शारदा अध्याय 9 पाठस्य त्रयः श्लोकाः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
प्रथमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥”
उत्तर
भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्।
कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥

पदच्छेदः — भैक्ष-प्रदानेन + चिरम् + परैः + उपकृताः + वयम् + कृतम् + प्रतिकृतम् + भूयात् + एषः + धर्मः + सनातनः।

अन्वयः — वयं चिरं परैः भैक्षप्रदानेन उपकृताः (स्मः)। (अतः) कृतं प्रतिकृतं भूयात्। एषः सनातनः धर्मः (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
भैक्षप्रदानेनभिक्षायाः प्रदानेन — भिक्षा देने से (करणे तृतीया)
चिरम्दीर्घकालं यावत् — बहुत समय तक (अव्ययम्)
परैःअन्यैः जनैः — दूसरों के द्वारा (कर्तरि तृतीया)
उपकृताःउपकारं प्राप्ताः — उपकृत, जिन पर उपकार किया गया
कृतम्यः उपकारः कृतः — किया हुआ उपकार
प्रतिकृतम्प्रत्युपकृतम् — बदले में किया गया उपकार
भूयात्भवेत् — हो जाए (√भू, आशीर्लिङ् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन)
सनातनःशाश्वतः, नित्यः — सदा से चला आ रहा, शाश्वत

हिन्दी अर्थ — दूसरों ने भिक्षा देकर बहुत समय तक हम पर उपकार किया है। (अतः) किए हुए उपकार का बदला अवश्य चुकाया जाए — यही सनातन धर्म है।

भावः (पुस्तक का अपना भावार्थ १):वयं नागरिकैः बहुकालं भिक्षा-प्रदानेन पोषिताः। उपकृतमेतत् प्रत्युपकृतं भवेत् इति एषः शाश्वतः धर्मः।” — यही श्लोक पूरे पाठ का शीर्षक-श्लोक है; पाठ का नाम इसी दूसरी पंक्ति से बना है। भीम यहाँ कोई भावुक बात नहीं कह रहा, वह एक नैतिक नियम बता रहा है : जिस समाज ने हमें पाला, संकट में उसकी रक्षा करना हमारा ऋण चुकाना है। ध्यान दीजिए, वह ‘मेरा उपकार’ नहीं, ‘वयम्’ (हम सब) कहता है — पाँचों भाई और माता, सब उस ऋण में हैं; पर चुकाने वह अकेला जाता है।
सन्धि-सङ्केत (यही पाठ का शीर्षक भी है): भूयादेष = भूयात् + एषः — त् के बाद स्वर आने पर त् का द् हो जाता है (व्यञ्जनसन्धिः — जश्त्वम्); फिर ‘एषः + धर्मः’ में ‘एषः’ का विसर्ग लुप्त होकर ‘एष धर्मः’ बनता है (एतत्तदोः सुलोपः)। इसीलिए शीर्षक में ‘भूयादेष धर्मः’ छपा है, ‘भूयात् एषः धर्मः’ नहीं। परैरुपकृता = परैः + उपकृताः (विसर्ग का ‘र्’) तथा उपकृताः + वयम् → उपकृता वयम् (आः + व् → आ, विसर्गलोपः)।
Did you know? ‘भूयात्’ आशीर्लिङ् लकार का रूप है, जो आशीर्वाद तथा शुभकामना में आता है — जैसे ‘चिरञ्जीवी भूयात्’, ‘कल्याणं भूयात्’। यहाँ भीम कह रहा है ‘ऐसा हो’ — यह आदेश नहीं, कामना और संकल्प है, इसीलिए वाक्य में उपदेश का बल है, कठोरता नहीं।
प्र2.
द्वितीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम। बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥”
उत्तर
इमौ हि पीवरौ बाहू सहायौ सहजौ मम।
बकं विध्वंसयिष्यामि सिंहः क्षुद्रमृगं यथा॥

पदच्छेदः — इमौ + हि + पीवरौ + बाहू + सहायौ + सहजौ + मम + बकम् + विध्वंसयिष्यामि + सिंहः + क्षुद्रमृगम् + यथा।

अन्वयः — मम इमौ पीवरौ बाहू हि सहजौ सहायौ (स्तः)। यथा सिंहः क्षुद्रमृगं (विध्वंसयति), (तथा अहं) बकं विध्वंसयिष्यामि।

पदम्शब्दार्थः
इमौएतौ द्वौ — ये दोनों (इदम् शब्द, पुं.प्र.द्वि.व.)
पीवरौस्थूलौ, पुष्टौ — मोटे, बलिष्ठ (द्विवचन)
बाहूभुजौ — दोनों भुजाएँ (पुं.प्र.द्वि.व.)
सहजौसह जातौ, जन्मना सह वर्तमानौ — जन्म से साथ रहने वाले
सहायौसाहाय्यकर्तारौ — सहायक
विध्वंसयिष्यामिविनाशयिष्यामि — नष्ट कर दूँगा (वि + √ध्वंस् + णिच्, लृट्, उत्तमपुरुष एकवचन)
क्षुद्रमृगम्क्षुद्रः मृगः, तम् — तुच्छ पशु को (कर्मधारयः, द्वितीया)
यथाइव, जैसे — उपमावाचक अव्ययम्

हिन्दी अर्थ — मेरी ये दोनों पुष्ट भुजाएँ ही मेरे जन्म से साथ रहने वाले सहायक हैं। जैसे सिंह किसी तुच्छ पशु को नष्ट कर देता है, वैसे ही मैं बक को नष्ट कर दूँगा।

