आशयः — युधिष्ठिरः भीमं दृष्ट्वा वदति — ‘अरे ! वत्सः भीमः हर्षेण विकसितनयनः इव दृश्यते।’ भीमः वदति — ‘मम भोजनं प्रभूतम् उपस्थितम् अस्ति।’ अर्जुनः परिहसति — ‘औदरिकस्य (भोजनप्रियस्य) एतादृशः हर्षः उचितः एव।’ नकुलः वदति — ‘अग्रजस्य ओष्ठौ स्फुरतः इव।’ भीमः वदति — ‘पश्यत, बाहू अपि स्फुरतः।’ सहदेवः पृच्छति — ‘किं हस्तद्वयेन भोक्ष्यसे ?’ भीमः वदति — ‘तदपि भविष्यति। न केवलं भोजनम् उपस्थितम्, अपि तु युद्धम् अपि।’
(हिन्दी — युधिष्ठिर भीम को देखकर कहते हैं — ‘अरे! बेटा भीम तो हर्ष से खिली हुई आँखों वाला दिख रहा है।’ भीम कहता है — ‘मेरा भोजन बहुत सारा आ लगा है।’ अर्जुन हँसी करता है — ‘पेटू का ऐसा हर्ष उचित ही है।’ नकुल कहता है — ‘बड़े भैया के तो होंठ फड़क रहे हैं।’ भीम कहता है — ‘देखो, भुजाएँ भी फड़क रही हैं।’ सहदेव पूछता है — ‘क्या दोनों हाथों से खाओगे?’ भीम कहता है — ‘वह भी होगा। केवल भोजन ही नहीं आया, युद्ध भी आया है।’)
| पदम् | अर्थः तथा व्याकरणम् |
|---|---|
| विलोक्य | दृष्ट्वा — देखकर (ल्यप् प्रत्ययः); यह नेपथ्य-निर्देश है |
| उत्फुल्लाक्षः | उत्फुल्ले अक्षिणी यस्य सः — खिली हुई आँखों वाला (बहुव्रीहि समासः) |
| स्थाने | युक्तम्, उचितम् — ‘ठीक ही है’ (अव्ययवत् प्रयुक्तम्) |
| औदरिकस्य | भोजनप्रियस्य — पेटू का (उदर + ठक्/इक् प्रत्ययः) |
| स्फुरतः | कम्पेते — फड़कते हैं (√स्फुर्, लट्, प्रथमपुरुष द्विवचन — क्योंकि ओष्ठ/बाहु दो हैं) |
| इवाग्रजस्य | इव + अग्रजस्य — बड़े भाई के (दीर्घसन्धिः) |
| भोक्ष्यसे | भक्षयिष्यसि — खाओगे (√भुज्, लृट्, मध्यमपुरुष एकवचन, आत्मनेपदम्) |
| आयोधनम् | युद्धम् — लड़ाई (अमरकोष भी यही पर्याय देता है) |