प्र1.
क्रियापदेन सह समुचितं पदं योजयत — (क) प्राणिनः · (ख) शरीरम् · (ग) तपः · (घ) पितरं · (ङ) यत्नः ॥ १. क्रियताम् · २. कुरुताम् · ३. जायन्ते · ४. वर्धते · ५. ब्रूते
उत्तर
उत्तरम् — मेलनम् एवम् अस्ति :
| पदम् | क्रियापदम् | पूर्णं वाक्यम् | मेलनस्य कारणम् (नियमः) |
|---|---|---|---|
| (क) प्राणिनः | ३. जायन्ते | अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। | ‘प्राणिनः’ प्रथमा बहुवचन है, इसलिए क्रिया भी बहुवचन चाहिए — «क्रिया कर्तृपदानुसारिणी भवति»। (पाठ, पृ. ९३) |
| (ख) शरीरम् | ४. वर्धते | अन्नेन शरीरं वर्धते। | ‘शरीरम्’ नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन — इसलिए क्रिया भी एकवचन। (प्रश्न १ का उदाहरण) |
| (ग) तपः | २. कुरुताम् | तपः कुरुताम्। | वरुण का आदेश — ‘तपः कुरुताम्’ (पृ. ९३, ९४)। ‘तपः’ यहाँ कर्म है और ‘कुरुताम्’ लोट्-लकार आत्मनेपद। |
| (घ) पितरं | ५. ब्रूते | भृगुः पितरं ब्रूते। | ‘ब्रूते’ (कहता है) सकर्मक है और ‘पितरम्’ द्वितीया में — «कर्मणि द्वितीया»। शेष चारों क्रियाओं के साथ द्वितीया नहीं बैठती। |
| (ङ) यत्नः | १. क्रियताम् | त्वया यत्नः क्रियताम्। | पाठ का वाक्य — ‘यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्’ (पृ. ९२)। वहाँ दो कर्ता थे इसलिए द्विवचन ‘क्रियेताम्’; यहाँ अकेला ‘यत्नः’ है इसलिए एकवचन ‘क्रियताम्’। |
मेलन कैसे कीजिए — तीन कसौटियाँ: (१) वचन मिलाइए — ‘प्राणिनः’ बहुवचन है तो ‘जायन्ते’ ही चलेगा, ‘वर्धते’ नहीं। (२) विभक्ति देखिए — ‘पितरम्’ द्वितीया में है, इसलिए उसे कर्म लेने वाली क्रिया ‘ब्रूते’ ही मिलेगी; प्रथमा वाले पद (प्राणिनः, शरीरम्, यत्नः) कर्ता हैं। (३) पाठ का वाक्य याद कीजिए — ‘तपः कुरुताम्’ और ‘यत्नः क्रियताम्’ दोनों पाठ में ज्यों के त्यों हैं। तीनों कसौटियाँ मिलकर उत्तर एक ही निकालती हैं।
ध्यान दें: ‘क्रियताम्’ तथा ‘कुरुताम्’ — दोनों √कृ के लोट्-लकार के रूप हैं, पर वाच्य अलग है। ‘क्रियताम्’ कर्मवाच्य का रूप है (‘किया जाए’ — इसलिए कर्ता तृतीया में : त्वया), और ‘कुरुताम्’ कर्तृवाच्य आत्मनेपद का रूप है (‘करें’ — आदरार्थ)। यही अन्तर पृष्ठ १०५ की वाच्य-तालिका में भी दिखाया गया है।