शारदा अध्याय 8 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
लट्-लकारः — बालकः अन्नस्य निन्दां न कुरुते। → लोट्-लकारः — भवान् ……………
उत्तर

उत्तरम् — भवान् अन्नस्य निन्दां न कुरुताम्

(हिन्दी — आप अन्न की निन्दा न कीजिए।)

नियम पहले: ‘भवान्’ अर्थ में तो ‘आप’ है, पर संस्कृत में वह प्रथमपुरुष एकवचन ही माना जाता है (‘भवान् गच्छति’, ‘भवान् गच्छतु’)। अतः क्रिया भी लोट्-लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन चाहिए — √कृ का वह रूप है ‘कुरुताम्’। (यही रूप उदाहरण में भी है — ‘भवान् … सेवताम्।’)
पाठ से जोड़िए: वरुण ने भी यही कहा था — ‘अतः कदापि अन्नं न निन्द्यात्’ (पृ. ९३)। वहाँ विधिलिङ् था, यहाँ लोट् है; अर्थ दोनों का एक ही — ‘निन्दा नहीं करनी चाहिए’।
प्र2.
लट्-लकारः — मम जीवने यशो वर्धते। → लोट्-लकारः — तव ……………
उत्तर

उत्तरम् — तव जीवने यशो वर्धताम्

(हिन्दी — तुम्हारे जीवन में यश बढ़े। — यह आशीर्वाद-वाक्य है।)

कर्ता कौन है — ध्यान दीजिए: इस वाक्य में कर्ता ‘तव’ नहीं, ‘यशः’ है; ‘मम/तव’ तो केवल सम्बन्धे षष्ठी है (‘मेरे जीवन में’, ‘तुम्हारे जीवन में’)। ‘यशः’ नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन है, इसलिए क्रिया प्रथमपुरुष एकवचन में — √वृध् का लोट् रूप ‘वर्धताम्’। यही इस उपभेद की परीक्षा है : कर्ता बदला ही नहीं, केवल लकार बदला।
भाव: लोट्-लकार केवल आज्ञा नहीं देता, आशीर्वाद भी देता है — ‘तव जीवने यशो वर्धताम्’, ‘शुभं भूयात्’, ‘चिरं जीव’। इसी अर्थ में पाठ का ‘सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च’ भी पढ़िए।
प्र3.
लट्-लकारः — अहं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुर्वे। → लोट्-लकारः — त्वं ……………
उत्तर

उत्तरम् — त्वं बौद्धिकविकासाय सदा योगासनं कुरुष्व

(हिन्दी — तुम बौद्धिक विकास के लिए सदा योगासन करो।)

नियम: कर्ता ‘त्वम्’ है — अर्थात् मध्यमपुरुष, एकवचन। लोट्-लकार आत्मनेपद में मध्यमपुरुष-एकवचन का प्रत्यय ‘स्व’ है (वन्दस्व, सेवस्व, लभस्व)। √कृ का अङ्ग ‘कुरु’ है, इसलिए रूप बनता है ‘कुरुष्व’ — यह रूप पुस्तक ने प्रश्न ७ की आदर्श-तालिका में स्वयं दिया है।
ध्यान दें: ‘कुर्वे’ लट्-लकार का उत्तमपुरुष एकवचन है (‘मैं करता हूँ’)। कर्ता ‘अहम्’ से ‘त्वम्’ हुआ, इसलिए पुरुष भी उत्तम से मध्यम हो गया — क्रिया का पुरुष सदा कर्ता के पुरुष के अनुसार बदलता है। यही पूरे प्रश्न ९ की कुंजी है।
प्र4.
लट्-लकारः — रमेशः सर्वदा सत्यं भाषते। → लोट्-लकारः — दिनेशः ……………
उत्तर

उत्तरम् — दिनेशः सर्वदा सत्यं भाषताम्

(हिन्दी — दिनेश सदा सत्य बोले।)

नियम: ‘दिनेशः’ प्रथमा एकवचन, प्रथमपुरुष का कर्ता है। लोट्-लकार आत्मनेपद प्रथमपुरुष-एकवचन का प्रत्यय ‘ताम्’ है, अङ्ग ‘भाष’ — इसलिए ‘भाषताम्’। कर्ता का नाम बदला (रमेश → दिनेश) पर पुरुष और वचन वही रहे, इसलिए केवल लकार बदलना है।
‘भाषताम्’ प्रश्न ८ की सूची में भी है — वहाँ इसके नौ रूप लिखने को कहा गया है : भाषताम् · भाषेताम् · भाषन्ताम् / भाषस्व · भाषेथाम् · भाषध्वम् / भाषै · भाषावहै · भाषामहै।
प्र5.
लट्-लकारः — छात्रः लक्ष्यसिद्ध्ये कष्टं सहते। → लोट्-लकारः — अहं ……………
उत्तर

उत्तरम् — अहं लक्ष्यसिद्ध्यै कष्टं सहै

(हिन्दी — मैं लक्ष्य की सिद्धि के लिए कष्ट सहूँ।)

