शारदा अध्याय 8 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
…………… शरीरं वर्धते।
उत्तर

उत्तरम् — अन्नेन शरीरं वर्धते। (हिन्दी — अन्न से शरीर बढ़ता है।)

क्यों यही पद: पाठ में भृगु का वाक्य है — ‘अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते’ (पृ. ९३)। ‘वर्धते’ क्रिया अपने आप नहीं होती, किसी साधन से होती है; और साधन के अर्थ में तृतीया आती है — «करणे तृतीया»। अन्न ही यहाँ करण है, इसलिए ‘अन्नेन’ (अन्न, नपुंसकलिङ्ग, तृतीया, एकवचन)।
ध्यान दें: पुस्तक में यह पहला उपभेद उदाहरण के साथ ही हल करके (लाल स्याही में ‘अन्नेन’) छापा गया है — उदाहरण और (क) दोनों एक ही वाक्य हैं। इसलिए असल में भरने के लिए (ख) से (छ) तक छह रिक्तस्थान बचते हैं।
प्र2.
…………… शरीरं प्रतिष्ठितम्।
उत्तर

उत्तरम् — प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। (हिन्दी — शरीर प्राण में टिका हुआ है।)

क्यों यही पद: पाठ का वाक्य ज्यों का त्यों यही है — ‘प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्’ (पृ. ९४)। ‘प्रतिष्ठितम्’ का अर्थ है ‘स्थित है, टिका है’; और जिस आधार पर कोई वस्तु टिकती है, वह अधिकरण होता है — «अधिकरणे सप्तमी»। इसलिए ‘प्राणः’ का सप्तमी एकवचन रूप ‘प्राणे’ चाहिए, ‘प्राणेन’ या ‘प्राणात्’ नहीं।
तुलना कीजिए: (ख) में ‘प्राणे’ (सप्तमी — आधार), (ग) में ‘प्राणेन’ (तृतीया — विना के योग में), (घ) में ‘प्राणाद्’ (पञ्चमी — उत्पत्ति का स्रोत)। एक ही शब्द तीन विभक्तियों में — यही इस प्रश्न की असली परीक्षा है।
प्र3.
…………… विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।
उत्तर

उत्तरम् — प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति। (हिन्दी — प्राण के बिना शरीर क्रियाहीन हो जाता है।)

नियम पहले, प्रयोग बाद में: «विना, ऋते» — इन अव्ययों के योग में द्वितीया, तृतीया अथवा पञ्चमी विभक्ति होती है। पाठ में यही वाक्य तृतीया के साथ छपा है — ‘प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति’ (पृ. ९४) — इसलिए यहाँ ‘प्राणेन’ ही लिखिए। भाव यह है कि प्राण निकल जाने पर शरीर बचा तो रहता है, पर उसमें कोई क्रिया नहीं होती।
इसी पाठ से दूसरा उदाहरण:बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः… विकासो न भवति’ (पृ. ९६) — यहाँ ‘विना’ के साथ द्वितीया है। तीसरा रूप पञ्चमी होता है — ‘प्राणाद् विना’। तीनों शुद्ध हैं। अभ्यास का प्रश्न ३ (ज) इसी नियम की परीक्षा लेता है।
प्र4.
…………… एव इमानि भूतानि जायन्ते।
उत्तर

उत्तरम् — प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते। (हिन्दी — प्राण से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं।)

क्यों यही पद: वरुण का वाक्य ज्यों का त्यों यही है — ‘प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते’ (पृ. ९४)। ‘जायन्ते’ (उत्पन्न होते हैं) के साथ जिससे उत्पत्ति हो, वह अपादान होता है — «ध्रुवमपायेऽपादानम्», और «अपादाने पञ्चमी»। ‘प्राणः’ का पञ्चमी एकवचन ‘प्राणात्’; ‘एव’ से पहले ‘त्’ का ‘द्’ हो जाता है (व्यञ्जनसन्धि) — इसलिए ‘प्राणाद् एव’।
एक और स्वीकार्य उत्तर: पृष्ठ १११ के उपनिषद्वचन में लिखा है — ‘अन्नादेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते’। इसलिए ‘अन्नाद्’ भी अशुद्ध नहीं है। पर पाठ के संवाद में यही वाक्य ‘प्राणाद् एव’ के साथ आया है, और प्रश्न में ‘खलु’ नहीं है — इसलिए प्राणाद् ही सर्वाधिक उपयुक्त उत्तर है। परीक्षा में उत्तर के आगे कोष्ठक में ‘(अन्नाद् अपि)’ लिख देना अच्छा रहता है।
प्र5.
…………… समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते।
उत्तर

