कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्रति के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ-परिचय — पाठ का आरम्भ एक छोटे गद्यांश से होता है : ‘संस्कृतवाङ्मये उपनिषत्-साहित्यस्य विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च स्थानम् अस्ति।’ संस्कृत वाङ्मय में उपनिषदों का विशिष्ट स्थान है, उनमें अनेक ज्ञानप्रद संवाद हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् में समग्र जीवन-विकास के लिए पञ्चकोषों का महत्त्व पिता-पुत्र के संवाद के रूप में वर्णित है — वही संवाद इस पाठ में पढ़ाया गया है। विधा तथा स्रोत — यह संवाद (नाट्यात्मक गद्य) है, कोई कथा या गीत नहीं। मूल स्रोत तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली (तृतीय वल्ली) है। पाठ में उद्धृत श्लोक अन्य ग्रन्थों से भी लिए गए हैं — महाभारत (वनपर्व १३१/७), छान्दोग्योपनिषद् (७/२६/२), हठयोगप्रदीपिका , अमृतबिन्दु-उपनिषद् (१/१, १/२), बृहदारण्यकोपनिषद् (१/५/३) तथा शतपथब्राह्मणम् । कथावस्तु — ब्रह्मज्ञान की जिज्ञासा लेकर भृगु पिता वरुण के पास जाता है। वरुण उत्तर नहीं देते — कहते हैं ‘ तपस्तप्यताम्
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| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी अर्थ | पाठ का वाक्य / प्रसङ्ग |
|---|---|---|---|
| अन्वेष्टव्यम् (अनु + √इष् + तव्यत्) | अनुसन्धेयम् | खोज करनी चाहिए | ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम् (पृ. ९२) |
| अवबुद्धम् (अव + √बुध् + क्त) | ज्ञातम् | समझा गया | पुत्र! त्वया सम्यग् अवबुद्धम् (पृ. ९३) |
| उदीरितम् (उद् + √ईर् + क्त) | उक्तम् / प्रकटितम् | कहा गया | पुत्र! त्वया सत्यम् उदीरितम् (पृ. ९४) |
| कामः (पुं.) | इच्छा | इच्छा | कामः संकल्पो विचिकित्सा… सर्वं मन एव (पृ. ९५) |
| कुर्वीत (√कृ, विधिलिङ्, आ.) | कुर्यात् | करना चाहिए | प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत (पृ. ९३) |
| धृतिः (स्त्री.) | धैर्यम् | धैर्य | धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव (पृ. ९५) |
| धीः (स्त्री.) | बुद्धिः | बुद्धि | …ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव (पृ. ९५) |
| निष्क्रान्तिः (निस् + √क्रम् + क्तिन्) | बहिर्निर्गमनम् | बाहर जाना | मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत् (पृ. ९४) |
| परिहर्तव्यम् (परि + √हृ + तव्यत्) | त्यक्तव्यम् | त्याग करना चाहिए | कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम् (पृ. ९३) |
| प्रकटितम् (प्र + √कट् + क्त) | प्रकाशितम् | प्रकट हुआ | हे वत्स! त्वया सत्यं प्रकटितम् (पृ. ९७) |
| प्राणः (पुं.) | प्राणवायुः | प्राण वायु | प्राणो हि भूतानाम् आयुः (पृ. ९४) |
| ब्रह्म (नपुं.) | परमात्मा / ईश्वरः | परमात्मा | अन्नं वै ब्रह्म इति (पृ. ९३) |
| भूतानि (नपुं. ब.व.) | प्राणिनः | प्राणी जन | अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम् (पृ. ९३) |
| विचिकित्सा (स्त्री.) | सन्देहः | सन्देह | कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा… (पृ. ९५) |
| विज्ञानम् (नपुं.) | बुद्धिः | बुद्धि | बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम् (पृ. ९६) |
| विप्रमोक्षः (वि + प्र + मोक्षः) | अत्यन्तं मोक्षः | अत्यन्त मोक्ष | स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः (पृ. ९७) |
| विवर्धन्ते (वि + √वृध् + लट्, आ.) | विशेषेण वृद्धिं प्राप्नुवन्ति | विशेष रूप से बढ़ते हैं | आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः (पृ. ९३) |
| श्रद्धा (स्त्री.) | आदरः | निष्ठा | …श्रद्धाऽश्रद्धा… सर्वं मन एव (पृ. ९५) |
| सङ्कल्पः (पुं.) | प्रतिज्ञा | सङ्कल्प | मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते (पृ. ९५) |
| सम्भवन्ति (सम् + √भू + लट्) | जायन्ते | उत्पन्न होते हैं | आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते (पृ. ९३) |
| सर्वग्रन्थीनाम् (पुं. ष.ब.व.) | सर्वेषां ग्रन्थीनाम् (सन्देहानाम्) | सभी गाँठों (सन्देहों) का | स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः (पृ. ९७) |
| साधनीयम् (√साध् + अनीयर्) | संस्करणीयम् | संस्कार करना चाहिए | मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम् (पृ. ९५) |
| स्मृतिलम्भे (षष्ठी-तत्पुरुषः) | स्मृतेः लम्भे (ध्रुवस्मृतेः प्राप्तौ) | ध्रुवस्मृति (आत्मज्ञान) की प्राप्ति होने पर | स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः (पृ. ९७) |
| हातव्याः (√हा + तव्यत्) | त्यक्तव्याः | त्याग करना चाहिए | रागः, द्वेषः, ईर्ष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः (पृ. ९७) |
| ह्रीः (स्त्री.) | लज्जा | लज्जा | …ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव (पृ. ९५) |
अभ्यास
- पाठ-परिचयः
- भृगुवरुणसंवादः
- सर्वं शब्देन भासते
- अत्र इदम् अवधेयम्
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- व्याकरणम्
- व्याकरणम्
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः
- यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्