शारदा अध्याय 8 व्याकरणम्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययौ कदा प्रयुज्येते ? पुस्तके दत्तां ‘तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगस्थलम्’ इति तालिकां व्याख्यात।
उत्तर

नियमः — पुस्तकस्य शब्देषु :तव्यत्-अनीयर्-प्रत्ययौ लृट्-लोट्-विधिलिङ्लकाराणां विषये योग्यार्थे च भवतः।’ अर्थात् जहाँ ‘करना चाहिए / करेगा / करे’ का भाव हो (विधिलिङ्, लोट् तथा लृट् लकार), और जहाँ ‘करने योग्य’ का भाव हो — वहाँ धातु में तव्यत् या अनीयर् प्रत्यय लगाकर एक ही अर्थ दिया जा सकता है।

अन्नं न परिहरेत् / परिहरतु / परिहरिष्यति
= अन्नं न परिहर्तव्यम् (परि + √हृ + तव्यत्) / परिहरणीयम् (परि + √हृ + अनीयर्)

योग्यार्थे — पानीयं जलम् (पीने योग्य = पानी)। कर्तव्यं / करणीयं = कर्म (करने योग्य = काम)।
विधिलिङ्लकारः / लोट्लकारः / लृट्लकारश्चतव्यत्-प्रत्ययःअनीयर्-प्रत्ययः
अन्नं न परिहरेत् / परिहरतु / परिहरिष्यतिअन्नं न परिहर्तव्यम्अन्नं न परिहरणीयम्
मानवः क्रोधं त्यजेत् / त्यजतु / त्यक्ष्यतिमानवेन क्रोधः त्यक्तव्यःमानवेन क्रोधः त्यजनीयः
मनः सदा सत्कर्मणा साध्नुयात् / साध्नोतु / सात्स्यतिमनः सदा सत्कर्मणा साद्धव्यम्मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्
सर्वदा ईश्वरं सेवेत / सेवताम् / सेविष्यतेसर्वदा ईश्वरः सेवितव्यःसर्वदा ईश्वरः सेवनीयः
प्रतिदिनं योगासनं करोतु / कुर्यात् / करिष्यतिप्रतिदिनं योगासनं कर्तव्यम्प्रतिदिनं योगासनं करणीयम्
तालिका में दो बातें छिपी हैं — दोनों पकड़िए: (१) बाईं ओर के वाक्यों में कर्ता प्रथमा में है (मानवः क्रोधं त्यजेत्), पर दाईं ओर के दोनों स्तम्भों में वही कर्ता तृतीया में चला गया है (मानवेन क्रोधः त्यक्तव्यः) — क्योंकि तव्यत्-अनीयर् वाले वाक्य कर्मवाच्य के ही रूप हैं। (२) दाईं ओर कर्म प्रथमा में आ गया (क्रोधं → क्रोधः) और कृदन्त-पद उसी के लिङ्ग-वचन में है (क्रोधः पुंलिङ्ग → त्यक्तव्यः पुंलिङ्ग)। यही तो पिछले खण्ड का नियम था — अब वह क्रिया से हटकर कृदन्त पर लगा है।
पाठ से जोड़िए: वरुण के उपदेश के लगभग सारे वाक्य इसी साँचे में हैं — ‘कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्’, ‘प्राणः सर्वथा रक्षणीयः’, ‘प्राणायामः कर्तव्यः’, ‘मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्’, ‘आहारशुद्धिश्च करणीया’, ‘प्राणिषु दया कर्तव्या’, ‘रागः… मोहश्च हातव्याः’। इसीलिए यह व्याकरण-खण्ड ठीक इसी पाठ के साथ रखा गया है — नियम बाहर से नहीं आया, पाठ से ही निकला है।
प्र2.
‘त्रिषु लिङ्गेषु तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगः’ — इति तालिकां लिखत तथा नियमं स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

नियमः — तव्यत् तथा अनीयर् प्रत्ययान्त पद विशेषण होते हैं; अतः उनका लिङ्ग सदा कर्मपद के लिङ्ग के अनुसार बदलता है — पुंलिङ्ग में ‘-व्यः / -नीयः’, स्त्रीलिङ्ग में ‘-व्या / -नीया’, नपुंसकलिङ्ग में ‘-व्यम् / -नीयम्’।

