शारदा अध्याय 8 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
भृगोः जिज्ञासा कस्मिन् विषये आसीत् ?
उत्तर

उत्तरम् — भृगोः जिज्ञासा ब्रह्मविषये आसीत्।

(हिन्दी — भृगु की जिज्ञासा ब्रह्म के विषय में थी।)

पाठ से प्रमाण: भृगु स्वयं कहता है — ‘भगवन्! ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चाल्यते?’ (पृ. ९२)। अर्थात् उसका प्रश्न यह था कि वह ब्रह्म क्या है जिससे यह सारा संसार चलाया जाता है।
उत्तर की बनावट: प्रश्न में ‘कस्मिन् विषये’ — सप्तमी है, इसलिए उत्तर भी सप्तमी में ही आएगा — ‘ब्रह्मविषये’। प्रश्न की विभक्ति ही उत्तर की विभक्ति तय करती है — यह नियम पूरे प्रश्न २ पर लागू होता है।
प्र2.
भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय किम् आचरितम् ?
उत्तर

उत्तरम् — भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय तपः आचरितम्। (विस्तरेण — भृगुणा ब्रह्मज्ञानाय पञ्चवारं वनं पर्वतं च गत्वा अनेकवर्षाणि कठोरं तपः आचरितम्।)

(हिन्दी — भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए तप किया। — विस्तार से : भृगु ने ब्रह्मज्ञान के लिए पाँच बार वन तथा पर्वत जाकर अनेक वर्षों तक कठोर तप किया।)

पाठ से प्रमाण: पिता वरुण ने पहले ही कह दिया था — ‘तपस्तप्यताम्। तपसैव ज्ञायते।’ इसके बाद हर बार वही वाक्य लौटता है — ‘ततो भृगुः अनेकवर्षाणि तप आचरति’, ‘पुनः भृगुः पर्वतं गत्वा बहूनि वर्षाणि तप आचरति’, ‘सः पुनः बहुकालं यावद् वनं गत्वा तपश्चर्यां कुरुते’। पूरे पाठ में यह पाँच बार दोहराया गया है।
व्याकरण: वाक्य कर्मवाच्य में है — इसलिए कर्ता ‘भृगुणा’ तृतीया में, कर्म ‘तपः’ प्रथमा में, और क्रिया ‘आचरितम्’ कर्मपद के अनुसार नपुंसकलिङ्ग एकवचन में। प्रश्न भी कर्मवाच्य में ही पूछा गया है (‘भृगुणा… किम् आचरितम्?’), इसलिए उत्तर भी उसी वाच्य में देना चाहिए।
प्र3.
भृगुः प्रथमं तपसा ब्रह्मरूपेण किं ज्ञातवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — भृगुः प्रथमं तपसा अन्नं ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् — ‘अन्नं वै ब्रह्म’ इति।

(हिन्दी — भृगु ने पहले तप से अन्न को ब्रह्म के रूप में जाना — ‘अन्न ही ब्रह्म है’।)

पाठ से प्रमाण तथा तर्क: पहली बार तप करके लौटने पर भृगु कहता है — ‘भोः पितः! अन्नं वै ब्रह्म इति’ (पृ. ९३)। उसके तीन कारण भी वह गिनाता है — ‘अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। अन्नेन एव प्राणिनः जीवन्ति। अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते।’ इसी उत्तर से पाठ का पहला कोष — अन्नमयकोषः — खुलता है।
शब्द पर ध्यान: ‘वै’ अव्यय है और निश्चय/बल के अर्थ में आता है — ‘निश्चय ही’। पाठ के पाँचों उत्तर इसी साँचे में हैं : अन्नं वै ब्रह्म, प्राणो वै ब्रह्म, मनो वै ब्रह्म, विज्ञानं वै ब्रह्म, आनन्दो वै ब्रह्म — यह आवृत्ति उपनिषद् की अपनी शैली है।
प्र4.
मनसः के जायन्ते ?
उत्तर

उत्तरम् — मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते।

(हिन्दी — मन से संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं।)

पाठ से प्रमाण: भृगु का वाक्य ज्यों का त्यों यही है — ‘मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते’ (पृ. ९५)। यही उसका तीसरा तर्क है जिससे वह ‘मनो वै ब्रह्म’ पर पहुँचता है — जो सब सोच-विचार का स्रोत है, वही सबसे बड़ा है।
व्याकरण: प्रश्न में ‘के’ — पुंलिङ्ग प्रथमा बहुवचन है, इसलिए उत्तर भी बहुवचन में तीन कर्ता देकर ही पूरा होगा; एक शब्द से उत्तर अधूरा रहेगा। ‘मनसः’ यहाँ अपादान पञ्चमी है (जिससे उत्पत्ति हो)। ‘विचाराश्च’ = विचाराः + च (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘श्’)।
प्र5.
प्राणिनः कस्मात् जायन्ते ?
उत्तर

उत्तरम् — प्राणिनः अन्नात् जायन्ते। (पाठस्य वाक्यम् — ‘अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते।’)

(हिन्दी — प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं।)

