शारदा अध्याय 9 नाट्यांशः १

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘(ततः प्रविशति कुन्ती भीमसेनेन सह) कुन्ती — पुत्र ! किञ्चित् प्रतिश्रुतं मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय। भीमः — सम्यगनुष्ठितम्। आतिथेयः किल तत्र भवान् उपकर्ता वसति प्रदानेन। कुन्ती — आकर्णय, अस्य एकचक्रस्य पुरस्यादूरवर्तिनि पर्वते वसति बकनामा दैत्यः। भीमः — श्रुतं तस्य दुरात्मनो वृत्तम्। पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः।’ — अस्य संवादस्य आशयं सप्रसङ्गं लिखत।
उत्तर

आशयः — कुन्ती भीमम् आह — ‘पुत्र ! मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय किञ्चित् प्रतिश्रुतम् (वचनं दत्तम्)।’ भीमः उत्तरति — ‘सम्यक् एव अनुष्ठितं भवत्या। सः प्रतिवेशी अतिथिसेवापरायणः; अन्नप्रदानेन सः अस्माकम् उपकर्ता एव।’ कुन्ती कथयति — ‘शृणु, अस्य एकचक्रनगरस्य समीपस्थे पर्वते बकः नाम दैत्यः वसति।’ भीमः वदति — ‘तस्य दुरात्मनः वृत्तान्तः मया श्रुतः। नगरवासिनः बारीवारेण तस्मै बलिं प्रयच्छन्ति।’

(हिन्दी — कुन्ती भीम से कहती है — ‘बेटा! मैंने पड़ोसी ब्राह्मण को कुछ वचन दिया है।’ भीम उत्तर देता है — ‘आपने ठीक ही किया। वह पड़ोसी अतिथि-सेवा करने वाला है; अन्न देकर वही हमारा उपकार करने वाला है।’ कुन्ती कहती है — ‘सुनो, इस एकचक्रा नगर के पास ही पर्वत पर बक नाम का दैत्य रहता है।’ भीम कहता है — ‘उस दुष्ट का वृत्तान्त मैंने सुना है। नगरवासी बारी-बारी से उसे बलि देते हैं।’)

पदम्शब्दार्थःव्याकरण-सङ्केतः
प्रतिश्रुतम्प्रतिज्ञातम् — वचन दिया गयाप्रति + √श्रु + क्त — भावे प्रयोगः, अतः कर्ता ‘मया’ तृतीयायाम्
प्रतिवेशिनेनिकटगृहवासिने — पड़ोसी के लिएसम्प्रदाने चतुर्थी (‘ब्राह्मणाय’ अपि चतुर्थ्याम्)
सम्यगनुष्ठितम्सम्यक् + अनुष्ठितम् — ठीक ही किया गयाव्यञ्जनसन्धिः (क् + अ → ग्)
आतिथेयःअतिथौ साधुः, अतिथिसेवाकारकः — अतिथि-सेवकअतिथि + ढञ् → आतिथेय (‘अतिथि के प्रति अच्छा’)
आकर्णयशृणु — सुनोआ + कर्ण + णिच्, लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन
पुरस्यादूरवर्तिनिपुरस्य अदूरे वर्तमाने — नगर से थोड़ी दूर स्थितदीर्घसन्धिः (पुरस्य + अदूरवर्तिनि); अधिकरणे सप्तमी
दुरात्मनो वृत्तम्दुष्टस्य आचरणम् — दुष्ट का वृत्तान्तदुरात्मनः + वृत्तम् — विसर्गसन्धिः (अः + व् → ओ)
पर्यायक्रमेणवारंवारेण — बारी-बारी सेतृतीया (प्रकारे / इत्थम्भूते तृतीया)
संवाद-कौशल देखिए: कुन्ती सीधे यह नहीं कहती कि ‘मैंने तुम्हें भेजने का वचन दे दिया है’। वह पहले ‘किञ्चित् प्रतिश्रुतम्’ कहकर बात छेड़ती है, फिर बक का परिचय देती है — अर्थात् धीरे-धीरे बात को उस बिन्दु तक ले जाती है जहाँ पुत्र स्वयं समझ जाए। यही नाट्यकार का कौशल है। और भीम भी उतना ही सजग है — वह तुरन्त ‘सम्यगनुष्ठितम्’ कहकर माता को आश्वस्त कर देता है कि वचन देना ठीक ही हुआ।
भाव का बीज यहीं है:उपकर्ता वसति प्रदानेन’ — ब्राह्मण अन्नदान करके हमारा उपकार करता हुआ रहता है। यही ‘कृतम्’ है, जिसका ‘प्रतिकृतम्’ आगे श्लोक में माँगा जाएगा। पूरा पाठ इसी एक वाक्य पर खड़ा है।
प्र2.
‘कुन्ती — श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः। भीमः — बाढम्। कुन्ती — न चैतावत्। मानुषभोजी स राक्षसः श्रूयते। भोज्यसमाहारे मानुषोऽपि तस्मै प्रेषयितव्यः। तस्माद् बालकस्य पिता तपस्वी शोचति। भीमः — विदितमवशिष्टम्। मत्पुत्रेषु कोऽपि प्रेषयिष्यत इति भवत्या प्रतिश्रुतम्। कुन्ती — (मौनमवलम्बते)’ — अस्य आशयं लिखत तथा ‘मौनमवलम्बते’ इति नेपथ्यनिर्देशस्य महत्त्वं स्पष्टयत।
उत्तर

