प्र1.
एतानि पदानि लट्-लकारस्य त्रिषु पुरुषेषु रूपाणि पठत लिखत च — लभते, जायते, भाषते, विद्यते, मोदते, सेवते, सहते, शोभते, यतते, वर्धते, मन्यते, द्योतते, रोचते, कम्पते, याचते, सहते, स्पर्धते, लज्जते, क्षीयते।
उत्तर
पहले नियम — फिर तालिका। ये उन्नीसों पद आत्मनेपदी धातुओं के लट्-लकार (वर्तमान काल) के प्रथमपुरुष-एकवचन के रूप हैं। लट्-लकार आत्मनेपद के नौ प्रत्यय ये हैं —
प्रथमपुरुषः — ते · इते (एते) · अन्ते
मध्यमपुरुषः — से · इथे (एथे) · ध्वे
उत्तमपुरुषः — ए · आवहे · आमहे
मध्यमपुरुषः — से · इथे (एथे) · ध्वे
उत्तमपुरुषः — ए · आवहे · आमहे
दिए गए पद में से अन्तिम ‘ते’ हटाइए — जो बचता है वही अङ्ग है (लभते → लभ, वर्धते → वर्ध, क्षीयते → क्षीय)। उसी अङ्ग में ऊपर के नौ प्रत्यय जोड़ दीजिए। नीचे पूरी तालिका है :
| पदम् | धातुः | अर्थः | प्रथमपुरुषः | मध्यमपुरुषः | उत्तमपुरुषः | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| एक. | द्वि. | बहु. | एक. | द्वि. | बहु. | एक. | द्वि. | बहु. | |||
| लभते | √लभ् | पाना | लभते | लभेते | लभन्ते | लभसे | लभेथे | लभध्वे | लभे | लभावहे | लभामहे |
| जायते | √जन् (दिवादि, आ.) | उत्पन्न होना | जायते | जायेते | जायन्ते | जायसे | जायेथे | जायध्वे | जाये | जायावहे | जायामहे |
| भाषते | √भाष् | बोलना | भाषते | भाषेते | भाषन्ते | भाषसे | भाषेथे | भाषध्वे | भाषे | भाषावहे | भाषामहे |
| विद्यते | √विद् (दिवादि, आ.) | होना, विद्यमान रहना | विद्यते | विद्येते | विद्यन्ते | विद्यसे | विद्येथे | विद्यध्वे | विद्ये | विद्यावहे | विद्यामहे |
| मोदते | √मुद् | प्रसन्न होना | मोदते | मोदेते | मोदन्ते | मोदसे | मोदेथे | मोदध्वे | मोदे | मोदावहे | मोदामहे |
| सेवते | √सेव् | सेवा करना | सेवते | सेवेते | सेवन्ते | सेवसे | सेवेथे | सेवध्वे | सेवे | सेवावहे | सेवामहे |
| सहते | √सह् | सहना | सहते | सहेते | सहन्ते | सहसे | सहेथे | सहध्वे | सहे | सहावहे | सहामहे |
| शोभते | √शुभ् | शोभा पाना | शोभते | शोभेते | शोभन्ते | शोभसे | शोभेथे | शोभध्वे | शोभे | शोभावहे | शोभामहे |
| यतते | √यत् | प्रयत्न करना | यतते | यतेते | यतन्ते | यतसे | यतेथे | यतध्वे | यते | यतावहे | यतामहे |
| वर्धते | √वृध् | बढ़ना | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते | वर्धसे | वर्धेथे | वर्धध्वे | वर्धे | वर्धावहे | वर्धामहे |
| मन्यते | √मन् (दिवादि, आ.) | मानना | मन्यते | मन्येते | मन्यन्ते | मन्यसे | मन्येथे | मन्यध्वे | मन्ये | मन्यावहे | मन्यामहे |
| द्योतते | √द्युत् | चमकना | द्योतते | द्योतेते | द्योतन्ते | द्योतसे | द्योतेथे | द्योतध्वे | द्योते | द्योतावहे | द्योतामहे |
| रोचते | √रुच् | अच्छा लगना | रोचते | रोचेते | रोचन्ते | रोचसे | रोचेथे | रोचध्वे | रोचे | रोचावहे | रोचामहे |
| कम्पते | √कम्प् | काँपना | कम्पते | कम्पेते | कम्पन्ते | कम्पसे | कम्पेथे | कम्पध्वे | कम्पे | कम्पावहे | कम्पामहे |
| याचते | √याच् | माँगना | याचते | याचेते | याचन्ते | याचसे | याचेथे | याचध्वे | याचे | याचावहे | याचामहे |
| सहते | √सह् (पुनरुक्तम्) | सहना | सहते | सहेते | सहन्ते | सहसे | सहेथे | सहध्वे | सहे | सहावहे | सहामहे |
| स्पर्धते | √स्पर्ध् | स्पर्धा करना | स्पर्धते | स्पर्धेते | स्पर्धन्ते | स्पर्धसे | स्पर्धेथे | स्पर्धध्वे | स्पर्धे | स्पर्धावहे | स्पर्धामहे |
| लज्जते | √लज्ज् | लजाना | लज्जते | लज्जेते | लज्जन्ते | लज्जसे | लज्जेथे | लज्जध्वे | लज्जे | लज्जावहे | लज्जामहे |
| क्षीयते | √क्षि (दिवादि, आ.) | क्षीण होना | क्षीयते | क्षीयेते | क्षीयन्ते | क्षीयसे | क्षीयेथे | क्षीयध्वे | क्षीये | क्षीयावहे | क्षीयामहे |
ध्यान देने योग्य चार बातें: (१) जायते, विद्यते, मन्यते, क्षीयते — ये चारों दिवादिगण के हैं, इसलिए इनमें ‘य’ पहले से जुड़ा है (जन् + य + ते = जायते); उनका अङ्ग ‘जाय्, विद्य्, मन्य्, क्षीय्’ मानकर चलिए। (२) वर्धते में √वृध् का गुण होकर ‘वर्ध’ बना (ऋ → अर्)। (३) शोभते में √शुभ् का गुण होकर ‘शोभ’ बना (उ → ओ), और मोदते, द्योतते, रोचते में भी यही गुण हुआ है (मुद् → मोद, द्युत् → द्योत, रुच् → रोच)। (४) एक बार अङ्ग निकल जाए तो आगे सब धातुओं में प्रत्यय बिलकुल एक-से लगते हैं — यही आत्मनेपद की सुविधा है।
पुस्तक की सूची में एक छोटी बात: ‘सहते’ इस सूची में दो बार छपा है (सातवें और सोलहवें स्थान पर) — इसलिए वास्तव में पद उन्नीस हैं पर भिन्न धातुएँ अठारह ही हैं। दुहराव मानकर एक ही बार अभ्यास कर लीजिए।
वाक्य बनाकर याद कीजिए (परियोजना-कार्य ३ में यही माँगा गया है): छात्रः विद्यां लभते। बालकाः उद्याने मोदन्ते। वयं गुरुं सेवामहे। त्वं सत्यं भाषसे। अहं सत्कर्मणि यते। वृक्षाः वायुना कम्पन्ते। भिक्षुकः धनं याचते।