उत्तरम् — पुस्तके त्रयः कोष्ठकाः दत्ताः; तेषु प्रथमौ द्वौ धातुरूपाणां, तृतीयः तेषामेव वाक्यप्रयोगस्य।
१. वन्द्-धातुः (लट्-लकारः, आत्मनेपदम्)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| मध्यमपुरुषः | वन्दसे | वन्देथे | वन्दध्वे |
| उत्तमपुरुषः | वन्दे | वन्दावहे | वन्दामहे |
२. कृ-धातुः (लट्-लकारः, आत्मनेपदम्)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | कुरुते | कुर्वाते | कुर्वते |
| मध्यमपुरुषः | कुरुषे | कुर्वाथे | कुरुध्वे |
| उत्तमपुरुषः | कुर्वे | कुर्वहे | कुर्महे |
३. वाक्यरूपेण प्रयोगः (वन्द्-धातुः)
| पुरुषः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| प्रथमपुरुषः | भक्तः देवं वन्दते | भक्तौ देवं वन्देते | भक्ताः देवं वन्दन्ते |
| मध्यमपुरुषः | त्वं देवं वन्दसे | युवां देवं वन्देथे | यूयं देवं वन्दध्वे |
| उत्तमपुरुषः | अहं देवं वन्दे | आवां देवं वन्दावहे | वयं देवं वन्दामहे |