शारदा अध्याय 8 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘अत्र इदम् अवधेयम्’ इति खण्डे पञ्चकोषाणां विषये किम् उक्तम् ? पञ्चकोषाः के के ? तेषां परस्परं सम्बन्धः कीदृशः ?
उत्तर

उत्तरम् — मानवः क्रमशः शरीरेण, प्राणेन, मनसा, बुद्ध्या, अध्यात्मशक्त्या च पूर्णविकासं लभते। अतः समग्रजीवनविकासाय शास्त्रेषु पञ्च कोषाः वर्णिताः — (१) अन्नमयकोषः, (२) प्राणमयकोषः, (३) मनोमयकोषः, (४) विज्ञानमयकोषः, (५) आनन्दमयकोषः। एतेषां परस्परं सम्बन्धः अस्ति — अन्नमयकोषस्य विकासं विना प्राणमयकोषस्य विकासः नैव भवितुं शक्नोति; अन्नमयकोषस्य प्राणमयकोषस्य च विकासं विना मनोमयकोषस्य विकासो न भवति। अतः आदौ अन्नमयकोषस्य विकासाय यत्नः कर्तव्यः, ततः क्रमेण प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमयकोषाणां विकासः कर्तव्यः। अनया क्रमिक-विकासपद्धत्या एव मानवः पूर्णतां प्राप्नोति।

(हिन्दी — मनुष्य क्रमशः शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और अध्यात्म-शक्ति से पूर्ण विकास पाता है। इसलिए समग्र जीवन-विकास के लिए शास्त्रों में पाँच कोष बताए गए हैं — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। इनका आपस में सम्बन्ध है : अन्नमयकोष के विकास के बिना प्राणमयकोष का विकास हो ही नहीं सकता; अन्नमय और प्राणमय के विकास के बिना मनोमयकोष का विकास नहीं होता। इसलिए पहले अन्नमयकोष के विकास का यत्न करना चाहिए, फिर क्रम से बाकी कोषों का। इसी क्रमिक-विकास-पद्धति से मनुष्य पूर्णता पाता है।)

क्रमःकोषःकिससे बनता हैसंवाद का सूत्रविकास का उपाय (वरुण के अनुसार)
अन्नमयकोषःअन्न से बना स्थूल शरीरअन्नं वै ब्रह्मसात्त्विक तथा हितकारी आहार; अन्न की निन्दा न करना; अन्न खूब उपजाना
प्राणमयकोषःप्राणवायु तथा क्रियाशक्तिप्राणो वै ब्रह्मप्रतिदिन प्राणायाम तथा आसन; समय पर सोना-जागना
मनोमयकोषःमन — संकल्प, भाव, विचारमनो वै ब्रह्मसत्कर्म से मन को साधना; शोकरहित, उत्साहयुक्त, शान्त मन; आहारशुद्धि
विज्ञानमयकोषःबुद्धितत्त्व — बोध, तर्क, विवेक, निर्णय, स्मृतिविज्ञानं वै ब्रह्मप्रतिदिन ध्यान तथा योगासन; स्वाध्याय
आनन्दमयकोषःआत्मिक आनन्दआनन्दो वै ब्रह्मध्यान-योगासन; प्राणियों पर दया; परोपकार; राग-द्वेष-ईर्ष्या-क्रोध-लोभ-मोह का त्याग
क्रम क्यों नहीं तोड़ा जा सकता: यह खण्ड एक ही बात पर ज़ोर देता है — ‘एवं क्रमेण क्रमिकविकासाय तावद् आदौ अन्नमयकोषस्य विकासाय यत्नः कर्तव्यः’। सोचिए क्यों : भूखे पेट प्राणायाम नहीं सधता, थके-अस्वस्थ प्राण से मन एकाग्र नहीं होता, अशान्त मन से बुद्धि निर्णय नहीं ले पाती, और बुद्धि की उलझन में आनन्द टिकता नहीं। इसीलिए भृगु को भी उत्तर इसी क्रम में मिले — पहले अन्न, अन्त में आनन्द। पाठ का नाम ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ इसी सीढ़ी का नाम है।
ध्यान दें: ‘कोष’ का अर्थ है खोल / आवरण — जैसे तलवार का म्यान। पाँचों कोष एक-दूसरे के भीतर हैं, स्थूल से सूक्ष्म की ओर; भीतर आत्मा है। इसीलिए वरुण ने अन्त में कहा — ‘ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति।’ ‘भवितुम्’ = √भू + तुमुन्; ‘नैव’ = न + एव (वृद्धि सन्धि)।
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