आशयः — कुन्ती भीमम् आह — ‘पुत्र ! मया प्रतिवेशिने ब्राह्मणाय किञ्चित् प्रतिश्रुतम् (वचनं दत्तम्)।’ भीमः उत्तरति — ‘सम्यक् एव अनुष्ठितं भवत्या। सः प्रतिवेशी अतिथिसेवापरायणः; अन्नप्रदानेन सः अस्माकम् उपकर्ता एव।’ कुन्ती कथयति — ‘शृणु, अस्य एकचक्रनगरस्य समीपस्थे पर्वते बकः नाम दैत्यः वसति।’ भीमः वदति — ‘तस्य दुरात्मनः वृत्तान्तः मया श्रुतः। नगरवासिनः बारीवारेण तस्मै बलिं प्रयच्छन्ति।’
(हिन्दी — कुन्ती भीम से कहती है — ‘बेटा! मैंने पड़ोसी ब्राह्मण को कुछ वचन दिया है।’ भीम उत्तर देता है — ‘आपने ठीक ही किया। वह पड़ोसी अतिथि-सेवा करने वाला है; अन्न देकर वही हमारा उपकार करने वाला है।’ कुन्ती कहती है — ‘सुनो, इस एकचक्रा नगर के पास ही पर्वत पर बक नाम का दैत्य रहता है।’ भीम कहता है — ‘उस दुष्ट का वृत्तान्त मैंने सुना है। नगरवासी बारी-बारी से उसे बलि देते हैं।’)
| पदम् | शब्दार्थः | व्याकरण-सङ्केतः |
|---|---|---|
| प्रतिश्रुतम् | प्रतिज्ञातम् — वचन दिया गया | प्रति + √श्रु + क्त — भावे प्रयोगः, अतः कर्ता ‘मया’ तृतीयायाम् |
| प्रतिवेशिने | निकटगृहवासिने — पड़ोसी के लिए | सम्प्रदाने चतुर्थी (‘ब्राह्मणाय’ अपि चतुर्थ्याम्) |
| सम्यगनुष्ठितम् | सम्यक् + अनुष्ठितम् — ठीक ही किया गया | व्यञ्जनसन्धिः (क् + अ → ग्) |
| आतिथेयः | अतिथौ साधुः, अतिथिसेवाकारकः — अतिथि-सेवक | अतिथि + ढञ् → आतिथेय (‘अतिथि के प्रति अच्छा’) |
| आकर्णय | शृणु — सुनो | आ + कर्ण + णिच्, लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन |
| पुरस्यादूरवर्तिनि | पुरस्य अदूरे वर्तमाने — नगर से थोड़ी दूर स्थित | दीर्घसन्धिः (पुरस्य + अदूरवर्तिनि); अधिकरणे सप्तमी |
| दुरात्मनो वृत्तम् | दुष्टस्य आचरणम् — दुष्ट का वृत्तान्त | दुरात्मनः + वृत्तम् — विसर्गसन्धिः (अः + व् → ओ) |
| पर्यायक्रमेण | वारंवारेण — बारी-बारी से | तृतीया (प्रकारे / इत्थम्भूते तृतीया) |