शारदा अध्याय 8 यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
एकां छात्रसंगोष्ठीम् आयोज्य अस्य पाठस्य अस्माकं जीवने कीदृशी प्रासङ्गिकता अस्तीति स्वविचारान् उपस्थापयत।
उत्तर

यह छात्रसंगोष्ठी (seminar) का कार्य है। विषय है — ‘इस पाठ की हमारे जीवन में क्या प्रासङ्गिकता है?’ उत्तर एक ‘सही वाक्य’ नहीं है; पर अच्छी संगोष्ठी की एक विधि अवश्य है।

संगोष्ठी कैसे कीजिए (विधि) —

  1. कक्षा को पाँच समूहों में बाँटिए — एक-एक समूह एक कोष लेगा (अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय)।
  2. हर समूह तीन बातें तैयार करे : (क) पाठ का सम्बन्धित वाक्य, (ख) आज के जीवन का एक उदाहरण, (ग) एक ऐसा काम जो इसी सप्ताह किया जा सके।
  3. हर समूह को तीन मिनट मिलें। एक विद्यार्थी अध्यक्ष बने और समय देखे; एक ‘लेखकः’ बने जो निष्कर्ष लिखे।
  4. अन्त में सब मिलकर एक ‘पञ्चकोष-प्रतिज्ञा’ बनाएँ और उसे कक्षा की दीवार पर लगाएँ।

अच्छे उत्तर में ये बातें अवश्य आएँ — हर बात पाठ के किसी वाक्य से जुड़ी हो; उदाहरण अपने जीवन से हो, किताबी न हो; और सुझाव करने योग्य हो — ‘मैं सात्त्विक भोजन करूँगा’ जैसा नहीं, बल्कि ‘मैं सप्ताह में तीन दिन जंक-फ़ूड नहीं खाऊँगा’ जैसा ठोस।

कोषःपाठ का सूत्रआज की प्रासङ्गिकताइसी सप्ताह करने योग्य काम
अन्नमयःअन्नं न निन्द्यात्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत।भोजन की बरबादी आज सबसे बड़ी समस्या है; साथ ही जंक-फ़ूड से किशोरों का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है।थाली में उतना ही लेना जितना खाया जाए; एक सप्ताह ‘शून्य-अपव्यय’ अभियान
प्राणमयःप्राणविकासाय प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः।देर रात तक जागना और स्क्रीन देखना — प्राणशक्ति का सबसे बड़ा शत्रु।प्रतिदिन दस मिनट प्राणायाम; समय पर सोना-जागना
मनोमयःमनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्। शोकादिरहितम्… शान्तं च करणीयम्।परीक्षा का तनाव, तुलना, चिड़चिड़ापन — सब मन के व्यापार हैं।प्रतिदिन पाँच मिनट मौन; एक दिन किसी की सहायता
विज्ञानमयःबुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति।सूचना बहुत है, विवेक कम — क्या सच है और क्या अफ़वाह, यह बुद्धि ही तय करती है।कोई भी सन्देश आगे भेजने से पहले उसकी जाँच; प्रतिदिन स्वाध्याय
आनन्दमयःआनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्। प्राणिषु दया कर्तव्या।अङ्क तो बढ़ रहे हैं, प्रसन्नता नहीं — क्योंकि आनन्द बाहर खोजा जा रहा है।सप्ताह में एक ‘सेवा-दिवस’; पक्षियों के लिए जल-पात्र

आदर्श उत्तरम् (नमूना वक्तव्य — संगोष्ठी में बोलने योग्य) —

माननीयाः अध्यापकाः, प्रियाः सहपाठिनः, सर्वेभ्यः नमस्कारः।

अद्य अहम् ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ इति पाठस्य अस्माकं जीवने प्रासङ्गिकताविषये किञ्चित् वक्तुम् इच्छामि।

