शारदा अध्याय 8 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
प्रस्तुते पाठे पितापुत्रयोः संवादः अस्ति — ………
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम् (यह वाक्य पुस्तक में उदाहरण के रूप में स्वयं भरा हुआ है।)

क्यों सत्य: पूरा पाठ आद्योपान्त दो व्यक्तियों की बातचीत है — बाईं ओर ‘भृगुः’ और ‘वरुणः’ लिखा है और उनके आगे उनका कथन। और ये दोनों पिता-पुत्र ही हैं : पहले ही वाक्य में लिखा है — ‘वरुणस्य पुत्रः भृगुः सविनयं पितरं प्रति गत्वा निवेदयति’ (पृ. ९२)। इसके अतिरिक्त पाठ-परिचय भी कहता है — ‘अस्मिन् पाठे वयम् पितापुत्रयोः भृगुवरुणयोः संवादं पठिष्यामः।’
व्याकरण: ‘पितापुत्रयोः’ — द्वन्द्व समास (पिता च पुत्रश्च = पितापुत्रौ), षष्ठी द्विवचन। ‘संवादः’ के साथ बोलने वाले सदा षष्ठी में आते हैं — ‘पितापुत्रयोः संवादः’, ‘भृगुवरुणयोः संवादः’।
प्र2.
अस्मिन् संवादे अन्नस्य महत्त्वं वर्णितम् — ………
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम्

क्यों सत्य: संवाद का पहला पूरा सोपान अन्न पर ही है। भृगु कहता है ‘अन्नं वै ब्रह्म’ और वरुण उसका समर्थन करते हुए कहते हैं — ‘अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्। तस्मात् सर्वौषधम् इति उच्यते। अतः कदापि अन्नं न निन्द्यात्… प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत’ (पृ. ९३)। साथ ही महाभारत का श्लोक ‘आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते’ भी यहीं उद्धृत है। इससे बढ़कर अन्न-महिमा का वर्णन और क्या होगा।
जोड़ लीजिए: पाठ का नाम ही ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ है — यात्रा का आरम्भ ही अन्न से होता है। और पृष्ठ ९३ के चित्र में अन्न से मिलने वाले आठ फल भी लिखे हैं — आयुः, प्रज्ञा, मेधा, तेजः, बलम्, ओजः, आरोग्यम्, स्मृतिः।
प्र3.
प्राणिनः मनसः जायन्ते इति कथनम् — ………
उत्तर

उत्तरम् — असत्यम् शुद्धं कथनम् — प्राणिनः अन्नात् (प्राणाद् वा) जायन्ते।

क्यों असत्य: पाठ में उत्पत्ति के दो ही स्रोत बताए गए हैं — ‘अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते’ (पृ. ९३) तथा ‘प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते’ (पृ. ९४)। मन के विषय में जो कहा गया है वह उत्पत्ति नहीं, सञ्चालन तथा संकल्प-भाव-विचार की उत्पत्ति है — ‘मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते’। अर्थात् मन से विचार उपजते हैं, प्राणी नहीं। दोनों को मिलाना ही इस कथन की भूल है।
परीक्षा की युक्ति: ऐसे प्रश्नों में पाठ का ठीक वही वाक्य खोजिए और दोनों में केवल एक शब्द का अन्तर पकड़िए। यहाँ अन्तर ‘मनसः’ बनाम ‘अन्नात्/प्राणात्’ का है, बाकी वाक्य ज्यों का त्यों है — ऐसे ही प्रश्न सबसे अधिक धोखा देते हैं।
प्र4.
अन्नेन शरीरं वर्धते इति — ………
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम्

क्यों सत्य: पाठ का वाक्य है — ‘अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते’ (पृ. ९३), और यही वाक्य अभ्यास के प्रश्न १ का उदाहरण भी है — ‘अन्नेन शरीरं वर्धते’। महाभारत का उद्धृत श्लोक भी यही कहता है — ‘आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः’।
एक बारीकी: पाठ में क्रिया ‘वर्धेते’ (द्विवचन) है क्योंकि वहाँ दो कर्ता हैं — शरीरं और बलं। अभ्यास के इस वाक्य में केवल एक कर्ता ‘शरीरम्’ है, इसलिए क्रिया ‘वर्धते’ एकवचन में है। कर्ता बदलने पर क्रिया का वचन बदलता है — यही कर्तृवाच्य का नियम है।
प्र5.
मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति — ………
उत्तर