भावः (पुस्तक का भावार्थ २):एतौ हि, पुष्टौ, भुजौ, मम सहजातौ उपकारकौ। सिंहः तुच्छं वन्यप्राणिनमिव, अहं, बकनामानम् असुरं विनाशयिष्यामि।” — यह श्लोक अर्जुन के प्रस्ताव ‘धनुर्धरोऽहमनुगमिष्यामि’ का उत्तर है। भीम विनम्रता से कहता है कि मुझे किसी बाहरी सहायक की आवश्यकता नहीं — मेरे अपने दो हाथ ही मेरे साथी हैं। ‘सहजौ’ शब्द बहुत सुन्दर है : भाई भी ‘सहज’ कहलाते हैं, पर भीम कहता है कि मेरी भुजाएँ ही मेरे सच्चे ‘सहज’ हैं — जो जन्म से साथ हैं और अन्त तक साथ रहेंगे
अलङ्कारः: ‘सिंहः क्षुद्रमृगं यथा’ में उपमा अलङ्कार है — उपमेय भीम, उपमान सिंह, साधारण धर्म ‘विध्वंसनम्’, वाचक शब्द ‘यथा’। साथ ही यह उपमा बक का अपमान भी है : भीम उसे ‘राक्षस’ नहीं, ‘क्षुद्रमृग’ (मामूली जानवर) कहता है। यही आत्मविश्वास आगे तीसरे श्लोक में और खुलकर आता है।
व्याकरण: इस श्लोक में द्विवचन का अच्छा अभ्यास है — इमौ, पीवरौ, बाहू, सहायौ, सहजौ — पाँचों पद पुंलिङ्ग प्रथमा द्विवचन में हैं, क्योंकि भुजाएँ दो हैं। संस्कृत में द्विवचन एक अलग वचन है, हिन्दी की तरह उसे बहुवचन में नहीं मिलाया जाता।
प्र3.
तृतीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्। निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥”
उत्तर
रक्षिता साधुलोकानां वरिष्ठो बाहुशालिनाम्।
निषूदको हिडिम्बस्य मृत्युश्चास्मि भवादृशाम्॥

पदच्छेदः — रक्षिता + साधुलोकानाम् + वरिष्ठः + बाहुशालिनाम् + निषूदकः + हिडिम्बस्य + मृत्युः + च + अस्मि + भवादृशाम्।

अन्वयः — (अहं) साधुलोकानां रक्षिता, बाहुशालिनां वरिष्ठः, हिडिम्बस्य निषूदकः, भवादृशां मृत्युः च अस्मि।

पदम्शब्दार्थः
रक्षितारक्षकः, पालकः — रक्षा करने वाला (√रक्ष् + तृच्, पुं.प्र.ए.व.)
साधुलोकानाम्सज्जनानां जनानाम् — सज्जनों का (सम्बन्धे षष्ठी बहुवचनम्)
वरिष्ठःश्रेष्ठतमः — सबसे श्रेष्ठ (वर + इष्ठन्, अतिशयार्थकम्)
बाहुशालिनाम्बाहुबलेन शोभमानानाम् — बलशालियों में (निर्धारणे षष्ठी)
निषूदकःविनाशकः, हन्ता — मारने वाला
हिडिम्बस्यहिडिम्ब नामकस्य राक्षसस्य — हिडिम्ब का (कर्मणि षष्ठी)
भवादृशाम्भवान् इव येषां रूपम्, तेषाम् — आप जैसों के लिए
मृत्युःमरणम्, यमः — मृत्यु, काल

हिन्दी अर्थ — (मैं) सज्जनों की रक्षा करने वाला हूँ, बलशालियों में सबसे श्रेष्ठ हूँ, हिडिम्ब का वध करने वाला हूँ, और तुम्हारे जैसों के लिए साक्षात् मृत्यु हूँ।

भावः: यह भीम का आत्मपरिचय-श्लोक है, जो नाटक में ‘आत्मपरिचय’ नामक परम्परा का पालन करता है — योद्धा युद्ध से पहले अपना परिचय देता है। इसकी रचना बहुत कसी हुई है : पहले क्या करता हूँ (साधुओं की रक्षा), फिर क्या हूँ (बलशालियों में श्रेष्ठ), फिर क्या कर चुका हूँ (हिडिम्ब का वध) और अन्त में तुम्हारे लिए क्या हूँ (मृत्यु)। ध्यान दीजिए — पहली ही बात ‘रक्षा’ है, ‘वध’ नहीं; क्योंकि पाठ का सिद्धान्त यही है — ‘नररक्षणं नाम भूमिपालानां क्षत्रियाणां धर्मः’। वध उस रक्षा का साधन है, लक्ष्य नहीं।
सन्धि तथा सन्दर्भ: वरिष्ठो बाहुशालिनाम् = वरिष्ठः + बाहुशालिनाम् (विसर्गसन्धिः, अः + ब् → ओ)। मृत्युश्चास्मि = मृत्युः + च + अस्मि — विसर्ग के बाद ‘च्’ आने पर विसर्ग ‘श्’ हो जाता है (विसर्गसन्धिः — श्चुत्वम्), फिर च + अस्मि = चास्मि (दीर्घसन्धिः)। हिडिम्ब वह राक्षस था जिसका वध भीम ने वन में किया था और जिसकी बहन हिडिम्बा से विवाह करके घटोत्कच का जन्म हुआ — यही बात अगले संवाद में बक स्वयं कहता है : ‘मम मित्रस्य हिडिम्बस्य हन्ता कौन्तेयो भवान्?’
ध्यान दें: इस तीसरे श्लोक का भावार्थ पुस्तक के ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ खण्ड में नहीं दिया गया — वहाँ केवल दो श्लोकों के भावार्थ हैं। इसलिए इसका अर्थ स्वयं निकालना पड़ता है; ऊपर की तालिका उसी काम के लिए है।
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