आशयः — कुन्ती वदति — ‘श्वः प्रातः अस्य ब्राह्मणस्य पर्यायः (वारः) भवति।’ भीमः ‘बाढम्’ (आम्) इति सम्मतिं प्रकटयति। कुन्ती पुनः वदति — ‘एतावत् एव न; सः राक्षसः मानुषभोजी इति श्रूयते। भोज्यसमूहेन सह एकः मनुष्यः अपि तस्मै प्रेषणीयः भवति। अत एव तस्य बालकस्य तपस्वी पिता शोचति।’ भीमः वदति — ‘अवशिष्टं मया विदितम् — ‘मम पुत्रेषु कश्चित् प्रेषयिष्यते’ इति भवत्या प्रतिश्रुतम्।’ तदा कुन्ती मौनम् अवलम्बते।

(हिन्दी — कुन्ती कहती है — ‘कल सवेरे इस ब्राह्मण की बारी है।’ भीम ‘ठीक है’ कहकर सहमति देता है। कुन्ती फिर कहती है — ‘बस इतना ही नहीं; वह राक्षस मनुष्य-भक्षी सुना जाता है। भोजन के ढेर के साथ एक मनुष्य भी उसे भेजना पड़ता है। इसीलिए उस बालक का तपस्वी पिता शोक कर रहा है।’ भीम कहता है — ‘शेष बात मैं समझ गया — “मेरे पुत्रों में से कोई भेजा जाएगा” — यह आपने वचन दे दिया है।’ तब कुन्ती चुप रह जाती है।)

पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
श्वःआगामिनि दिने — कल (अव्यय)
पर्यायःवारः, क्रमः — बारी (पुं.प्र.ए.व.)
बाढम्नूनम्, आम् — ‘हाँ, निश्चय ही’ (अव्यय)
न चैतावत्न च एतावत् — ‘केवल इतना ही नहीं’। च + एतावत् = चैतावत् (वृद्धिसन्धिः, अ + ए = ऐ)
मानुषभोजीमानुषान् भुङ्क्ते इति — मनुष्यों को खाने वाला (उपपदतत्पुरुषः, णिनि प्रत्ययः)
भोज्यसमाहारेभोज्यानां समाहारः, तस्मिन् — भोजन के समूह के साथ
प्रेषयितव्यःप्रेषणीयः — भेजा जाना चाहिए (√इष् णिच् + तव्यत्, विधि-कृत्य)
विदितमवशिष्टम्विदितम् + अवशिष्टम् — ‘शेष बात जान ली’ (व्यञ्जनसन्धिः, म् + अ)
‘मौनमवलम्बते’ का महत्त्व: यही इस दृश्य की सबसे सशक्त पंक्ति है — और उसमें एक भी शब्द नहीं है। कुन्ती ने कभी स्पष्ट रूप से नहीं कहा कि ‘मैंने भीम को भेजने का वचन दिया’। भीम स्वयं समझ जाता है और स्वयं कह देता है। तब कुन्ती मौन हो जाती है — यह मौन ही उसकी स्वीकृति है, और साथ ही एक माता की उस पीड़ा का चिह्न है जिसे शब्द में नहीं कहा जा सकता। नाटक में ऐसे नेपथ्य-निर्देश (stage direction) पात्र के भीतर का भाव दिखाने का साधन होते हैं।
ध्यान दें: ‘तपस्वी’ शब्द यहाँ दो अर्थ एक साथ देता है — (१) तपस्या करने वाला ब्राह्मण, (२) बेचारा, दयनीय। संस्कृत में ‘तपस्वी’ का यह दूसरा अर्थ नाटकों में बहुत आता है। दोनों अर्थ यहाँ ठीक बैठते हैं, इसीलिए शब्द का चुनाव सुन्दर है।
प्र3.
‘भीमः — मातः ! नास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्। क्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्। युक्तोऽयं प्रतिश्रवः। श्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हति। पश्य — भैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्। कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः॥ अहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि।’ — भीमस्य एतस्य कथनस्य आशयं लिखत। अस्मात् भीमस्य कीदृशं चरित्रं प्रकटीभवति ?
उत्तर

