शारदा अध्याय 8 भृगुवरुणसंवादः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
संवादस्य आरम्भे भृगुः पितरं किम् अपृच्छत् ? वरुणः च किम् उत्तरम् अददात् ? — “अयि भो पितः! अभिवादयेऽहं सादरम्। भगवन्! ब्रह्मविषये मयि काचिद् जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन सर्वं जगदिदं सञ्चाल्यते? कृपया उपदिशतु।” / “पुत्र! शुभं भूयात्। ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम्। यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्। तपस्तप्यताम्। तपसैव ज्ञायते।”
उत्तर

उत्तरम् — भृगुः सादरम् अभिवाद्य पितरं वरुणम् अपृच्छत् — ‘भगवन्! मयि ब्रह्मविषये जिज्ञासा वर्तते। किं तद् ब्रह्म येन इदं सर्वं जगत् सञ्चाल्यते? कृपया उपदिशतु।’ वरुणः तु साक्षात् उत्तरं न अददात्। सः अवदत् — ‘पुत्र! तव शुभं भूयात्। ब्रह्मज्ञानाय त्वया स्वयमेव अन्वेषणं क्रियताम्, यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्, तपः तप्यताम्। तपसा एव ब्रह्म ज्ञायते।’

(हिन्दी — भृगु ने आदरपूर्वक प्रणाम करके पिता वरुण से पूछा — ‘भगवन्! मेरे मन में ब्रह्म के विषय में जिज्ञासा है। वह ब्रह्म क्या है जिससे यह सारा संसार चलाया जाता है? कृपया उपदेश दीजिए।’ वरुण ने सीधा उत्तर नहीं दिया। उन्होंने कहा — ‘पुत्र! तुम्हारा कल्याण हो। ब्रह्मज्ञान के लिए तुम स्वयं ही खोज करो, प्रयत्न और अभ्यास करो, तप करो। तप से ही वह जाना जाता है।’)

पदम्व्याकरण-परिचयःअर्थः
अभिवादयेअभि + √वद् (णिच्), लट्, आत्मनेपद, उत्तमपुरुष, एकवचनमैं प्रणाम करता हूँ
सञ्चाल्यतेसम् + √चल् (णिच्), लट्, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष, एकवचनचलाया जाता है
क्रियताम्√कृ, लोट्, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष, एकवचन(तुम्हारे द्वारा) किया जाए
क्रियेताम्√कृ, लोट्, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष, द्विवचन (यत्नः + अभ्यासः = दो कर्ता)(दोनों) किए जाएँ
तप्यताम्√तप्, लोट्, कर्मवाच्य, प्रथमपुरुष, एकवचनतप किया जाए
भूयात्√भू, आशीर्लिङ्, प्रथमपुरुष, एकवचनहो (आशीर्वाद का रूप)
वरुण ने उत्तर क्यों नहीं दिया: यही इस पाठ का पहला और सबसे बड़ा शिक्षा-सूत्र है। भारतीय ज्ञान-परम्परा में ब्रह्म कोई ऐसी सूचना नहीं है जो बता दी जाए; वह अनुभव है। इसीलिए वरुण उत्तर के स्थान पर विधि देते हैं — ‘अन्वेषणं क्रियताम्, यत्नः अभ्यासश्च क्रियेताम्, तपस्तप्यताम्।’ ध्यान दीजिए, तीनों वाक्य कर्मवाच्य में हैं और तीनों में क्रिया लोट्-लकार की है — अर्थात् आदेश तो है, पर विनम्र आदेश। और अन्तिम वाक्य निर्णायक है — ‘तपसैव ज्ञायते’ — तप से ही जाना जाता है, किसी और उपाय से नहीं। पूरे संवाद में वरुण यही वाक्य पाँच बार दोहराते हैं।
सन्धि-सङ्केत: अभिवादयेऽहम् = अभिवादये + अहम् → ए + अ = ए, ‘अ’ का लोप तथा अवग्रह (पूर्वरूप सन्धि)। जगदिदम् = जगत् + इदम् (व्यञ्जनसन्धि — त् + इ → द्)। तपस्तप्यताम् = तपः + तप्यताम् (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘स्’)। तपसैव = तपसा + एव (वृद्धि सन्धि — आ + ए = ऐ)।
प्र2.
‘अन्नं वै ब्रह्म’ इति भृगुः कथं ज्ञातवान् ? वरुणस्य उपदेशः कः आसीत् ? — तपस्तप्त्वा भृगुणा उक्तं “हे पितः! अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते। अन्नेन एव प्राणिनः जीवन्ति। अन्नेनैव शरीरं बलं च वर्धेते। अतोऽन्नं ब्रह्म इति।”
उत्तर