अयं पाठः पञ्चकोषाणां शिक्षां ददाति — अन्नमयः, प्राणमयः, मनोमयः, विज्ञानमयः, आनन्दमयः इति।
अद्यत्वे वयं प्रायः एकम् एव कोषं पश्यामः — बुद्धिम्। अङ्काः वर्धन्ते, किन्तु आरोग्यं न वर्धते, प्रसन्नता च न वर्धते।
पाठः कथयति — ‘अन्नमयकोषस्य विकासं विना प्राणमयकोषस्य विकासः नैव भवितुं शक्नोति’।
अतः प्रथमं शरीरम् — सात्त्विकम् आहारं सेवामहै, अन्नं च न निन्दामहै।
ततः प्राणः — प्रतिदिनं प्राणायामम् आसनानि च कुर्महे, यथासमयं शयनं जागरणं च कुर्महे।
ततः मनः — यतः ‘मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’, अतः मनः सत्कर्मणा साधयामः।
ततः बुद्धिः — यतः ‘बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति’, अतः ध्यानं स्वाध्यायं च कुर्महे।
अन्ते आनन्दः — यतः ‘आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्’, अतः प्राणिषु दयां परोपकारं च आचरामः।

एतत् एव पाठस्य सन्देशः — विकासः क्रमेण भवति, न तु आकस्मिकः।
अतः वयं प्रतिज्ञां कुर्मः — वयं पञ्चानाम् अपि कोषाणां विकासाय प्रतिदिनं यतिष्यामहे।

एतावत् एव। धन्यवादः।

(हिन्दी अनुवाद —) आदरणीय अध्यापकगण, प्रिय सहपाठियो, सबको नमस्कार। आज मैं ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ पाठ की हमारे जीवन में प्रासङ्गिकता पर कुछ कहना चाहता/चाहती हूँ। यह पाठ पाँच कोषों की शिक्षा देता है — अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय और आनन्दमय। आजकल हम प्रायः एक ही कोष देखते हैं — बुद्धि। अंक बढ़ते हैं, पर स्वास्थ्य नहीं बढ़ता और प्रसन्नता भी नहीं बढ़ती। पाठ कहता है — ‘अन्नमयकोष के विकास के बिना प्राणमयकोष का विकास हो ही नहीं सकता।’ इसलिए पहले शरीर — सात्त्विक भोजन लें और अन्न की निन्दा न करें। फिर प्राण — प्रतिदिन प्राणायाम तथा आसन करें, समय पर सोएँ-जागें। फिर मन — क्योंकि ‘मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है’, इसलिए मन को सत्कर्म से साधें। फिर बुद्धि — क्योंकि ‘बुद्धि ही सारथि बनकर हमें कर्म में लगाती है’, इसलिए ध्यान और स्वाध्याय करें। अन्त में आनन्द — क्योंकि ‘आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के समान है’, इसलिए प्राणियों पर दया और परोपकार करें। यही पाठ का सन्देश है — विकास क्रम से होता है, अचानक नहीं। इसलिए हम प्रतिज्ञा करते हैं कि पाँचों कोषों के विकास के लिए प्रतिदिन प्रयत्न करेंगे। बस इतना ही। धन्यवाद।

यह वक्तव्य अच्छा क्यों है: इसमें पाँचों कोष पाठ के अपने वाक्यों से उठाए गए हैं, हर कोष के साथ एक करने योग्य काम जुड़ा है, और अन्त में एक प्रतिज्ञा है — अर्थात् बात विचार से चलकर कर्म पर समाप्त होती है। साथ ही भाषा सरल है : वाक्य छोटे हैं, आत्मनेपदी क्रियाओं (सेवामहै, कुर्महे, यतिष्यामहे) का प्रयोग है जो इसी पाठ का व्याकरण है — इसलिए बोलते समय अटकना नहीं पड़ेगा।
प्र2.
पाठे आगतानाम् उपनिषद्वचनानाम् आशयं दशसु वाक्येषु प्रकटयत।
उत्तर

यहाँ पाठ में आए उपनिषद्-वचनों तथा श्लोकों का सार ठीक दस संस्कृत वाक्यों में देना है। नीचे नमूना उत्तर है — प्रत्येक वाक्य एक वचन का आशय है और वाक्य छोटे रखे गए हैं, ताकि शुद्ध लिखे जा सकें।

