शारदा अध्याय 9 पाठ-परिचयः तथा पूर्वकथा

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
पाठस्य आरम्भे यः प्रस्तावना-गद्यांशः दत्तः, तस्य आशयं लिखत — “रामायणं महाभारतं चेति द्वौ प्रसिद्धौ इतिहास-ग्रन्थौ। महाभारतम् अवलम्ब्य बहवो ग्रन्थाः विरचिताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचितम् एकचक्रम् इति लघुरूपकम् अन्यतमम्। महाभारते प्रतिपादितः बकासुरवधः अस्य कथावस्तु। अयं पाठ्य-भागः एकचक्रम् इति रूपकस्य तृतीय-चतुर्थाङ्काभ्याम् उद्धृतः।”
उत्तर

अस्य गद्यांशस्य आशयः — रामायणं महाभारतं च — एतौ द्वौ भारतस्य प्रसिद्धौ इतिहासग्रन्थौ स्तः। महाभारतम् आधारीकृत्य बहवः ग्रन्थाः रचिताः। तेषु महामहोपाध्यायेन श्रीरङ्गनाथशर्मणा विरचितम् ‘एकचक्रम्’ इति लघुरूपकम् अन्यतमम् अस्ति। महाभारते वर्णितः बकासुरवधः एव अस्य रूपकस्य कथावस्तु। अयं पाठ्यभागः तस्य एव रूपकस्य तृतीयचतुर्थाङ्काभ्यां गृहीतः।

(हिन्दी — रामायण और महाभारत — ये दो भारत के प्रसिद्ध इतिहास-ग्रन्थ हैं। महाभारत को आधार बनाकर बहुत-से ग्रन्थ रचे गए। उनमें महामहोपाध्याय श्री रङ्गनाथशर्मा द्वारा रचित ‘एकचक्रम्’ नामक लघुरूपक भी एक है। महाभारत में वर्णित बकासुर-वध ही इस रूपक की कथावस्तु है। यह पाठ्यभाग उसी रूपक के तीसरे और चौथे अङ्क से लिया गया है।)

पदम् / वाक्यांशःक्या बताता है
इतिहास-ग्रन्थौरामायण तथा महाभारत को भारतीय परम्परा ‘इतिहास’ कहती है — अर्थात् ‘इति ह आस’ = ‘ऐसा ही हुआ था’। ये काव्य भी हैं और वृत्तान्त भी।
महाभारतम् अवलम्ब्य‘अवलम्ब्य’ = सहारा लेकर। कालिदास से लेकर आज तक असंख्य कवियों ने महाभारत की कथाओं पर नाटक और काव्य लिखे हैं।
लघुरूपकम्रूपक = नाटक। ‘लघुरूपक’ अर्थात् छोटा नाटक, जिसमें अङ्क कम होते हैं। इसी से यह सिद्ध होता है कि यह पाठ गद्य नहीं, नाट्य-संवाद है।
कथावस्तुनाटक की मूल कथा। यहाँ वह है — बकासुर का वध।
तृतीय-चतुर्थाङ्काभ्याम् उद्धृतः‘अङ्काभ्याम्’ पञ्चमी द्विवचन (अपादाने पञ्चमी) — दो अङ्कों से उद्धृत। अतः पाठ में दो दृश्य हैं : घर का दृश्य तथा वन का दृश्य।
यह भूमिका क्यों आवश्यक है: बिना इसे पढ़े विद्यार्थी को लगेगा कि पाठ महाभारत से सीधे लिया गया है। वास्तव में यह बीसवीं शताब्दी के एक संस्कृत विद्वान् की मौलिक नाट्य-रचना है, जिसका कथाबीज महाभारत से लिया गया है। इसी से पता चलता है कि संस्कृत आज भी जीवित रचनाशील भाषा है — कवि रङ्गनाथशर्मा का देहावसान २०१४ में हुआ, जैसा पुस्तक स्वयं पृष्ठ १२६ पर बताती है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘चेति’ = च + इति (गुण सन्धि? नहीं — यहाँ ‘च’ के अकार तथा ‘इति’ के इकार से गुण सन्धि होकर ‘ए’ बना : अ + इ = ए)। ‘विरचिताः’, ‘प्रतिपादितः’, ‘उद्धृतः’ — तीनों क्त प्रत्ययान्त कर्मवाच्य रूप हैं, जो कर्म के लिङ्ग-वचन का अनुसरण करते हैं (ग्रन्थाः विरचिताः, वधः प्रतिपादितः, भागः उद्धृतः)।
प्र2.
‘अङ्कद्वयस्य पूर्वकथाप्रसङ्गः’ इति खण्डे का कथा वर्णिता ? सङ्क्षेपेण लिखत।
उत्तर

