प्र1.
एतानि क्रियापदानि लोट्-लकारे त्रिषु पुरुषेषु पठत लिखत च — लभताम्, सेवताम्, जयताम्, भाषताम्, विद्यताम्, सहताम्, यतताम्, याचताम्, स्पर्धताम्, लज्जताम्, कुरुताम्।
उत्तर
नियम — लोट्-लकार आत्मनेपद के नौ प्रत्यय: ताम् · एताम् · अन्ताम् / स्व · एथाम् · ध्वम् / ऐ · आवहै · आमहै। दिए गए पद में से ‘ताम्’ हटाइए, बचा हुआ अङ्ग लीजिए (लभताम् → लभ), और उसी में ये नौ प्रत्यय जोड़ दीजिए।
| पदम् | धातुः | अर्थः | प्रथमपुरुषः | मध्यमपुरुषः | उत्तमपुरुषः | ||||||
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| एक. | द्वि. | बहु. | एक. | द्वि. | बहु. | एक. | द्वि. | बहु. | |||
| लभताम् | √लभ् | पाए / प्राप्त करे | लभताम् | लभेताम् | लभन्ताम् | लभस्व | लभेथाम् | लभध्वम् | लभै | लभावहै | लभामहै |
| सेवताम् | √सेव् | सेवा करे | सेवताम् | सेवेताम् | सेवन्ताम् | सेवस्व | सेवेथाम् | सेवध्वम् | सेवै | सेवावहै | सेवामहै |
| भाषताम् | √भाष् | बोले | भाषताम् | भाषेताम् | भाषन्ताम् | भाषस्व | भाषेथाम् | भाषध्वम् | भाषै | भाषावहै | भाषामहै |
| विद्यताम् | √विद् | हो / विद्यमान रहे | विद्यताम् | विद्येताम् | विद्यन्ताम् | विद्यस्व | विद्येथाम् | विद्यध्वम् | विद्यै | विद्यावहै | विद्यामहै |
| सहताम् | √सह् | सहे | सहताम् | सहेताम् | सहन्ताम् | सहस्व | सहेथाम् | सहध्वम् | सहै | सहावहै | सहामहै |
| यतताम् | √यत् | प्रयत्न करे | यतताम् | यतेताम् | यतन्ताम् | यतस्व | यतेथाम् | यतध्वम् | यतै | यतावहै | यतामहै |
| याचताम् | √याच् | माँगे | याचताम् | याचेताम् | याचन्ताम् | याचस्व | याचेथाम् | याचध्वम् | याचै | याचावहै | याचामहै |
| स्पर्धताम् | √स्पर्ध् | स्पर्धा करे | स्पर्धताम् | स्पर्धेताम् | स्पर्धन्ताम् | स्पर्धस्व | स्पर्धेथाम् | स्पर्धध्वम् | स्पर्धै | स्पर्धावहै | स्पर्धामहै |
| लज्जताम् | √लज्ज् | लजाए | लज्जताम् | लज्जेताम् | लज्जन्ताम् | लज्जस्व | लज्जेथाम् | लज्जध्वम् | लज्जै | लज्जावहै | लज्जामहै |
| कुरुताम् | √कृ (तनादि, आ.) | करे | कुरुताम् | कुर्वाताम् | कुर्वताम् | कुरुष्व | कुर्वाथाम् | कुरुध्वम् | करवै | करवावहै | करवामहै |
| जयताम् * | √जि (भ्वादि, प.) | जीते | जयतु | जयताम् | जयन्तु | जय | जयतम् | जयत | जयानि | जयाव | जयाम |
* ‘जयताम्’ के विषय में — यह पद शेष दस से भिन्न है। पुस्तक में यह ‘जयताम्’ छपा है, जो √जि (जीतना), भ्वादिगण, परस्मैपद का लोट्-लकार प्रथमपुरुष-द्विवचन रूप है (जयतु · जयताम् · जयन्तु) — इसीलिए ऊपर की पंक्ति में उसके परस्मैपदी रूप दिए गए हैं। किन्तु सूची के बाकी सब पद प्रश्न ६ की आत्मनेपदी सूची के ही लोट्-रूप हैं (लभते → लभताम्, सेवते → सेवताम्, भाषते → भाषताम्…)। उस क्रम को देखते हुए यहाँ ‘जायते’ का लोट्-रूप ‘जायताम्’ अपेक्षित लगता है — उसके रूप होंगे : जायताम् · जायेताम् · जायन्ताम् / जायस्व · जायेथाम् · जायध्वम् / जायै · जायावहै · जायामहै। परीक्षा में दोनों में से जो पूछा जाए, वही लिखिए; और अपनी पुस्तक में छपा रूप ध्यान से पढ़िए।
लट् और लोट् का अन्तर एक पंक्ति में: लट् बताता है — ‘वह सेवा करता है’ (सेवते); लोट् कहता है — ‘वह सेवा करे / आप सेवा कीजिए’ (सेवताम्)। दोनों तालिकाएँ साथ रखकर देखिए तो अन्तर केवल प्रत्ययों का है : ते→ताम्, से→स्व, ध्वे→ध्वम्, ए→ऐ। इतना पकड़ लीजिए, पूरा लोट्-लकार अपने आप बन जाएगा।
कृ-धातु फिर याद रखिए: ‘कुरुताम्’ के रूप वन्द् के साँचे पर नहीं चलते — कुरुताम् · कुर्वाताम् · कुर्वताम् / कुरुष्व · कुर्वाथाम् · कुरुध्वम् / करवै · करवावहै · करवामहै। ये रूप पुस्तक ने प्रश्न ७ की आदर्श-तालिका में स्वयं दे दिए हैं, इसलिए वहीं से लीजिए।