नियम: कर्ता ‘अहम्’ है — उत्तमपुरुष, एकवचन। लोट्-लकार आत्मनेपद में उत्तमपुरुष-एकवचन का प्रत्यय ‘’ है (वन्दै, मोदै, लभै), इसलिए √सह् का रूप बनता है ‘सहै’। ध्यान रखिए — लट् में यह रूप ‘सहे’ होता, लोट् में ‘सहै’; ए और ऐ का यही एक स्वर-भेद दोनों लकारों को अलग करता है
पुस्तक की छपाई पर एक टिप्पणी: पुस्तक में ‘लक्ष्यसिद्ध्ये’ छपा है। ‘सिद्धि’ स्त्रीलिङ्ग इकारान्त शब्द है और उसकी चतुर्थी एकवचन ‘सिद्ध्यै’ होती है (जैसे मत्यै, बुद्ध्यै); इसलिए शुद्ध रूप ‘लक्ष्यसिद्ध्यै’ है — ‘लक्ष्य की सिद्धि के लिए’ (सम्प्रदाने/तादर्थ्ये चतुर्थी)। ऊपर उत्तर में शुद्ध रूप ही रखा गया है।
प्र6.
लट्-लकारः — साधवः सर्वदा रमन्ते। → लोट्-लकारः — भवन्तः ……………
उत्तर

उत्तरम् — भवन्तः सर्वदा रमन्ताम्

(हिन्दी — आप सब सदा प्रसन्न रहें / आनन्द लें।)

नियम: ‘भवन्तः’ प्रथमा बहुवचन है और ‘भवत्’ शब्द प्रथमपुरुष का ही होता है। अतः क्रिया लोट्-लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, बहुवचन चाहिए; उसका प्रत्यय ‘अन्ताम्’ है — √रम् का अङ्ग ‘रम’, इसलिए ‘रमन्ताम्’ (जैसे वन्दन्ताम्, मोदन्ताम्)।
तुलना कीजिए: लट् में ‘रमन्ते’, लोट् में ‘रमन्ताम्’ — प्रत्यय ‘अन्ते’ से ‘अन्ताम्’ हो गया। स्वाध्याय खण्ड की वाक्य-तालिका में यही धातु मिलती है — ‘बालकः उद्याने रमते / बालकाः उद्याने रमन्ते’ (पृ. १०८)।
प्र7.
लट्-लकारः — भवान् योगेन आरोग्यं लभते। → लोट्-लकारः — अहं ……………
उत्तर

उत्तरम् — अहं योगेन आरोग्यं लभै

(हिन्दी — मैं योग से आरोग्य पाऊँ / प्राप्त करूँ।)

नियम: कर्ता ‘अहम्’ = उत्तमपुरुष एकवचन; लोट् आत्मनेपद का वह प्रत्यय ‘’ है — √लभ् + ऐ = ‘लभै’। ‘योगेन’ में करणे तृतीया है (योग के द्वारा), और ‘आरोग्यम्’ कर्म होने से द्वितीया में है।
पाठ से जोड़िए: स्वाध्याय की वाक्य-तालिका में यही वाक्य आया है — ‘योगासनेन मानवः आरोग्यं लभते / योगासनेन मानवाः आरोग्यं लभन्ते’ (पृ. १०९)। और वरुण का उपदेश भी यही था — ‘प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्।’
प्र8.
लट्-लकारः — रमा सदा सत्कर्मणि यतते। → लोट्-लकारः — लता ……………
उत्तर

उत्तरम् — लता सदा सत्कर्मणि यतताम्

(हिन्दी — लता सदा सत्कर्म में प्रयत्न करे।)

नियम: ‘लता’ स्त्रीलिङ्ग प्रथमा एकवचन है, पर क्रिया का रूप लिङ्ग से नहीं बदलता — वह केवल पुरुष तथा वचन से बदलता है। इसलिए प्रथमपुरुष एकवचन का लोट्-रूप ‘यतताम्’ ही आएगा, ठीक वैसे ही जैसे ‘दिनेशः भाषताम्’ में। यह बात विद्यार्थी अक्सर भूल जाते हैं, इसलिए इसे यहीं पकड़ लीजिए।
व्याकरण: ‘सत्कर्मणि’ — कर्मन् शब्द की सप्तमी एकवचन (अधिकरणे सप्तमी)। ‘यतते’ धातु के साथ ‘में लगना, के लिए प्रयत्न करना’ अर्थ आता है। वरुण का उपदेश भी यही था — ‘मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्।’
प्र9.
लट्-लकारः — भक्तः ईश्वरं वन्दते। → लोट्-लकारः — त्वं ……………
उत्तर

उत्तरम् — त्वम् ईश्वरं वन्दस्व

(हिन्दी — तुम ईश्वर की वन्दना करो।)

नियम: कर्ता ‘त्वम्’ = मध्यमपुरुष एकवचन; लोट् आत्मनेपद का वह प्रत्यय ‘स्व’ है — इसलिए ‘वन्दस्व’। यह रूप पुस्तक की अपनी आदर्श-तालिका (प्रश्न ७) में ज्यों का त्यों छपा है, इसलिए उत्तर वहीं से मिलाकर देख लीजिए।
सन्धि तथा वाक्य: लिखते समय ‘त्वम् + ईश्वरम्’ में सन्धि करने पर ‘त्वमीश्वरं वन्दस्व’ भी लिखा जा सकता है। ‘ईश्वरम्’ कर्म है, इसलिए द्वितीया — «कर्मणि द्वितीया»। स्वाध्याय की तालिका में इसी धातु का पूरा वाक्य-रूप दिया है — ‘भक्तः देवं वन्दते · भक्तौ देवं वन्देते · भक्ताः देवं वन्दन्ते’ (पृ. १०८)।
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