प्र1.
अवशिष्ट-धातुरूपाणि पूरयत — एकवचनम् / द्विवचनम् / बहुवचनम् (प्रथमं पदं दत्तम् — ‘वर्तते’)।
उत्तर
उत्तरम् — दत्तं पदं ‘वर्तते’ अस्ति; इदं √वृत् धातोः लट्-लकारस्य आत्मनेपदि प्रथमपुरुषैकवचनम् रूपम्। अतः तालिका एवं पूर्यते :
√वृत् (वर्तते) — लट्-लकारः, आत्मनेपदम्
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | वर्तते | वर्तेते | वर्तन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वर्तसे | वर्तेथे | वर्तध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वर्ते | वर्तावहे | वर्तामहे |
रूप कैसे बने — नियम: आत्मनेपद के लट्-लकार के नौ प्रत्यय ये हैं — ते, इते (एते), अन्ते; से, इथे (एथे), ध्वे; ए, आवहे, आमहे। धातु √वृत् गुण होकर ‘वर्त्’ बनता है और शप् (अ) लगकर अङ्ग ‘वर्त’ हो जाता है; उसी में ऊपर के नौ प्रत्यय जोड़ दीजिए — वर्तते, वर्तेते, वर्तन्ते; वर्तसे, वर्तेथे, वर्तध्वे; वर्ते, वर्तावहे, वर्तामहे। इसी साँचे पर पाठ के सारे आत्मनेपदी पद चलते हैं — लभते, सेवते, यतते, मोदते…
पाठ से जोड़िए: ‘वर्तते’ पाठ के पहले ही वाक्य में आया है — ‘ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते’ (पृ. ९२)। यहाँ इसका अर्थ है ‘है / विद्यमान है’। इसी धातु से ‘प्रवर्तकम्’, ‘प्रवर्तयति’ तथा ‘परिवर्तयत’ जैसे पद भी बने हैं जो इसी पाठ में आगे मिलते हैं।