उत्तरम् — भृगुः अनेकवर्षाणि तपः आचरित्वा एतद् अवबुद्धवान् यत् ‘अन्नं वै ब्रह्म’। तस्य हेतुत्रयम् आसीत् — (१) अन्नाद् एव प्राणिनः जायन्ते, (२) अन्नेन एव प्राणिनः जीवन्ति, (३) अन्नेन एव शरीरं बलं च वर्धेते। अतः सः अन्नम् एव ब्रह्मरूपेण ज्ञातवान्।

वरुणस्य उपदेशः — ‘पुत्र! त्वया सम्यग् अवबुद्धम्। अन्नं हि भूतानां ज्येष्ठम्, तस्मात् सर्वौषधम् इति उच्यते। अतः कदापि अन्नं न निन्द्यात्। अन्नं सदा ईश्वरबुद्ध्या सेवताम्। कदापि अन्नं न परिहर्तव्यम्। प्रयत्नेन अन्नं बहु कुर्वीत। सर्वदा सात्त्विकं हितकारकं च आहारं सेवताम्। परं च ब्रह्म ज्ञातुम् इतोऽपि यतताम्, तपः कुरुताम्।’

(हिन्दी — भृगु ने अनेक वर्षों तक तप करके यह समझा कि ‘अन्न ही ब्रह्म है’। उसके तीन कारण थे — प्राणी अन्न से ही उत्पन्न होते हैं, अन्न से ही जीते हैं, और अन्न से ही शरीर तथा बल दोनों बढ़ते हैं। वरुण ने कहा — ‘पुत्र! तुमने ठीक समझा। अन्न ही प्राणियों में ज्येष्ठ है, इसलिए उसे सर्वौषध कहा जाता है। अन्न की कभी निन्दा न करो, उसे सदा ईश्वर-बुद्धि से ग्रहण करो, कभी उसका त्याग मत करो, प्रयत्नपूर्वक अन्न को बहुत उपजाओ, और सदा सात्त्विक तथा हितकारी आहार लो। पर ब्रह्म को जानने के लिए इससे भी आगे प्रयत्न करो, तप करो।’)

आहारात् सर्वभूतानि सम्भवन्ति महीपते।
आहारेण विवर्धन्ते तेन जीवन्ति जन्तवः॥
(महाभारतम्, वनपर्व १३१/७)

पृष्ठ ९३ के चित्र में अन्न से मिलने वाले आठ फल लिखे हैं —

संस्कृतम्हिन्दीसंस्कृतम्हिन्दी
आयुःआयु, जीवन की लम्बाईबलम्शारीरिक शक्ति
प्रज्ञासमझ, विवेकओजःतेजस्विता, प्राणशक्ति
मेधाग्रहण-शक्तिआरोग्यम्निरोगता
तेजःकान्ति, ओजस्मृतिःस्मरण-शक्ति
भावः: यह पहला सोपान है और सबसे स्थूल भी। भृगु ने वही देखा जो आँख से दिखता है — शरीर अन्न से बनता है, इसलिए अन्न ही ब्रह्म है। वरुण उसे ग़लत नहीं कहते (‘सम्यग् अवबुद्धम्’), पर अधूरा कहते हैं। ध्यान दीजिए, वरुण का उपदेश केवल दार्शनिक नहीं, बिलकुल व्यावहारिक है — अन्न की निन्दा मत करो, थाली में छोड़ो मत, अन्न खूब उपजाओ, सात्त्विक भोजन लो। यही आज की भाषा में ‘अन्न की बरबादी रोको’ तथा ‘सन्तुलित आहार लो’ है — और अभ्यास का ‘अन्नरक्षणाय भवता के उपायाः क्रियन्ते?’ प्रश्न सीधे यहीं से निकला है।
व्याकरण: ‘वर्धेते’ — √वृध्, लट्, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, द्विवचन (कर्ता दो हैं — शरीरं बलं च)। ‘निन्द्यात्’ — √निन्द्, विधिलिङ्, प्रथमपुरुष, एकवचन (‘निन्दा करनी चाहिए’ का निषेध)। ‘कुर्वीत’ — √कृ, विधिलिङ्, आत्मनेपद। ‘सेवताम्’ तथा ‘यतताम्’, ‘कुरुताम्’ — तीनों लोट्-लकार, आत्मनेपद, प्रथमपुरुष, एकवचन (आदरार्थ प्रयोग)। ‘अतोऽन्नम्’ = अतः + अन्नम् (विसर्गसन्धि — उत्वम् तथा पूर्वरूप)।
प्र3.
‘प्राणो वै ब्रह्म’ इति भृगुः कथं ज्ञातवान् ? अत्र वरुणेन कीदृशः उपदेशः दत्तः ? — “प्राणो हि भूतानाम् आयुः। प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्। प्राण एव अस्माकं जीवनम्। प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति। अतः प्राणो ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च।”
उत्तर

