैं — ‘न खलु … समर्थये’ अर्थात् ‘मैं इसका समर्थन नहीं करता’। यह भाषा बहुत नपी-तुली है। साथ ही वे भीम की प्रशंसा उसी वाक्य में कर देते हैं। बड़े भाई की चिन्ता, धर्मराज का विवेक और शब्दों का संयम — तीनों एक ही वाक्य में हैं। ध्यान दीजिए, यही वाक्य अभ्यास के प्रश्न १ (ख) तथा (घ) और प्रश्न ३ का आधार भी बनता है।
‘यस्य … यच्च … तस्य’ की रचना: यह संस्कृत का यत्-तत् सम्बन्ध है। पहले ‘यस्य’ और ‘यत्’ से दो विशेषण-वाक्य आते हैं, फिर ‘तस्य भीमस्य’ में मुख्य बात कही जाती है। ऐसा वाक्य बनाते समय ध्यान रखिए कि ‘यत्’ की विभक्ति और ‘तत्’ की विभक्ति एक-सी हो — यहाँ दोनों षष्ठी में हैं।
प्र3.
‘भीमः — धर्मं विजानता भवता धर्मसङ्ग्रहोऽत्र द्रष्टव्यः। न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति। युधिष्ठिरः — वत्स भीमसेन ! बलवान् मानुषभोजी स राक्षसः इति श्रूयते। भीमः — ततः किम् ? राक्षसध्वंसी भीमः स्मर्यते। अलं विशङ्कया। हनिष्यामि तं दुरात्मानम्। अर्जुनः — धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि। भीमः — मा मैवम्। न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते।’ — अस्य आशयं लिखत। ‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ इति वाक्यस्य महत्त्वं च लिखत।
उत्तर

आशयः — भीमः वदति — ‘धर्मं जानता भवता अत्र धर्मस्य सङ्ग्रहः (धर्मराशिः) द्रष्टव्यः। मातुः आज्ञा कदापि अवज्ञां न अर्हति।’ युधिष्ठिरः वदति — ‘वत्स भीमसेन ! सः राक्षसः बलवान् मनुष्यभक्षकः च इति श्रूयते।’ भीमः वदति — ‘ततः किम् ? भीमः तु राक्षसानां ध्वंसकः इति स्मर्यते। शङ्कया अलम्। अहं तं दुरात्मानं हनिष्यामि।’ अर्जुनः वदति — ‘अहं धनुर्धरः तव अनुगमनं करिष्यामि।’ भीमः वदति — ‘मा, एवं मा भवतु। तीक्ष्णदंष्ट्रः मृगराजः (सिंहः) सहायम् अपेक्षां न करोति।’

(हिन्दी — भीम कहता है — ‘धर्म को जानने वाले आपको यहाँ धर्म का संग्रह देखना चाहिए। माता की आज्ञा कभी अवज्ञा के योग्य नहीं होती।’ युधिष्ठिर कहते हैं — ‘बेटा भीमसेन! वह राक्षस बलवान् और मनुष्यभक्षी सुना जाता है।’ भीम कहता है — ‘तो क्या हुआ? भीम तो राक्षसों का नाश करने वाला माना जाता है। शङ्का मत कीजिए। मैं उस दुष्ट को मार डालूँगा।’ अर्जुन कहता है — ‘मैं धनुर्धर आपके साथ चलूँगा।’ भीम कहता है — ‘नहीं, ऐसा नहीं। तीखी दाढ़ों वाला मृगराज सहायक की अपेक्षा नहीं करता।’)

पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
विजानताजानता — जानने वाले के द्वारा (वि + √ज्ञा, शतृ-प्रत्ययान्तस्य तृतीया)
धर्मसङ्ग्रहःधर्माणां सङ्ग्रहः — धर्मों का समुच्चय (षष्ठी-तत्पुरुषः)
प्रत्यादेशम्अवज्ञाम्, उल्लङ्घनम् — अवज्ञा को
अर्हतियोग्यः भवति — योग्य होता है (√अर्ह्, लट्)
राक्षसध्वंसीराक्षसान् ध्वंसयति इति — राक्षसों का नाश करने वाला (णिनि-प्रत्ययः)
अलं विशङ्कयाशङ्कां मा कुरु — ‘शङ्का मत कीजिए’ (अलम् के योग में तृतीया)
मा मैवम्मा + मा + एवम् — ‘नहीं, ऐसा नहीं’ (निषेधार्थकम्)
खरदंष्ट्रःखराः (तीक्ष्णाः) दंष्ट्राः यस्य सः — तीखी दाढ़ों वाला (बहुव्रीहिः)
मृगाधिपःमृगाणाम् अधिपः — सिंह (षष्ठी-तत्पुरुषः)
‘न हि मातुराज्ञा प्रत्यादेशमर्हति’ का महत्त्व: यही वाक्य पूरे विवाद को समाप्त कर देता है, और यही पाठ का दूसरा सूत्र-वाक्य है। भीम कहता है कि प्रश्न ‘मैं जाऊँ या न जाऊँ’ का नहीं है — माता ने वचन दे दिया है, अतः विचार का विषय ही समाप्त। साथ ही वह युधिष्ठिर को उन्हीं के क्षेत्र में उत्तर देता है — ‘धर्मं विजानता भवता’ अर्थात् ‘आप तो धर्म जानते हैं, फिर यहाँ धर्म का संग्रह देखिए’। यहाँ दो धर्म एक साथ सधते हैं — प्रत्युपकार का धर्म और मातृ-आज्ञापालन का धर्म; इसीलिए भीम इसे ‘धर्मसङ्ग्रह’ (धर्मों का ढेर) कहता है।
अलङ्कार: ‘न हि खरदंष्ट्रो मृगाधिपः सहायमपेक्षते’ में अप्रस्तुतप्रशंसा है — कहा सिंह के विषय में जा रहा है, अर्थ भीम के विषय में निकलता है। यह अर्जुन को ठुकराना नहीं, विनम्र आत्मविश्वास है — और इसी बात को अगला श्लोक ‘इमौ हि पीवरौ बाहू…’ खोलकर कहता है।
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