आदर्श उत्तरम् (दश वाक्यानि) —

१. अन्नाद् एव इमानि सर्वाणि भूतानि जायन्ते, अन्नेन च जीवन्ति।
२. अन्नं भूतानां ज्येष्ठम् अस्ति, अतः तत् ‘सर्वौषधम्’ इति उच्यते।
३. अन्नं कदापि न निन्दनीयम्, प्रयत्नेन च बहु उत्पादनीयम्।
४. आहारशुद्ध्या सत्त्वशुद्धिः भवति, सत्त्वशुद्ध्या च ध्रुवा स्मृतिः जायते।
५. स्मृतेः लाभे सर्वेषां सन्देहग्रन्थीनां विप्रमोक्षः भवति।
६. प्राणः एव भूतानाम् आयुः, प्राणे च शरीरं प्रतिष्ठितम्।
७. यावद् वायुः देहे तिष्ठति तावद् एव जीवनम्; तस्य निर्गमनम् एव मरणम्।
८. मनः एव मनुष्याणां बन्धस्य मोक्षस्य च कारणम् अस्ति।
९. कामः, सङ्कल्पः, विचिकित्सा, श्रद्धा, धृतिः, ह्रीः, धीः, भीः — एतत् सर्वं मन एव।
१०. यत् मनसा ध्यायति तद् एव वाचा वदति, तद् एव कर्मणा करोति, तद् एव च प्राप्नोति।

(हिन्दी अनुवाद —) १. ये सारे प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं और अन्न से ही जीते हैं। २. अन्न प्राणियों में ज्येष्ठ है, इसीलिए उसे ‘सर्वौषध’ कहा जाता है। ३. अन्न की कभी निन्दा नहीं करनी चाहिए और प्रयत्नपूर्वक उसे खूब उपजाना चाहिए। ४. आहार की शुद्धि से अन्तःकरण शुद्ध होता है और अन्तःकरण की शुद्धि से स्मृति अटल होती है। ५. स्मृति मिल जाने पर सब सन्देह-गाँठें खुल जाती हैं। ६. प्राण ही प्राणियों की आयु है और शरीर प्राण में टिका है। ७. जब तक वायु शरीर में रहती है तभी तक जीवन है; उसका निकल जाना ही मृत्यु है। ८. मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। ९. काम, संकल्प, सन्देह, श्रद्धा, धैर्य, लज्जा, बुद्धि, भय — यह सब मन ही है। १०. मनुष्य मन से जो सोचता है वही वाणी से कहता है, वही कर्म से करता है और वही उसे प्राप्त होता है।

लिखते समय ध्यान रखिए: (१) दस वाक्य माँगे गए हैं, इसलिए गिनकर लिखिए — न नौ, न ग्यारह। (२) हर वाक्य में एक ही विचार रखिए। (३) कर्ता-क्रिया का वचन मिलाइए (भूतानि जायन्ते — दोनों बहुवचन; प्राणः तिष्ठति — दोनों एकवचन)। (४) जहाँ सन्देह हो, वाक्य को छोटा कर दीजिए — अशुद्ध लम्बे वाक्य से शुद्ध छोटा वाक्य अच्छा है
प्र3.
पाठे आगतानि क्रियापदानि चित्वा विंशतिवाक्यानि रचयत।
उत्तर

यहाँ पाठ की क्रियाएँ चुनकर बीस अपने वाक्य बनाने हैं। सबसे अच्छी विधि यह है कि आप आत्मनेपदी क्रियाओं को चुनें, क्योंकि पूरा पाठ और पूरा अभ्यास उन्हीं पर टिका है — इससे प्रश्न ६, ७, ८ का अभ्यास भी साथ-साथ हो जाएगा।