उत्तरम् — पुनः तपस्तप्त्वा भृगुः अवदत् — ‘प्राणो वै ब्रह्म’, यतः (१) प्राणः एव भूतानाम् आयुः अस्ति, (२) प्राणे एव शरीरं प्रतिष्ठितम्, (३) प्राणः एव अस्माकं जीवनम्, (४) प्राणेन विना शरीरं क्रियाशून्यं भवति। अतः प्राणः ज्येष्ठः श्रेष्ठश्च — तस्मात् ‘प्राणो वै ब्रह्म’ इति विज्ञातम्।

वरुणस्य उपदेशः — ‘पुत्र! त्वया सत्यम् उदीरितम्। प्राणाद् एव इमानि भूतानि जायन्ते, प्राणेन जातानि जीवन्ति। प्राणशक्त्या एव शारीरिकक्रियाशक्तेः विकासो भवति। अत एव प्राणः सर्वथा रक्षणीयः। तस्मात् प्राणविकासाय प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः। किन्तु ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि कठोरं तपः कुरुताम्।’

(हिन्दी — फिर तप करके भृगु ने कहा — ‘प्राण ही ब्रह्म है’, क्योंकि प्राण ही प्राणियों की आयु है, प्राण में ही शरीर टिका है, प्राण ही हमारा जीवन है और प्राण के बिना शरीर क्रियाहीन हो जाता है; इसलिए प्राण ज्येष्ठ और श्रेष्ठ है। वरुण ने कहा — ‘तुमने सच कहा। प्राण से ही ये सब प्राणी उत्पन्न होते हैं और प्राण से ही जीते हैं। प्राणशक्ति से ही शरीर की क्रियाशक्ति का विकास होता है। इसलिए प्राण की सब प्रकार से रक्षा करनी चाहिए और प्रतिदिन प्राणायाम करना चाहिए। किन्तु ब्रह्मज्ञान के लिए इससे भी कठोर तप करो।’)

यावद् वायुः स्थितो देहे तावज्जीवनमुच्यते।
मरणं तस्य निष्क्रान्तिस्ततो वायुं निरोधयेत्॥
(हठयोगप्रदीपिका)
भावः: दूसरा सोपान पहले से एक कदम सूक्ष्म है। अन्न दिखता है, प्राण नहीं दिखता — पर उसके बिना अन्न से बना शरीर भी ‘क्रियाशून्य’ है। यही तर्क भृगु देता है : शरीर आधेय है, प्राण आधार — ‘प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्’। इसीलिए वरुण का उपदेश भी व्यावहारिक है — प्रतिदिनं प्राणायामः कर्तव्यः। ध्यान दीजिए, हर सोपान पर वरुण एक ‘करने का काम’ देते हैं : पहले सोपान पर सात्त्विक आहार, दूसरे पर प्राणायाम, तीसरे पर सत्कर्म, चौथे पर ध्यान-योगासन, पाँचवें पर दया-परोपकार। दर्शन कभी उपदेश में नहीं रुकता, अभ्यास में उतरता है।
व्याकरण: ‘प्राणेन विना’ — विना के योग में यहाँ तृतीया है (विना, ऋते के योग में द्वितीया, तृतीया तथा पञ्चमी — तीनों चल सकती हैं; अभ्यास प्र. ३ (ज) इसी नियम की परीक्षा है)। ‘प्राणे शरीरं प्रतिष्ठितम्’ — अधिकरणे सप्तमी। ‘प्राणाद् एव’ — अपादाने पञ्चमी (जहाँ से उत्पत्ति हो)। ‘रक्षणीयः’ = √रक्ष् + अनीयर्, ‘कर्तव्यः’ = √कृ + तव्यत् — दोनों विशेषण हैं, इसलिए कर्मपद के लिङ्ग-वचन लेते हैं (प्राणः रक्षणीयः, प्राणायामः कर्तव्यः — दोनों पुंलिङ्ग एकवचन)।
प्र4.
‘मनो वै ब्रह्म’ इति भृगोः अनुभवः कीदृशः आसीत् ? उपनिषदि मनसः विषये किम् उक्तम् ? — “अस्माकं मन एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम्। समस्तानि इन्द्रियाणि अपि मनसा सञ्चाल्यन्ते। मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति। मनसः सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते। अतो मनो वै ब्रह्म इति।”
उत्तर