आशयः — भीमः मातरं सान्त्वयति — ‘मातः ! अत्र किमपि अनुशोचनीयं नास्ति। क्षत्रियस्य पत्न्या यत् उचितम् आसीत् तदेव अनुष्ठितम्। अयं प्रतिश्रवः (वचनम्) युक्तः एव। अयं वेदाध्यायी प्रतिवेशी प्रत्युपकारम् अर्हति। पश्य — भिक्षादानेन चिरकालं यावत् वयम् अन्यैः उपकृताः; अतः कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारः भवतु — एष एव सनातनः धर्मः। अहम् एव बकासुरस्य समीपं गमिष्यामि।’

(हिन्दी — भीम माता को धीरज बँधाता है — ‘माँ! इसमें शोक करने योग्य कुछ भी नहीं है। एक क्षत्राणी को जो करना उचित था, वही आपने किया। यह वचन उचित ही है। यह वेदपाठी पड़ोसी प्रत्युपकार का अधिकारी है। देखिए — भिक्षा देकर दूसरों ने बहुत समय तक हम पर उपकार किया है; अतः किए हुए उपकार का बदला चुकाया जाए — यही सनातन धर्म है। मैं ही बकासुर के पास जाऊँगा।’)

भीम का चरित्र —

गुणःपाठ का प्रमाणक्या सिद्ध होता है
कृतज्ञताभैक्षप्रदानेन चिरं परैरुपकृता वयम्जो अन्न वर्षों खाया, उसे वह ऋण मानता है — भूला नहीं है।
मातृभक्तिःक्षत्रियाण्या यदुचितं तदनुष्ठितम्माता के निर्णय पर प्रश्न नहीं उठाता, उलटे उसे उचित सिद्ध करता है।
धैर्यम् / निर्भयताअहमेव बकासुरमभिगमिष्यामि‘कोई जाए’ नहीं कहता — ‘मैं ही जाऊँगा’ कहता है। ‘एव’ शब्द ही निर्णय है।
धर्मबोधःश्रोत्रियोऽयं प्रतिवेशी प्रत्युपकारमर्हतिपात्र-अपात्र का विवेक — जो श्रोत्रिय है, वह प्रत्युपकार का अधिकारी है।
माता को सान्त्वनानास्त्यत्र किमप्यनुशोचितव्यम्स्वयं मृत्यु के मुख जा रहा है, फिर भी पहले माता का शोक दूर करता है।
तर्क का क्रम देखिए: भीम भावुक होकर नहीं, तर्क से बोलता है — (१) शोक का कोई कारण नहीं, (२) आपने क्षत्राणी के योग्य ही किया, (३) वचन उचित है, (४) यह पड़ोसी प्रत्युपकार के योग्य पात्र है, (५) और अन्त में सिद्धान्त-वाक्य — ‘कृतं प्रतिकृतं भूयात्’। पहले कारण, फिर सिद्धान्त, फिर निर्णय — यही सुव्यवस्थित भाषण की विधि है, और परीक्षा में उत्तर लिखने की भी।
व्याकरण: ‘नास्त्यत्र’ = न + अस्ति + अत्र (न + अस्ति → नास्ति, दीर्घसन्धिः; अस्ति + अत्र → अस्त्यत्र, यण् सन्धिः)। ‘क्षत्रियाण्या’ — क्षत्रियस्य पत्नी = क्षत्रियाणी (ङीष् + आनुक्), तृतीया एकवचन ‘क्षत्रियाण्या’; यहाँ कर्तरि तृतीया है क्योंकि ‘अनुष्ठितम्’ क्तप्रत्ययान्त कर्मवाच्य/भाववाच्य रूप है। ‘युक्तोऽयम्’ = युक्तः + अयम् (विसर्गसन्धिः)।
प्र4.
‘कुन्ती — वत्स भीम ! अनुरूपमभिहितं भरतवंशप्रदीपेन मम पुत्रेण। भक्ष्यभोज्यादिकं मृष्टान्नं शकटपूरं पूरयित्वा प्रेषणीयं भवति राक्षसाय। तदेतत् सज्जीक्रियतामिति प्रेरयिष्यामि ब्राह्मणकुटुम्बम्। भीमः — अहो ! प्रियं मे। सज्जीक्रियताम्। अपरमिदं प्रियमनुष्ठितं मे भवत्या। प्रभूतमुपाहरिष्यते भोजनम्।’ — अस्य आशयं लिखत। ‘भरतवंशप्रदीपः’ इति पदस्य औचित्यं च स्पष्टयत।
उत्तर

