प्र1.
…………… शरीरं वर्धते।
उत्तर
उत्तरम् — अन्नेन शरीरं वर्धते। (हिन्दी — अन्न से शरीर बढ़ता है।)
क्यों यही पद: पाठ में भृगु का वाक्य है — ‘अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते’ (पृ. ९३)। ‘वर्धते’ क्रिया अपने आप नहीं होती, किसी साधन से होती है; और साधन के अर्थ में तृतीया आती है — «करणे तृतीया»। अन्न ही यहाँ करण है, इसलिए ‘अन्नेन’ (अन्न, नपुंसकलिङ्ग, तृतीया, एकवचन)।
ध्यान दें: पुस्तक में यह पहला उपभेद उदाहरण के साथ ही हल करके (लाल स्याही में ‘अन्नेन’) छापा गया है — उदाहरण और (क) दोनों एक ही वाक्य हैं। इसलिए असल में भरने के लिए (ख) से (छ) तक छह रिक्तस्थान बचते हैं।