उत्तरम् — तृतीयवारं तपस्तप्त्वा भृगुः अवदत् — ‘मनो वै ब्रह्म’। तस्य अनुभवः आसीत् — (१) अस्माकं मनः एव सर्वकर्मणः प्रवर्तकम् अस्ति, (२) समस्तानि इन्द्रियाणि मनसा एव सञ्चाल्यन्ते, (३) मानवः मनसा एव सर्वं कार्यं सम्पादयति, (४) मनसः एव सङ्कल्पाः, भावाः, विचाराश्च जायन्ते। अतः मनः एव ब्रह्म।

वरुणस्य उपदेशः — ‘हे वत्स! त्वया सम्यग् अनुभूतं यद् मन एव सर्वम् इति। मानवः चिन्तनशक्त्या, मननशक्त्या, दृढसङ्कल्पशक्त्या च सर्वं लब्धुं शक्नोति। अतः मनसः शक्तिप्राप्तये मनः सदा सत्कर्मणा साधनीयम्, शोकादिरहितम् उत्साहयुक्तं शान्तं च करणीयम्, आहारशुद्धिश्च करणीया। किञ्च ब्रह्मज्ञानाय इतोऽपि प्रयतस्व।’

(हिन्दी — तीसरी बार तप करके भृगु ने कहा — ‘मन ही ब्रह्म है’, क्योंकि मन ही सब कर्मों का प्रवर्तक है, सारी इन्द्रियाँ मन से ही चलाई जाती हैं, मनुष्य मन से ही सब कार्य पूरा करता है, और मन से ही संकल्प, भाव तथा विचार उत्पन्न होते हैं। वरुण ने कहा — ‘वत्स! तुमने ठीक अनुभव किया कि मन ही सब कुछ है। मनुष्य चिन्तन-शक्ति, मनन-शक्ति और दृढ़ संकल्प-शक्ति से सब कुछ पा सकता है। इसलिए मन की शक्ति पाने के लिए मन को सदा सत्कर्म से साधना चाहिए, उसे शोक आदि से रहित, उत्साह से युक्त और शान्त बनाना चाहिए, और आहार की शुद्धि भी करनी चाहिए। पर ब्रह्मज्ञान के लिए इससे भी आगे प्रयत्न करो।’)

कामः संकल्पो विचिकित्सा श्रद्धाऽश्रद्धा
धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत् सर्वं मन एव।
(बृहदारण्यकोपनिषद् १/५/३)

यह वाक्य मन के दस विषय गिनाता है — पृष्ठ ९४ के चित्र में भी यही दस लिखे हैं :

पदम्पदच्छेदःअर्थः
कामःकामःइच्छा
संकल्पःसंकल्पःनिश्चय, प्रतिज्ञा
विचिकित्साविचिकित्सासन्देह
श्रद्धाऽश्रद्धाश्रद्धा + अश्रद्धानिष्ठा तथा अनिष्ठा
धृतिरधृतिःधृतिः + अधृतिःधैर्य तथा अधैर्य
ह्रीःह्रीःलज्जा
धीःधीःबुद्धि
भीःभीःभय
भावः: तीसरा सोपान और सूक्ष्म है। प्राण तो पशु-पक्षी में भी है; पर संकल्प, सन्देह, श्रद्धा, लज्जा, भय — ये मनुष्य के मन के व्यापार हैं। उपनिषद्-वाक्य का बल इसी पर है : सुख-दुःख, डर-हिम्मत, विश्वास-अविश्वास — सब बाहर से नहीं आते, ‘एतत् सर्वं मन एव’ — यह सब मन ही है। इसीलिए वरुण का उपाय भी मन को ही ठीक करना है — सत्कर्म से साधना, शोकरहित तथा शान्त बनाना, और आहार शुद्ध रखना (क्योंकि ‘आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः’)।
सन्धि: ‘श्रद्धाऽश्रद्धा’ = श्रद्धा + अश्रद्धा (पूर्वरूप — ‘अ’ का लोप, अवग्रह)। ‘धृतिरधृतिर्ह्रीर्धीर्भीरित्येतत्’ = धृतिः + अधृतिः + ह्रीः + धीः + भीः + इति + एतत् — यहाँ चार बार विसर्गसन्धि (विसर्ग का ‘र्’) तथा एक बार यण् सन्धि (इति + एतत् → इत्येतत्) हुई है। इसे तोड़कर पढ़ने पर ही वाक्य खुलता है।
प्र5.
‘विज्ञानं वै ब्रह्म’ इत्यत्र ‘विज्ञानम्’ इति कस्य नाम ? भृगुः कैः हेतुभिः विज्ञानं ब्रह्मरूपेण अजानात् ? — “बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम्।… बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासो न भवति। बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति। समग्रज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते।”
उत्तर