आशयः — कुन्ती वदति — ‘वत्स भीम ! भरतवंशस्य दीपेन मम पुत्रेण अनुरूपम् एव उक्तम्। भक्ष्य-भोज्य-आदिकं स्वादिष्टम् अन्नं शकटं पूरयित्वा राक्षसाय प्रेषणीयं भवति। ‘तत् एतत् सज्जीक्रियताम्’ इति अहं ब्राह्मणकुटुम्बं प्रेरयिष्यामि।’ भीमः प्रहृष्टः वदति — ‘अहो ! एतत् मह्यं प्रियम्। सज्जीक्रियताम्। भवत्या इदम् अपरम् अपि प्रियं कृतम् — प्रभूतं भोजनं मया उपाहरिष्यते (भक्षयिष्यते)।’

(हिन्दी — कुन्ती कहती है — ‘बेटा भीम! भरतवंश के दीपक मेरे पुत्र ने अपने योग्य ही कहा है। खाने-पीने की सामग्री तथा स्वादिष्ट भोजन गाड़ी भरकर राक्षस के पास भेजना पड़ता है। “वह सब तैयार किया जाए” — ऐसा कहकर मैं ब्राह्मण-परिवार को प्रेरित करूँगी।’ भीम प्रसन्न होकर कहता है — ‘वाह! यह तो मुझे प्रिय है। तैयार किया जाए। आपने यह दूसरा प्रिय काम भी कर दिया — इतना सारा भोजन मैं चट कर जाऊँगा।’)

पदम्अर्थः तथा व्याकरणम्
अनुरूपमभिहितम्अनुरूपम् + अभिहितम् — ‘योग्य ही कहा गया’। अभि + √धा + क्त = अभिहितम्
भरतवंशप्रदीपेनभरतवंशस्य प्रदीपः, तेन — भरतवंश के दीपक ने (कर्तरि तृतीया)
शकटपूरम्शकटं पूरयति इति — गाड़ी भर (उपपदसमासः)
सज्जीक्रियताम्सज्जं क्रियताम् — तैयार किया जाए (कर्मवाच्य, लोट् लकार, च्वि-प्रत्ययः)
प्रभूतम्अधिकम्, विपुलम् — बहुत सारा
उपाहरिष्यतेउप + आ + √हृ, लृट् लकार, कर्मवाच्यम् — ‘लाया/खाया जाएगा’
‘भरतवंशप्रदीपः’ क्यों उपयुक्त है: कुन्ती भीम को केवल ‘पुत्र’ नहीं, वंश का दीपक कहती है। इसमें तीन बातें एक साथ हैं — (१) दीपक स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देता है; भीम भी अपना जीवन दाँव पर लगाकर ब्राह्मण-परिवार को बचाने जा रहा है। (२) दीपक वंश की कीर्ति का प्रतीक है — भीम का यह कर्म भरतवंश का यश बढ़ाएगा। (३) यह रूपक अलङ्कार है — भीम पर दीपक का आरोप। ध्यान दीजिए, यही पद अभ्यास के प्रश्न १ (च) में पूछा गया है।
हास्य की छाया: इतने गम्भीर क्षण में भी भीम का अन्तिम वाक्य ‘प्रभूतमुपाहरिष्यते भोजनम्’ मुस्कान ले आता है — वह मृत्यु के मुख जा रहा है, पर उसे भोजन की प्रसन्नता है! यही वीर और हास्य का मेल इस रूपक की विशेषता है, और अगले दृश्य में नकुल-सहदेव इसी को और बढ़ाते हैं।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