आदर्श उत्तरम् (विंशतिः वाक्यानि) —

क्रमःक्रियापदम् (पाठात्)वाक्यम्हिन्दी अर्थ
वर्ततेमयि संस्कृतविषये जिज्ञासा वर्तते।मेरे मन में संस्कृत के विषय में जिज्ञासा है।
जायन्तेअन्नाद् एव सर्वे प्राणिनः जायन्ते।अन्न से ही सब प्राणी उत्पन्न होते हैं।
जीवन्तिजन्तवः आहारेण जीवन्ति।जीव आहार से जीते हैं।
वर्धतेसात्त्विकेन आहारेण शरीरं वर्धते।सात्त्विक आहार से शरीर बढ़ता है।
सेवतेशिष्यः श्रद्धया गुरुं सेवते।शिष्य श्रद्धा से गुरु की सेवा करता है।
लभतेयोगेन मानवः आरोग्यं लभते।योग से मनुष्य आरोग्य पाता है।
भाषतेसत्पुरुषः सर्वदा सत्यं भाषते।सज्जन सदा सत्य बोलता है।
मोदतेबालकः उद्याने मोदते।बालक बगीचे में प्रसन्न होता है।
यततेछात्रः लक्ष्यसिद्ध्यै यतते।छात्र लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है।
१०सहतेवीरः कष्टं सहते।वीर कष्ट सहता है।
११शोभतेविद्यया मनुष्यः शोभते।विद्या से मनुष्य शोभा पाता है।
१२वन्दतेभक्तः प्रातः ईश्वरं वन्दते।भक्त प्रातःकाल ईश्वर की वन्दना करता है।
१३कुरुतेछात्रः प्रतिदिनं गृहकार्यं कुरुते।छात्र प्रतिदिन गृहकार्य करता है।
१४विद्यतेसमग्रज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते।सारा ज्ञान बुद्धि में ही रहता है।
१५सञ्चाल्यन्तेसर्वाणि इन्द्रियाणि मनसा सञ्चाल्यन्ते।सारी इन्द्रियाँ मन से चलाई जाती हैं।
१६उच्यतेअन्नं सर्वौषधम् इति उच्यते।अन्न को ‘सर्वौषध’ कहा जाता है।
१७कर्तव्यम्अस्माभिः प्रतिदिनं योगासनं कर्तव्यम्।हमें प्रतिदिन योगासन करना चाहिए।
१८रक्षणीयःप्राणः सर्वथा रक्षणीयः।प्राण की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए।
१९सेवताम्भवान् सर्वदा हितकारकम् आहारं सेवताम्।आप सदा हितकारी आहार लीजिए।
२०कुरुताम्भवन्तः ब्रह्मज्ञानाय तपः कुरुताम्।आप सब ब्रह्मज्ञान के लिए तप कीजिए।
तालिका की बनावट पर ध्यान दीजिए: पहले तेरह वाक्य लट्-लकार कर्तृवाच्य के हैं, फिर दो कर्मवाच्य के (सञ्चाल्यन्ते, उच्यते), फिर दो तव्यत्-अनीयर् के (कर्तव्यम्, रक्षणीयः), और अन्तिम दो लोट्-लकार के (सेवताम्, कुरुताम्)। इस प्रकार बीस वाक्यों में पूरे पाठ का व्याकरण समा जाता है — यही ऐसा उत्तर है जो पूरे अंक दिलाता है, केवल बीस वाक्य गिन देने वाला नहीं।
अपने वाक्य बनाते समय: कर्ता और क्रिया का वचन अवश्य मिलाइए, कर्म को द्वितीया में रखिए, और करण को तृतीया में। हर वाक्य के आगे कोष्ठक में उसका हिन्दी अर्थ लिख देना अच्छी आदत है — इससे भूल स्वयं पकड़ में आ जाती है।
प्र4.
अन्नरक्षणाय भवता के उपायाः क्रियन्ते इति वर्णयत।
उत्तर

यह व्यक्तिगत उत्तर वाला प्रश्न है — ‘आप अन्न की रक्षा के लिए कौन-से उपाय करते हैं?’ इसका कोई एक ‘पुस्तक-उत्तर’ नहीं है; अपने घर, विद्यालय और गाँव/मुहल्ले से जुड़े सच्चे उपाय लिखिए। पर उत्तर पाठ से बँधा होना चाहिए — वरुण का आदेश ही इसका आधार है : ‘कदापि अन्नं न निन्द्यात्। कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत।

अच्छे उत्तर में तीन स्तर आने चाहिए — (१) व्यक्तिगत (मैं क्या करता हूँ), (२) पारिवारिक/विद्यालयीय (घर तथा विद्यालय में क्या होता है), (३) सामाजिक (अन्न उपजाने तथा बाँटने का काम)।