उत्तरम् — मनसा समस्तानि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते। (हिन्दी — मन के द्वारा सारी इन्द्रियाँ चलाई जाती हैं।)

दो कारणों से तृतीया: (१) ‘सञ्चाल्यन्ते’ कर्मवाच्य की क्रिया है (सम् + √चल् णिच् + लट् + कर्मवाच्य), और «कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया» — कर्मवाच्य में कर्ता तृतीया में आता है। चलाने वाला मन है, इसलिए ‘मनसा’। (२) यही रूप पाठ में छपा है — ‘समस्तानि इन्द्रियाणि अपि मनसा सञ्चाल्यन्ते’ (पृ. ९५)।
रूप याद रखिए: ‘मनस्’ नपुंसकलिङ्ग सकारान्त शब्द है — प्रथमा/द्वितीया ‘मनः’, तृतीया ‘मनसा’, चतुर्थी ‘मनसे’, पञ्चमी/षष्ठी ‘मनसः’, सप्तमी ‘मनसि’। पाठ में ये सभी रूप आए हैं, इसलिए इन्हें एक साथ याद कर लीजिए।
प्र6.
…………… विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति।
उत्तर

उत्तरम् — बुद्धितत्त्वं विना बोधशक्तेः तर्कशक्तेश्च विकासो न भवति। (हिन्दी — बुद्धितत्त्व के बिना बोध-शक्ति और तर्क-शक्ति का विकास नहीं होता।)

क्यों यही पद: पाठ में भृगु का वाक्य है — ‘बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासो न भवति’ (पृ. ९६)। ‘विना’ के योग में यहाँ द्वितीया प्रयुक्त है (नियम वही जो (ग) में — विना के साथ द्वितीया/तृतीया/पञ्चमी)। ‘बुद्धितत्त्वेन विना’ लिखना भी शुद्ध है, पर पाठ का रूप ‘बुद्धितत्त्वं’ ही है।
जोड़कर पढ़िए: ‘बोधशक्तेः … विकासः’ में सम्बन्धे षष्ठी है — ‘शक्ति का विकास’। ‘तर्कशक्तेश्च’ = तर्कशक्तेः + च (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘श्’, क्योंकि आगे ‘च्’ है)।
प्र7.
…………… एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्।
उत्तर

उत्तरम् — मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्। (हिन्दी — मन ही सब कर्मों का प्रवर्तक है।)

क्यों यही पद: पाठ का वाक्य है — ‘अस्माकं मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्’ (पृ. ९५)। यहाँ ‘प्रवर्तकम्’ विधेय-विशेषण है और नपुंसकलिङ्ग में है; इसलिए कर्ता भी नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन चाहिए — ‘मनः’ ठीक बैठता है (‘बुद्धिः’ स्त्रीलिङ्ग है, इसलिए वह नहीं चलेगा — तब ‘प्रवर्तिका’ होना पड़ता)। यही लिङ्ग-मिलान इस रिक्तस्थान की कुंजी है।
सन्धि: लिखते समय ‘मनः + एव’ की सन्धि होकर ‘मन एव’ बनता है (विसर्गलोप — अकार के बाद विसर्ग, आगे स्वर)। पुस्तक ने वाक्य इसी सन्धि-रूप में छापा है। ‘सर्वकर्मणः’ — कर्मन् शब्द की षष्ठी एकवचन, सम्बन्धे षष्ठी
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