पाठ से प्रमाण: ‘हे पितः! अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। अन्नेन एव प्राणिनः जीवन्ति’ (पृ. ९३); और पृष्ठ १११ का उपनिषद्वचन भी यही दोहराता है — ‘अन्नादेव खलु इमानि भूतानि जायन्ते। अन्नेन जातानि जीवन्ति।’
विभक्ति का मिलान: प्रश्न ‘कस्मात्’ — पञ्चमी एकवचन में है, इसलिए उत्तर भी पञ्चमी में — ‘अन्नात्’। यदि प्रश्न ‘केन जीवन्ति?’ होता तो उत्तर तृतीया में ‘अन्नेन’ होता। दोनों वाक्य पाठ में साथ-साथ छपे हैं — तुलना कीजिए और अन्तर पकड़िए।
प्र6.
इन्द्रियाणि केन सञ्चाल्यन्ते ?
उत्तर

उत्तरम् — इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।

(हिन्दी — इन्द्रियाँ मन के द्वारा चलाई जाती हैं।)

पाठ से प्रमाण तथा नियम: ‘समस्तानि इन्द्रियाणि अपि मनसा सञ्चाल्यन्ते’ (पृ. ९५)। वाक्य कर्मवाच्य में है — इसलिए कर्म ‘इन्द्रियाणि’ प्रथमा में, कर्ता ‘मनः’ तृतीया में («कर्मवाच्ये कर्तरि तृतीया»), और क्रिया कर्मपद के अनुसार बहुवचन में। इसी उदाहरण को पृष्ठ १०५ के वाच्य-बक्से में भी रखा गया है — ‘मनः सर्वाणि इन्द्रियाणि सञ्चालयति’ (कर्तृवाच्य) = ‘मनसा सर्वाणि इन्द्रियाणि सञ्चाल्यन्ते’ (कर्मवाच्य)।
भाव भी समझिए: आँख देखती है, कान सुनते हैं — पर मन कहीं और हो तो न दिखता है, न सुनाई देता है। इसीलिए भृगु कहता है कि इन्द्रियाँ स्वतन्त्र नहीं, मन से चलाई जाती हैं — इसीलिए क्रिया कर्मवाच्य में है।
प्र7.
शरीरं कुत्र प्रतिष्ठितम् अस्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — शरीरं प्राणे प्रतिष्ठितम् अस्ति।

(हिन्दी — शरीर प्राण में टिका हुआ है।)

पाठ से प्रमाण: भृगु का वाक्य — ‘प्राणो हि भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्’ (पृ. ९४); यही वाक्य पृष्ठ १११ के उपनिषद्वचन ४ में भी दोहराया गया है। भाव यह है कि शरीर आधेय है और प्राण आधार — प्राण निकलते ही शरीर ‘क्रियाशून्यं भवति’।
व्याकरण: प्रश्न ‘कुत्र’ (कहाँ) — इसका उत्तर सदा सप्तमी में या स्थानवाचक अव्यय में आता है, इसलिए ‘प्राणे’ ही ठीक है। «आधारोऽधिकरणम्» तथा «अधिकरणे सप्तमी» — यही नियम यहाँ लगा है।
प्र8.
केन विना स्मृतिशक्तेर्विकासो न भवति ?
उत्तर

उत्तरम् — बुद्धितत्त्वेन विना स्मृतिशक्तेः विकासो न भवति।

(हिन्दी — बुद्धितत्त्व के बिना स्मृति-शक्ति का विकास नहीं होता।)

पाठ से प्रमाण: ‘बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासो न भवति’ (पृ. ९६)। अर्थात् बुद्धि ही वह तत्त्व है जो पाँचों शक्तियों — बोध, तर्क, विवेक, निर्णय तथा स्मृति — को बढ़ाती है।
विभक्ति क्यों बदली: पाठ में ‘बुद्धितत्त्वं विना’ (द्वितीया) है, पर प्रश्न में ‘केन विना’ — तृतीया है; इसलिए उत्तर भी तृतीया में ‘बुद्धितत्त्वेन विना’ देना चाहिए। ‘विना’ के साथ द्वितीया, तृतीया और पञ्चमी — तीनों चलती हैं, इसलिए दोनों रूप शुद्ध हैं; पर प्रश्न से मेल खाता रूप ही सर्वोत्तम उत्तर होता है
प्र9.
भृगुः तपसा केषां महत्त्वं ज्ञातवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — भृगुः तपसा अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान् — अर्थात् सः पञ्चानां कोषाणां महत्त्वं ज्ञातवान्।

(हिन्दी — भृगु ने तप से अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द का — अर्थात् पाँचों कोषों का — महत्त्व जाना।)

पाठ से प्रमाण: संवाद के अन्त में वरुण स्वयं यह गिनाते हैं — ‘हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिरेव अस्माकं पूर्णविकासो भवति’ (पृ. ९७)। यही पाँच ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय तथा आनन्दमय कोष कहलाए हैं।
व्याकरण: प्रश्न ‘केषां’ — षष्ठी बहुवचन है, इसलिए उत्तर में सारे नाम षष्ठी में आएँगे और अन्त में ‘च’ लगेगा। ‘महत्त्वम्’ के साथ सदा सम्बन्धे षष्ठी ही आती है — ‘अन्नस्य महत्त्वम्’, न कि ‘अन्नं महत्त्वम्’।
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