प्र1.
आत्मनेपदिधातूनां लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु अभ्यासं कुरुत लिखत च — (पुस्तके ‘वन्द्-धातुः, लोट्-लकारः’ तथा ‘कृ-धातुः, लोट्-लकारः’ इति द्वे आदर्शतालिके दत्ते; अधः रिक्ततालिकयोः प्रथमपदे ‘१. मोदताम्’ तथा ‘२. वर्धताम्’ इति दत्ते।)
उत्तर
पहले पुस्तक की दोनों आदर्श-तालिकाएँ देखिए — इन्हीं के साँचे पर आगे का अभ्यास करना है :
| पुरुषः | वन्द्-धातुः, लोट्-लकारः | कृ-धातुः, लोट्-लकारः | ||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| एक. | द्वि. | बहु. | एक. | द्वि. | बहु. | |
| प्रथमपुरुषः | वन्दताम् | वन्देताम् | वन्दन्ताम् | कुरुताम् | कुर्वाताम् | कुर्वताम् |
| मध्यमपुरुषः | वन्दस्व | वन्देथाम् | वन्दध्वम् | कुरुष्व | कुर्वाथाम् | कुरुध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | वन्दै | वन्दावहै | वन्दामहै | करवै | करवावहै | करवामहै |
अब रिक्त तालिकाओं की पूर्ति —
√मुद् (मोदताम्) — लोट्-लकारः, आत्मनेपदम्
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | मोदताम् | मोदेताम् | मोदन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | मोदस्व | मोदेथाम् | मोदध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | मोदै | मोदावहै | मोदामहै |
√वृध् (वर्धताम्) — लोट्-लकारः, आत्मनेपदम्
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | वर्धताम् | वर्धेताम् | वर्धन्ताम् |
| मध्यमपुरुषः | वर्धस्व | वर्धेथाम् | वर्धध्वम् |
| उत्तमपुरुषः | वर्धै | वर्धावहै | वर्धामहै |
नियम — लोट्-लकार आत्मनेपद के नौ प्रत्यय: ताम् · एताम् · अन्ताम् / स्व · एथाम् · ध्वम् / ऐ · आवहै · आमहै। ध्यान दीजिए, उत्तमपुरुष के तीनों रूप ‘ऐ’ पर समाप्त होते हैं — वन्दै, वन्दावहै, वन्दामहै; मोदै, मोदावहै, मोदामहै। यह लोट्-लकार की सबसे बड़ी पहचान है, क्योंकि लट् में वही रूप ‘ए’ पर समाप्त होते हैं (वन्दे, वन्दावहे, वन्दामहे)।
कृ-धातु अलग क्यों दिखता है: √कृ तनादिगण का है, इसलिए उसमें ‘उ’ विकरण जुड़ता है और अङ्ग ‘कुरु/कुर्व्’ बनता है; उत्तमपुरुष में ‘करव-’ हो जाता है। इसीलिए पुस्तक ने उसे अलग आदर्श के रूप में दिया है — बाकी सब धातुएँ वन्द् के साँचे पर ही चलती हैं।
अर्थ भी पकड़िए: लोट्-लकार आज्ञा, प्रार्थना, आशीर्वाद तथा विनम्र निवेदन — चारों में आता है। पाठ में वरुण के मुख से यही रूप बार-बार निकलते हैं — ‘अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्’, ‘तपः कुरुताम्’, ‘इतोऽपि यतताम्’, ‘सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च’ — यह आदेश नहीं, पिता का स्नेहपूर्ण निर्देश है।