क्रमःउपायः (संस्कृतम्)क्या करना है (हिन्दी)पाठ से आधार
यावत् आवश्यकं तावद् एव स्थाल्यां गृह्णामि।थाली में उतना ही लेता हूँ जितना खा सकूँ — जूठन बिलकुल नहीं छोड़ता।कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्।
अन्नस्य निन्दां कदापि न करोमि।‘यह सब्ज़ी अच्छी नहीं’ — ऐसा कहकर खाना छोड़ता नहीं; जो बना है उसका आदर करता हूँ।कदापि अन्नं न निन्द्यात्।
अवशिष्टम् अन्नं न त्यजामि, अपि तु क्षुधितेभ्यः ददामि।बचा हुआ भोजन फेंकता नहीं; ठीक से ढककर रखता हूँ या किसी भूखे को दे देता हूँ।अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्।
गृहे लघु-वाटिकां रचयामि, शाकानि च उत्पादयामि।घर की छत या आँगन में छोटी वाटिका बनाकर धनिया, पालक, टमाटर उगाता हूँ।प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत।
धान्यं शुष्के स्वच्छे च पात्रे रक्षामि।अनाज को सूखे, साफ़ और बन्द पात्र में रखता हूँ ताकि नमी तथा कीड़ों से न बिगड़े।अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्।
उत्सवेषु आवश्यकाद् अधिकम् अन्नं न पाचयामः।विवाह-उत्सव में अन्दाज़ से अधिक भोजन नहीं बनवाते; बचे तो अन्न-बैंक को देते हैं।अन्नं न निन्द्यात् — अपव्ययः अपि निन्दा एव।
विद्यालये ‘अन्न-अपव्यय-निवारण’ इति भित्तिपत्रं रचयामः।विद्यालय में भोजनावकाश के समय ‘जूठन शून्य’ अभियान तथा भित्ति-पत्रिका।छात्रसंगोष्ठी (परियोजना १)
सात्त्विकम् आहारं सेवे, दूषितम् अन्नं च त्यजामि।ताज़ा तथा सात्त्विक भोजन लेता हूँ; बासी या दूषित अन्न नहीं खाता।सर्वदा सात्त्विकं हितकारकं च आहारं सेवताम्।

आदर्श उत्तरम् (नमूना अनुच्छेद) —

अहम् अन्नरक्षणाय एतान् उपायान् करोमि —
प्रथमम्, अहं स्थाल्यां यावद् आवश्यकं तावद् एव अन्नं गृह्णामि, अवशिष्टं च न त्यजामि।
द्वितीयम्, अहम् अन्नस्य निन्दां कदापि न करोमि, यतः ‘अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्’।
तृतीयम्, गृहस्य वाटिकायाम् अहं शाकानि उत्पादयामि, यतः ‘प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत’ इति उपनिषदः आदेशः।
चतुर्थम्, धान्यं शुष्के पात्रे रक्षामि येन तत् न दूष्येत।
पञ्चमम्, विद्यालये वयं ‘अन्नापव्ययः महान् दोषः’ इति भित्तिपत्रं रचयामः।
एवं वयं सर्वे अन्नं देवरूपेण पश्येम — एषः एव अस्माकं संकल्पः।

(हिन्दी — मैं अन्न की रक्षा के लिए ये उपाय करता हूँ : पहला, थाली में उतना ही लेता हूँ जितना आवश्यक हो और बचा हुआ फेंकता नहीं। दूसरा, अन्न की निन्दा कभी नहीं करता, क्योंकि ‘अन्न ही प्राणियों में ज्येष्ठ है’। तीसरा, घर की वाटिका में सब्ज़ियाँ उगाता हूँ, क्योंकि उपनिषद् का आदेश है ‘प्रयत्नपूर्वक अन्न को खूब उपजाओ’। चौथा, अनाज को सूखे पात्र में रखता हूँ ताकि वह ख़राब न हो। पाँचवाँ, विद्यालय में हम ‘अन्न का अपव्यय बड़ा दोष है’ — यह भित्ति-पत्र बनाते हैं। इस प्रकार हम सब अन्न को देवता के रूप में देखें — यही हमारा संकल्प है।)

यह उत्तर अच्छा क्यों है: हर उपाय के साथ पाठ का एक वाक्य जुड़ा है, इसलिए उत्तर व्यक्तिगत होते हुए भी पाठ पर टिका है। दूसरे, उपाय क्रम में हैं — पहले अपनी थाली, फिर घर, फिर विद्यालय; छोटे से बड़े की ओर। तीसरे, अन्तिम वाक्य एक संकल्प है — इसी से उत्तर पूरा माना जाता है।
प्र5.
मनसः कार्यं दशसु वाक्येषु निरूपयत।
उत्तर

यहाँ ‘मन क्या-क्या करता है’ — यह ठीक दस संस्कृत वाक्यों में लिखना है। सारी सामग्री पाठ के मनोमयकोष वाले खण्ड (पृ. ९५), बृहदारण्यक-वचन तथा अमृतबिन्दु के दोनों श्लोकों में है।

