उत्तरम् — मानवः क्रमशः शरीरेण, प्राणेन, मनसा, बुद्ध्या, अध्यात्मशक्त्या च पूर्णविकासं लभते। अतः समग्रजीवनविकासाय शास्त्रेषु पञ्च कोषाः वर्णिताः — (१) अन्नमयकोषः, (२) प्राणमयकोषः, (३) मनोमयकोषः, (४) विज्ञानमयकोषः, (५) आनन्दमयकोषः। एतेषां परस्परं सम्बन्धः अस्ति — अन्नमयकोषस्य विकासं विना प्राणमयकोषस्य विकासः नैव भवितुं शक्नोति; अन्नमयकोषस्य प्राणमयकोषस्य च विकासं विना मनोमयकोषस्य विकासो न भवति। अतः आदौ अन्नमयकोषस्य विकासाय यत्नः कर्तव्यः, ततः क्रमेण प्राणमय-मनोमय-विज्ञानमय-आनन्दमयकोषाणां विकासः कर्तव्यः। अनया क्रमिक-विकासपद्धत्या एव मानवः पूर्णतां प्राप्नोति।
(हिन्दी — मनुष्य क्रमशः शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और अध्यात्म-शक्ति से पूर्ण विकास पाता है। इसलिए समग्र जीवन-विकास के लिए शास्त्रों में पाँच कोष बताए गए हैं — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। इनका आपस में सम्बन्ध है : अन्नमयकोष के विकास के बिना प्राणमयकोष का विकास हो ही नहीं सकता; अन्नमय और प्राणमय के विकास के बिना मनोमयकोष का विकास नहीं होता। इसलिए पहले अन्नमयकोष के विकास का यत्न करना चाहिए, फिर क्रम से बाकी कोषों का। इसी क्रमिक-विकास-पद्धति से मनुष्य पूर्णता पाता है।)
| क्रमः | कोषः | किससे बनता है | संवाद का सूत्र | विकास का उपाय (वरुण के अनुसार) |
|---|---|---|---|---|
| १ | अन्नमयकोषः | अन्न से बना स्थूल शरीर | अन्नं वै ब्रह्म | सात्त्विक तथा हितकारी आहार; अन्न की निन्दा न करना; अन्न खूब उपजाना |
| २ | प्राणमयकोषः | प्राणवायु तथा क्रियाशक्ति | प्राणो वै ब्रह्म | प्रतिदिन प्राणायाम तथा आसन; समय पर सोना-जागना |
| ३ | मनोमयकोषः | मन — संकल्प, भाव, विचार | मनो वै ब्रह्म | सत्कर्म से मन को साधना; शोकरहित, उत्साहयुक्त, शान्त मन; आहारशुद्धि |
| ४ | विज्ञानमयकोषः | बुद्धितत्त्व — बोध, तर्क, विवेक, निर्णय, स्मृति | विज्ञानं वै ब्रह्म | प्रतिदिन ध्यान तथा योगासन; स्वाध्याय |
| ५ | आनन्दमयकोषः | आत्मिक आनन्द | आनन्दो वै ब्रह्म | ध्यान-योगासन; प्राणियों पर दया; परोपकार; राग-द्वेष-ईर्ष्या-क्रोध-लोभ-मोह का त्याग |