उत्तरम् — असत्यम् शुद्धं कथनम् — बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति।

क्यों असत्य: यह वाक्य पाठ में है अवश्य, पर ‘मनः’ के स्थान पर ‘बुद्धिः’ के साथ — ‘बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति’ (पृ. ९६), और यह भृगु के विज्ञानमयकोष वाले उत्तर का अंश है, मनोमयकोष का नहीं। मन के विषय में पाठ कहता है — ‘मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्’ तथा ‘समस्तानि इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते’। अर्थात् मन प्रेरणा देता है, पर सारथि बुद्धि है — वही दिशा तय करती है।
रूपक समझिए: कठोपनिषद् का प्रसिद्ध रूपक है — शरीर रथ, इन्द्रियाँ घोड़े, मन लगाम, बुद्धि सारथि और आत्मा रथी। घोड़े दौड़ते हैं, लगाम उन्हें थामती है, पर रथ किधर जाएगा — यह सारथि तय करता है। इसीलिए मन को सारथि कहना रूपक को ही उलट देना है।
प्र6.
भृगुः वरुणस्य पुत्रोऽस्ति — ………
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम्

क्यों सत्य: पाठ के पहले ही कोष्ठक-वाक्य में लिखा है — ‘(एकदा ब्रह्मज्ञानाय तत्परः वरुणस्य पुत्रः भृगुः सविनयं पितरं प्रति गत्वा निवेदयति)’ (पृ. ९२)। इसके अतिरिक्त पूरे संवाद में वरुण भृगु को ‘पुत्र!’, ‘वत्स!’ कहते हैं और भृगु उन्हें ‘पितः!’, ‘तात!’, ‘भगवन्!’, ‘श्रीमन्!’ कहकर सम्बोधित करता है — यही सम्बन्ध का सबसे स्पष्ट प्रमाण है।
सन्धि: ‘पुत्रोऽस्ति’ = पुत्रः + अस्ति → विसर्ग का ‘उ’, फिर अ + उ = ओ (उत्वम्), और आगे के ‘अ’ का लोप अवग्रह (ऽ) से दिखाया जाता है — यही विसर्गसन्धि का सबसे आम रूप है।
प्र7.
भृगुः तपसा मनो ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान् — ………
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम्

क्यों सत्य: तीसरी बार तप करके लौटने पर भृगु स्वयं कहता है — ‘हे तात! मया तपसा मनो वै ब्रह्म इति ज्ञातम्’ (पृ. ९५)। और वरुण उसका अनुमोदन भी करते हैं — ‘हे वत्स! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सर्वमिति।’ इसलिए कथन सत्य है।
पूरा क्रम याद रखिए: भृगु ने क्रमशः पाँच उत्तर पाए — अन्नं → प्राणः → मनः → विज्ञानम् → आनन्दः। ‘मनः’ बीच का, अर्थात् तीसरा उत्तर है। परीक्षा में यह क्रम पूछा जाना बहुत सामान्य है, इसलिए इसे उँगलियों पर गिनकर याद कर लीजिए।
प्र8.
विना योगे तृतीया विभक्तिर्भवति — ………
उत्तर

उत्तरम् — सत्यम् (परन्तु पूर्णः नियमः इत्थम् — विना-योगे द्वितीया, तृतीया, पञ्चमी — इति तिस्रः विभक्तयः भवितुम् अर्हन्ति।)

नियम पहले: «विना, ऋते» — इन अव्ययों के योग में द्वितीया, तृतीया अथवा पञ्चमी विभक्ति होती है। अतः ‘विना के योग में तृतीया होती है’ — यह कथन सत्य है, बस अधूरा है : तृतीया के साथ अन्य दो भी शुद्ध हैं।
विभक्तिःउदाहरणम्कहाँ से
तृतीयाप्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति।पाठ, पृष्ठ ९४
द्वितीयाबुद्धितत्त्वं विना… विकासो न भवति।पाठ, पृष्ठ ९६
पञ्चमीज्ञानाद् विना मुक्तिः न भवति।नियम का तीसरा रूप
देखिए कैसे पाठ स्वयं दोनों रूप देता है: एक ही पाठ में ‘प्राणेन विना’ (तृतीया) और ‘बुद्धितत्त्वं विना’ (द्वितीया) — दोनों छपे हैं। इसलिए उत्तर में ‘सत्यम्’ लिखकर एक पंक्ति में यह जोड़ देना सबसे अच्छा उत्तर है कि तीनों विभक्तियाँ चलती हैं।
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