आदर्श उत्तरम् (दश वाक्यानि) —

१. मनः एव अस्माकं सर्वकर्मणः प्रवर्तकम् अस्ति।
२. समस्तानि इन्द्रियाणि मनसा एव सञ्चाल्यन्ते।
३. मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति।
४. मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते।
५. मनः एव मनुष्याणां बन्धस्य मोक्षस्य च कारणम्।
६. विषयासक्तं मनः बन्धाय भवति, निर्विषयं च मुक्त्यै।
७. मनः द्विविधम् अस्ति — शुद्धम् अशुद्धं च।
८. कामः, सङ्कल्पः, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, धृतिः, अधृतिः, ह्रीः, धीः, भीः — एतत् सर्वं मन एव।
९. यत् मनसा ध्यायति तद् एव वाचा वदति, तद् एव च कर्मणा करोति।
१०. अतः मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्, शान्तम् उत्साहयुक्तं च करणीयम्।

(हिन्दी अनुवाद —) १. मन ही हमारे सब कर्मों का प्रवर्तक है। २. सारी इन्द्रियाँ मन से ही चलाई जाती हैं। ३. मनुष्य मन से ही सब कार्य पूरा करता है। ४. मन से ही संकल्प, भाव और विचार उत्पन्न होते हैं। ५. मन ही मनुष्यों के बन्धन और मोक्ष का कारण है। ६. विषयों में आसक्त मन बन्धन का कारण बनता है और विषयों से रहित मन मुक्ति का। ७. मन दो प्रकार का है — शुद्ध और अशुद्ध। ८. काम, संकल्प, सन्देह, श्रद्धा, अश्रद्धा, धैर्य, अधैर्य, लज्जा, बुद्धि और भय — यह सब मन ही है। ९. मन से जो सोचता है वही वाणी से कहता है और वही कर्म से करता है। १०. इसलिए मन को सदा सत्कर्म से साधना चाहिए तथा शान्त और उत्साहयुक्त बनाना चाहिए।

उत्तर की बनावट देखिए: पहले चार वाक्य बताते हैं कि मन क्या करता है (प्रवर्तन, सञ्चालन, सम्पादन, उत्पादन); बीच के चार बताते हैं कि मन कैसा है (बन्ध-मोक्ष का कारण, दो प्रकार का, दस विषयों वाला); नवाँ बताता है मन का परिणाम (सोच → वाणी → कर्म); और दसवाँ बताता है हमारा कर्तव्यवर्णन से आरम्भ, कर्तव्य पर अन्त — यही अच्छे उत्तर का ढाँचा है।
ध्यान दें: वाक्य दस ही होने चाहिए — गिनकर लिखिए। आठवाँ वाक्य लम्बा है, इसलिए उसे लिखते समय सन्धि खोलकर लिखिए (धृतिः + अधृतिः + ह्रीः + धीः + भीः), जिससे विसर्ग की भूल न हो।
प्र6.
केषाञ्चन त्रयाणाम् आत्मनेपदिधातूनां लट्-लोट्लकारयोः त्रिषु पुरुषेषु रूपाणि स्मरत लिखत च।
उत्तर

यहाँ अपनी पसन्द की तीन आत्मनेपदी धातुएँ लेकर उनके लट् तथा लोट् — दोनों लकारों के नौ-नौ रूप लिखने हैं। नीचे पाठ की ही तीन धातुएँ ली गई हैं — √सेव्, √लभ्, √वन्द् — क्योंकि तीनों पाठ में आई हैं और तीनों सरल हैं।

१. √सेव् (सेवा करना)

पुरुषःलट्-लकारः (वर्तमान)लोट्-लकारः (आज्ञा/प्रार्थना)
एक.द्वि.बहु.एक.द्वि.बहु.
प्रथमपुरुषःसेवतेसेवेतेसेवन्तेसेवताम्सेवेताम्सेवन्ताम्
मध्यमपुरुषःसेवसेसेवेथेसेवध्वेसेवस्वसेवेथाम्सेवध्वम्
उत्तमपुरुषःसेवेसेवावहेसेवामहेसेवैसेवावहैसेवामहै

२. √लभ् (पाना)

