शारदा अध्याय 8 अन्नाद् आनन्दं प्रति के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-06

इस अध्याय के बारे में

पाठ-परिचय — पाठ का आरम्भ एक छोटे गद्यांश से होता है : ‘संस्कृतवाङ्मये उपनिषत्-साहित्यस्य विशिष्टं महत्त्वपूर्णं च स्थानम् अस्ति।’ संस्कृत वाङ्मय में उपनिषदों का विशिष्ट स्थान है, उनमें अनेक ज्ञानप्रद संवाद हैं। तैत्तिरीयोपनिषद् में समग्र जीवन-विकास के लिए पञ्चकोषों का महत्त्व पिता-पुत्र के संवाद के रूप में वर्णित है — वही संवाद इस पाठ में पढ़ाया गया है। विधा तथा स्रोत — यह संवाद (नाट्यात्मक गद्य) है, कोई कथा या गीत नहीं। मूल स्रोत तैत्तिरीयोपनिषद् की भृगुवल्ली (तृतीय वल्ली) है। पाठ में उद्धृत श्लोक अन्य ग्रन्थों से भी लिए गए हैं — महाभारत (वनपर्व १३१/७), छान्दोग्योपनिषद् (७/२६/२), हठयोगप्रदीपिका , अमृतबिन्दु-उपनिषद् (१/१, १/२), बृहदारण्यकोपनिषद् (१/५/३) तथा शतपथब्राह्मणम् । कथावस्तु — ब्रह्मज्ञान की जिज्ञासा लेकर भृगु पिता वरुण के पास जाता है। वरुण उत्तर नहीं देते — कहते हैं ‘ तपस्तप्यताम्

  1. पाठ-परिचयः
  2. भृगुवरुणसंवादः
  3. सर्वं शब्देन भासते
  4. अत्र इदम् अवधेयम्
  5. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  6. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  7. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  8. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  9. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  10. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  11. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  12. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  13. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  14. व्याकरणम्
  15. व्याकरणम्
  16. स्वाध्यायान्मा प्रमदः
  17. यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्
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