यह छात्रसंगोष्ठी (seminar) का कार्य है। विषय है — ‘इस पाठ की हमारे जीवन में क्या प्रासङ्गिकता है?’ उत्तर एक ‘सही वाक्य’ नहीं है; पर अच्छी संगोष्ठी की एक विधि अवश्य है।
संगोष्ठी कैसे कीजिए (विधि) —
- कक्षा को पाँच समूहों में बाँटिए — एक-एक समूह एक कोष लेगा (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय)।
- हर समूह तीन बातें तैयार करे : (क) पाठ का सम्बन्धित वाक्य, (ख) आज के जीवन का एक उदाहरण, (ग) एक ऐसा काम जो इसी सप्ताह किया जा सके।
- हर समूह को तीन मिनट मिलें। एक विद्यार्थी अध्यक्ष बने और समय देखे; एक ‘लेखकः’ बने जो निष्कर्ष लिखे।
- अन्त में सब मिलकर एक ‘पञ्चकोष-प्रतिज्ञा’ बनाएँ और उसे कक्षा की दीवार पर लगाएँ।
अच्छे उत्तर में ये बातें अवश्य आएँ — हर बात पाठ के किसी वाक्य से जुड़ी हो; उदाहरण अपने जीवन से हो, किताबी न हो; और सुझाव करने योग्य हो — ‘मैं सात्त्विक भोजन करूँगा’ जैसा नहीं, बल्कि ‘मैं सप्ताह में तीन दिन जंक-फ़ूड नहीं खाऊँगा’ जैसा ठोस।
| कोषः | पाठ का सूत्र | आज की प्रासङ्गिकता | इसी सप्ताह करने योग्य काम |
|---|---|---|---|
| अन्नमयः | अन्नं न निन्द्यात्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत। | भोजन की बरबादी आज सबसे बड़ी समस्या है; साथ ही जंक-फ़ूड से किशोरों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है। | थाली में उतना ही लेना जितना खाया जाए; एक सप्ताह ‘शून्य-अपव्यय’ अभियान |
| प्राणमयः | प्राणविकासाय प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः। | देर रात तक जागना और स्क्रीन देखना — प्राणशक्ति का सबसे बड़ा शत्रु। | प्रतिदिन दस मिनट प्राणायाम; समय पर सोना-जागना |
| मनोमयः | मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्। शोकादिरहितम्… शान्तं च करणीयम्। | परीक्षा का तनाव, तुलना, चिड़चिड़ापन — सब मन के व्यापार हैं। | प्रतिदिन पाँच मिनट मौन; एक दिन किसी की सहायता |
| विज्ञानमयः | बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति। | सूचना बहुत है, विवेक कम — क्या सच है और क्या अफ़वाह, यह बुद्धि ही तय करती है। | कोई भी सन्देश आगे भेजने से पहले उसकी जाँच; प्रतिदिन स्वाध्याय |
| आनन्दमयः | आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्। प्राणिषु दया कर्तव्या। | अङ्क तो बढ़ रहे हैं, प्रसन्नता नहीं — क्योंकि आनन्द बाहर खोजा जा रहा है। | सप्ताह में एक ‘सेवा-दिवस’; पक्षियों के लिए जल-पात्र |
आदर्श उत्तरम् (नमूना वक्तव्य — संगोष्ठी में बोलने योग्य) —
अद्य अहम् ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ इति पाठस्य अस्माकं जीवने प्रासङ्गिकताविषये किञ्चित् वक्तुम् इच्छामि।
अयं पाठः पञ्चकोषाणां शिक्षां ददाति — अन्नमयः, प्राणमयः, मनोमयः, विज्ञानमयः, आनन्दमयः इति।
अद्यत्वे वयं प्रायः एकम् एव कोषं पश्यामः — बुद्धिम्। अङ्काः वर्धन्ते, किन्तु आरोग्यं न वर्धते, प्रसन्नता च न वर्धते।
पाठः कथयति — ‘अन्नमयकोषस्य विकासं विना प्राणमयकोषस्य विकासः नैव भवितुं शक्नोति’।
अतः प्रथमं शरीरम् — सात्त्विकम् आहारं सेवामहै, अन्नं च न निन्दामहै।
ततः प्राणः — प्रतिदिनं प्राणायामम् आसनानि च कुर्महे, यथासमयं शयनं जागरणं च कुर्महे।
ततः मनः — यतः ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’, अतः मनः सत्कर्मणा साधयामः।
ततः बुद्धिः — यतः ‘बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति’, अतः ध्यानं स्वाध्यायं च कुर्महे।
अन्ते आनन्दः — यतः ‘आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्’, अतः प्राणिषु दयां परोपकारं च आचरामः।
एतत् एव पाठस्य सन्देशः — विकासः क्रमेण भवति, न तु आकस्मिकः।
अतः वयं प्रतिज्ञां कुर्मः — वयं पञ्चानाम् अपि कोषाणां विकासाय प्रतिदिनं यतिष्यामहे।
एतावत् एव। धन्यवादः।
(हिन्दी अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रिय सहपाठियो, सबको नमस्कार। आज मैं ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ पाठ की हमारे जीवन में प्रासङ्गिकता पर कुछ कहना चाहता/चाहती हूँ। यह पाठ पाँच कोषों की शिक्षा देता है — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। आजकल हम प्रायः एक ही कोष देखते हैं — बुद्धि। अंक बढ़ते हैं, पर स्वास्थ्य नहीं बढ़ता और प्रसन्नता भी नहीं बढ़ती। पाठ कहता है — ‘अन्नमयकोष के विकास के बिना प्राणमयकोष का विकास हो ही नहीं सकता।’ इसलिए पहले शरीर — सात्त्विक भोजन लें और अन्न की निन्दा न करें। फिर प्राण — प्रतिदिन प्राणायाम तथा आसन करें, समय पर सोएँ-जागें। फिर मन — क्योंकि ‘मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है’, इसलिए मन को सत्कर्म से साधें। फिर बुद्धि — क्योंकि ‘बुद्धि ही सारथि बनकर हमें कर्म में लगाती है’, इसलिए ध्यान और स्वाध्याय करें। अन्त में आनन्द — क्योंकि ‘आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के समान है’, इसलिए प्राणियों पर दया और परोपकार करें। यही पाठ का सन्देश है — विकास क्रम से होता है, अचानक नहीं। इसलिए हम प्रतिज्ञा करते हैं कि पाँचों कोषों के विकास के लिए प्रतिदिन प्रयत्न करेंगे। बस इतना ही। धन्यवाद।