पुरुषःलट्-लकारःलोट्-लकारः
एक.द्वि.बहु.एक.द्वि.बहु.
प्रथमपुरुषःलभतेलभेतेलभन्तेलभताम्लभेताम्लभन्ताम्
मध्यमपुरुषःलभसेलभेथेलभध्वेलभस्वलभेथाम्लभध्वम्
उत्तमपुरुषःलभेलभावहेलभामहेलभैलभावहैलभामहै

३. √वन्द् (वन्दना करना)

पुरुषःलट्-लकारःलोट्-लकारः
एक.द्वि.बहु.एक.द्वि.बहु.
प्रथमपुरुषःवन्दतेवन्देतेवन्दन्तेवन्दताम्वन्देताम्वन्दन्ताम्
मध्यमपुरुषःवन्दसेवन्देथेवन्दध्वेवन्दस्ववन्देथाम्वन्दध्वम्
उत्तमपुरुषःवन्देवन्दावहेवन्दामहेवन्दैवन्दावहैवन्दामहै
दोनों लकार साथ रखकर देखिए — अन्तर केवल चार जगह है: ते→ताम्, एते→एताम्, अन्ते→अन्ताम्; से→स्व, एथे→एथाम्, ध्वे→ध्वम्; ए→ऐ, आवहे→आवहै, आमहे→आमहै। अर्थात् लट् के जो रूप ‘ए’ पर समाप्त होते हैं, लोट् में वही ‘ऐ’ पर समाप्त होते हैं; और जो ‘ते/थे/ध्वे’ पर, वे ‘ताम्/थाम्/ध्वम्’ पर। इतना पकड़ लीजिए तो किसी भी आत्मनेपदी धातु के अठारह रूप अपने आप बन जाएँगे।
याद रखने की युक्ति: रूप अकेले मत रटिए, वाक्य में रटिए — ‘शिष्यः गुरुं सेवते’ (लट्), ‘शिष्यः गुरुं सेवताम्’ (लोट्); ‘अहं विद्यां लभे’ (लट्), ‘अहं विद्यां लभै’ (लोट्)। इस तरह पढ़ा हुआ कभी नहीं भूलता, और परियोजना ३ के बीस वाक्य भी साथ-साथ बन जाते हैं।
प्र7.
अस्माकं जीवने प्रत्येकं कोषस्य विकासाय किं किं कर्तुं शक्यते इत्युपरि चर्चां कुरुत।
उत्तर

यह समूह-चर्चा का कार्य है — ‘हमारे जीवन में हर कोष के विकास के लिए क्या-क्या किया जा सकता है?’ इसका उत्तर एक ‘सही सूची’ नहीं है; पर अच्छी चर्चा की विधि अवश्य है।

चर्चा कैसे कीजिए (विधि) —

  1. पाँच समूह बनाइए, हर समूह एक कोष ले। एक विद्यार्थी ‘लेखकः’ बने जो सुझाव लिखता जाए।
  2. पहले ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ खण्ड फिर से पढ़िए — विशेषकर यह वाक्य : ‘अन्नमयकोषस्य विकासं विना प्राणमयकोषस्य विकासः नैव भवितुं शक्नोति।’ चर्चा इसी क्रम से चले।
  3. हर सदस्य एक ऐसा उपाय बताए जो वह स्वयं इसी सप्ताह कर सके — बड़ी बातें नहीं, छोटा और करने योग्य काम।
  4. अन्त में समूह एक ‘पञ्चकोष-दिनचर्या’ बनाए और यह भी लिखे कि सप्ताह-भर बाद कैसे जाँचा जाएगा कि वह सचमुच हुई या नहीं।

अच्छे उत्तर में ये बातें अवश्य आएँ — हर उपाय पाठ के किसी वाक्य से जुड़ा हो; उपाय क्रम में हों (स्थूल से सूक्ष्म की ओर); और हर उपाय नापा जा सके।