उत्तरम् — पाण्डवाः एकचक्रनगरे कस्यचित् ब्राह्मणस्य गृहे प्रच्छन्नाः निवसन्ति स्म। एकदा गृहस्वामिनः गृहे रोदनध्वनिं श्रुत्वा कुन्ती तत्र गत्वा रोदनकारणं पृष्टवती। शोकाकुलेन परिवारेण सा ज्ञापिता यत् नगरस्य नातिदूरे स्थितेन बकनाम्ना असुरेण सह सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनम् एकः नगरवासी स्वेच्छया तस्य भक्ष्यं भवति, तस्मिन् दिने पर्यायेण तस्य एव ब्राह्मणपरिवारस्य बलिदानस्य वारः आसीत्। तेषां दुःस्थितिं ज्ञात्वा ‘स्वपुत्रेषु एकं बकासुरस्य समीपं प्रेषयामि’ इति कुन्ती प्रतिज्ञां कृतवती। एतत् ज्ञात्वा ‘ब्राह्मणेन कृतस्य उपकारस्य प्रत्युपकारकालः सन्निहितः’ इति भावयन् भीमः मृष्टान्नभाण्डसहितः बकासुरस्य समीपं गन्तुम् उद्युक्तः अभवत्।

(हिन्दी — पाण्डव एकचक्रा नगरी में किसी ब्राह्मण के घर छिपकर रहते थे। एक दिन घर के स्वामी के घर में रोने की आवाज़ सुनकर कुन्ती वहाँ गई और रोने का कारण पूछा। शोक से व्याकुल परिवार ने बताया कि नगर से थोड़ी दूर रहने वाले बक नामक असुर के साथ सन्धि की शर्त के अनुसार प्रतिदिन एक नगरवासी अपनी इच्छा से उसका भोजन बनता है, और उस दिन बारी से उसी ब्राह्मण-परिवार के बलिदान का दिन था। उनकी दुर्दशा जानकर कुन्ती ने प्रतिज्ञा की कि ‘अपने पुत्रों में से एक को मैं बकासुर के पास भेजूँगी।’ यह जानकर भीम ने सोचा कि ब्राह्मण ने जो उपकार किया है उसके प्रत्युपकार का समय आ गया है, और वह स्वादिष्ट भोजन से भरे बर्तनों सहित बकासुर के पास जाने को तैयार हो गया।)

कथा-क्रमः —

क्रमःघटना (संस्कृतम्)हिन्दी में
पाण्डवाः एकचक्रनगरे ब्राह्मणस्य गृहे निवसन्ति।लाक्षागृह से बचे पाण्डव एकचक्रा नगरी में ब्राह्मण के घर छिपकर रहते हैं।
कुन्ती रोदनध्वनिं श्रुत्वा रोदनकारणं पृच्छति।कुन्ती रोने की आवाज़ सुनकर कारण पूछती है।
सन्धिनियमानुसारं प्रतिदिनं कश्चित् नगरवासी असुरस्य भक्ष्यं भवेत्।सन्धि की शर्त — हर दिन एक नगरवासी बक का भोजन बनेगा।
तद्दिने पर्यायेण तस्यैव ब्राह्मणपरिवारस्य वारः आसीत्।उस दिन बारी उसी ब्राह्मण-परिवार की थी।
कुन्ती ‘स्वपुत्रेषु एकं प्रेषयामि’ इति प्रतिज्ञां कृतवती।कुन्ती ने अपना एक पुत्र भेजने का वचन दिया।
भीमः प्रत्युपकारकालः सन्निहितः इति भावयन् गन्तुम् उद्युक्तः।भीम ने इसे प्रत्युपकार का अवसर माना और जाने को तैयार हो गया।
यह पूर्वकथा पाठ की कुंजी है: पूरे पाठ का नैतिक तर्क इसी में छिपा है। ब्राह्मण ने वर्षों तक भिक्षा देकर पाण्डवों का पालन किया — यही ‘कृतम्’ (किया गया उपकार) है। अब उसका बदला चुकाने का अवसर आया — यही ‘प्रतिकृतम्’ है। पाठ के श्लोक ‘कृतं प्रतिकृतं भूयादेष धर्मः सनातनः’ का पूरा अर्थ इसी पृष्ठभूमि से खुलता है। इसीलिए पुस्तक ने यह खण्ड संवाद से पहले रखा है।
ध्यान दें: ‘एकचक्रा’ नगरी का नाम ही नाटक का नाम बना — एकचक्रम्। ‘पर्यायेण’ का अर्थ है ‘बारी-बारी से’ — यही शब्द आगे संवाद में भी आता है (‘पर्यायक्रमेण तस्मै बलिमाहरन्ति पौराः’, ‘श्वः प्रभाते भवत्यस्य विप्रस्य पर्यायः’, ‘पर्यायपतितं प्रतिवेशिनो ब्राह्मणस्य’)। एक ही शब्द को तीन रूपों में पहचानना इस पाठ का अच्छा अभ्यास है।
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