प्रत्ययःपुंलिङ्गम्स्त्रीलिङ्गम्नपुंसकलिङ्गम्
कृ + तव्यत्मया परोपकारः कर्तव्यःमया प्राणिषु दया कर्तव्यामया योगासनं कर्तव्यम्
पठ् + तव्यत्शिष्येण वेदः पठितव्यःशिष्येण गीता पठितव्याशिष्येण संस्कृतं पठितव्यम्
रक्ष् + अनीयर्सर्वथा धर्मः रक्षणीयःमातृभूमिः रक्षणीयाआरोग्यं रक्षणीयम्
त्यज् + तव्यत्त्वया क्रोधः त्यक्तव्यःईर्ष्या त्यक्तव्यादूषितान्नं त्यक्तव्यम्
कृ + अनीयर्अस्माभिः प्रतिदिनं योगः करणीयःप्रतिदिनं मया क्रीडा करणीयाअस्माभिः समयेन भोजनं करणीयम्
ध्यान दीजिए — बदलता क्या है: पाँचों पंक्तियों में धातु वही है, कर्ता वही (तृतीया में — मया, शिष्येण, त्वया, अस्माभिः), केवल कर्म बदलते ही प्रत्ययान्त पद का लिङ्ग बदल जाता है। ‘दया’ स्त्रीलिङ्ग है इसलिए ‘कर्तव्या’; ‘योगासनम्’ नपुंसकलिङ्ग है इसलिए ‘कर्तव्यम्’; ‘परोपकारः’ पुंलिङ्ग है इसलिए ‘कर्तव्यः’। कृदन्त पद क्रिया की तरह दिखता है, पर व्यवहार विशेषण जैसा करता है — यही इस तालिका की पूरी सीख है।
पाठ में यही तीनों रूप एक ही वाक्य-समूह में मिलते हैं: ‘प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम् (नपुं.)। प्राणिषु दया कर्तव्या (स्त्री.)। परोपकारः कर्तव्यः (पुं.)।’ (पृ. ९७)। पुस्तक ने तालिका इसी अंश से बनाई है — इसलिए तालिका याद करने से पहले वह अंश पढ़ लीजिए, नियम अपने आप बैठ जाएगा।
प्र3.
‘त्रिषु वचनेषु तव्यत्-अनीयर्-प्रत्यययोः प्रयोगः’ — इति तालिकां लिखत तथा नियमं स्पष्टीकुरुत।
उत्तर

नियमः — लिङ्ग की भाँति वचन भी कर्मपद के अनुसार ही बदलता है — कर्म एकवचन तो कृदन्त एकवचन, कर्म द्विवचन तो द्विवचन, कर्म बहुवचन तो बहुवचन। कर्ता तृतीया में जिस वचन का भी हो, उससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।

एकवचनम्द्विवचनम्बहुवचनम्
शिष्येण वेदः पठितव्यःशिष्येण वेदौ पठितव्यौशिष्येण वेदाः पठितव्याः
अस्माभिः वेदः पठनीयःअस्माभिः वेदौ पठनीयौअस्माभिः वेदाः पठनीयाः
त्वया गीतं पठितव्यम्त्वया गीते पठितव्येत्वया गीतानि पठितव्यानि
मया उद्याने लता दृश्यतेमया उद्याने लते दृश्येतेमया उद्याने लताः दृश्यन्ते
मया क्रोधः त्यक्तव्यःभवता लोभमोहौ त्यक्तव्यौत्वया दोषाः त्यक्तव्याः
दूसरी पंक्ति सबसे अधिक सिखाती है:अस्माभिः वेदः पठनीयः’ — कर्ता ‘अस्माभिः’ बहुवचन है, फिर भी ‘पठनीयः’ एकवचन में है, क्योंकि कर्म ‘वेदः’ एकवचन है। यही बात चौथी पंक्ति में भी है — ‘मया उद्याने लताः दृश्यन्ते’ में कर्ता ‘मया’ एकवचन, पर क्रिया बहुवचन, क्योंकि ‘लताः’ बहुवचन है। कर्मवाच्य में गिनती कर्म की होती है, कर्ता की नहीं — यह वाक्य याद कर लीजिए, दोनों तालिकाएँ इसी से खुल जाएँगी।
पाठ से जोड़िए: ‘रागः, द्वेषः, ईर्ष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः’ (पृ. ९७) — यहाँ कर्म छह हैं, इसलिए कृदन्त पद बहुवचन ‘हातव्याः’ में है। और ‘सर्वदा प्राणायामः, आसनानि च करणीयानि’ (पृ. ११०) में कर्म नपुंसकलिङ्ग बहुवचन है, इसलिए ‘करणीयानि’। नियम पाठ में हर जगह चल रहा है।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