कोषःप्रतिदिनं करणीयम् (संस्कृतम्)व्यवहार में (हिन्दी)कैसे जाँचें
अन्नमयकोषःसात्त्विकं हितकारकं च आहारं सेवामहै। अन्नं न निन्दामहै, न च त्यजामः।समय पर तीन बार सन्तुलित भोजन; जूठन शून्य; दिन में आठ गिलास जलसप्ताह में कितने दिन थाली साफ़ रही — तालिका बनाइए
प्राणमयकोषःप्रतिदिनं प्राणायामः आसनानि च करणीयानि। यथासमयं शयनं जागरणं च।दस मिनट प्राणायाम; तीस मिनट खेल; रात दस बजे तक सो जानानिद्रा के घण्टे तथा प्राणायाम के दिन गिनिए
मनोमयकोषःमनः सत्कर्मणा साधनीयम्, शान्तम् उत्साहयुक्तं च करणीयम्।प्रतिदिन पाँच मिनट मौन; सप्ताह में एक बार किसी की सहायता; क्रोध आने पर दस तक गिननासप्ताह में कितनी बार क्रोध रोक पाए — डायरी
विज्ञानमयकोषःप्रतिदिनं ध्यानं योगासनं स्वाध्यायश्च कर्तव्यः।पढ़ा हुआ अपने शब्दों में लिखना; कोई भी सन्देश आगे भेजने से पहले जाँचना; एक नई पुस्तक हर महीनेमहीने में कितनी पुस्तकें/लेख पढ़े
आनन्दमयकोषःप्राणिषु दया कर्तव्या, परोपकारः कर्तव्यः। रागद्वेषादयः हातव्याः।पक्षियों के लिए जल-पात्र; महीने में एक ‘सेवा-दिवस’; प्रतिदिन एक कृतज्ञता लिखनामहीने में कितने सेवा-कार्य हुए

आदर्श उत्तरम् (नमूना — चर्चा का निष्कर्ष) —

वयं चर्चायाः अन्ते एतं निष्कर्षं प्राप्तवन्तः —
प्रथमम्, विकासः क्रमेण एव भवति; अतः वयम् आदौ अन्नमयकोषस्य विकासाय यतिष्यामहे।
द्वितीयम्, प्रतिदिनं दश निमेषान् यावत् प्राणायामम् आसनानि च करिष्यामः, यथासमयं च शयिष्यामहे।
तृतीयम्, प्रतिदिनं पञ्च निमेषान् मौनम् आचरिष्यामः, येन मनः शान्तं भवेत्।
चतुर्थम्, प्रतिदिनम् अर्धहोरां स्वाध्यायं करिष्यामः, यतः ‘समग्रज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते’।
पञ्चमम्, प्रतिमासम् एकं सेवादिवसम् आचरिष्यामः, पक्षिभ्यः जलं च दास्यामः।
यतः ‘आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्’ इति अस्माकं पाठस्य सन्देशः।

(हिन्दी — चर्चा के अन्त में हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे : पहला, विकास क्रम से ही होता है, इसलिए हम पहले अन्नमयकोष के विकास का प्रयत्न करेंगे। दूसरा, प्रतिदिन दस मिनट प्राणायाम तथा आसन करेंगे और समय पर सोएँगे। तीसरा, प्रतिदिन पाँच मिनट मौन रखेंगे जिससे मन शान्त हो। चौथा, प्रतिदिन आधा घण्टा स्वाध्याय करेंगे, क्योंकि ‘सारा ज्ञान बुद्धि में ही रहता है’। पाँचवाँ, हर महीने एक सेवा-दिवस मनाएँगे और पक्षियों को जल देंगे। क्योंकि हमारे पाठ का सन्देश है — ‘आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के समान है’।)

यह उत्तर अच्छा क्यों है: पाँचों उपाय पाठ के क्रम में हैं — अन्न, प्राण, मन, विज्ञान, आनन्द; कोई सीढ़ी छोड़ी नहीं गई, और यही ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ का मुख्य नियम है। दूसरे, हर उपाय के साथ एक माप है (दस मिनट, आधा घण्टा, महीने में एक बार) — बिना माप के संकल्प केवल इच्छा रह जाता है। तीसरे, अन्तिम वाक्य पाठ का ही उद्धरण है, जो पूरे उत्तर को पाठ से बाँध देता है। चर्चा का उत्तर तभी पूरा माना जाता है जब वह विचार से आरम्भ होकर कार्य पर समाप्त हो।
एक बात और: पाठ का अन्तिम सन्देश यह भी है कि ये पाँचों कोष अन्तिम लक्ष्य नहीं — ‘ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति।’ इसलिए चर्चा को यहीं समाप्त मत कीजिए; यह भी सोचिए कि इन पाँचों के सधने के बाद आगे क्या — यही ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ की असली यात्रा है।
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