उत्तरम् — अत्र ‘विज्ञानम्’ इति बुद्धितत्त्वस्य नाम — ‘बुद्धितत्त्वमेव विज्ञानम्’ इति भृगुः स्पष्टं वदति। सः त्रिभिः हेतुभिः विज्ञानं ब्रह्मरूपेण अजानात् — (१) बुद्धितत्त्वं विना अस्माकं बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः, विवेकशक्तेः, निर्णयशक्तेः, स्मृतिशक्तेश्च विकासः न भवति; (२) बुद्धिः एव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति; (३) समग्रं ज्ञानं बुद्धौ एव विद्यते। अत एव ‘विज्ञानं वै ब्रह्म’।

वरुणस्य उपदेशः — ‘पुत्र! सत्यं भाषसे। अतः बौद्धिकविकासाय विज्ञानमयकोषस्य विकासः कर्तव्यः। तदर्थं प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। किञ्च यदि ब्रह्मणः स्वरूपं वेत्तुम् इच्छति तर्हि इतोऽपि प्रयतताम्, अन्विष्यतां च।’

(हिन्दी — यहाँ ‘विज्ञान’ का अर्थ है बुद्धितत्त्व। भृगु ने तीन कारणों से बुद्धि को ब्रह्म जाना — बुद्धि के बिना हमारी बोधशक्ति, तर्कशक्ति, विवेकशक्ति, निर्णयशक्ति और स्मृतिशक्ति का विकास नहीं होता; बुद्धि ही सारथि बनकर हमें कर्म में लगाती है; और सारा ज्ञान बुद्धि में ही रहता है। वरुण ने कहा — ‘तुम सच कहते हो। इसलिए बौद्धिक विकास के लिए विज्ञानमयकोष का विकास करना चाहिए और उसके लिए प्रतिदिन ध्यान तथा योगासन करना चाहिए। पर यदि ब्रह्म का स्वरूप जानना चाहते हो तो इससे भी आगे प्रयत्न करो और खोज करो।’)

पृष्ठ ९६ के चित्र में बुद्धि की छह शक्तियाँ अङ्कित हैं —

शक्तिःक्या करती हैशक्तिःक्या करती है
विवेकःसही-ग़लत में भेद करनातर्कःकारण-कार्य जोड़कर सोचना
निश्चयःनिर्णय पर पहुँचनास्मृतिःपढ़ा-देखा याद रखना
बोधःविषय को समझनाअनुभवःअनुभव से सीखना
भावः तथा एक सुन्दर रूपक: मन और बुद्धि में क्या अन्तर है — यही चौथे सोपान का प्रश्न है। मन चाहता है, बुद्धि तय करती है। इसीलिए भृगु कहता है ‘बुद्धिरेव सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति’ — बुद्धि ही सारथि बनकर हमें कर्म में जोतती है। यहाँ रूपक अलङ्कार है और यह कठोपनिषद् के प्रसिद्ध रथ-रूपक की गूँज है, जहाँ शरीर रथ है, इन्द्रियाँ घोड़े, मन लगाम, बुद्धि सारथि और आत्मा रथी। ध्यान रखिए — अभ्यास के प्रश्न ३ (ङ) में ‘मनः सारथिरूपेण अस्मान् कर्मणि प्रवर्तयति’ लिखा है; वह असत्य है, क्योंकि पाठ में सारथि बुद्धि है, मन नहीं।
ध्यान दें: यहाँ ‘विज्ञान’ का अर्थ आधुनिक Science नहीं है — पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका भी ‘विज्ञानम् = बुद्धिः, Intellect’ ही देती है। ‘बुद्धौ’ अधिकरण सप्तमी है। ‘बोधशक्तेः, तर्कशक्तेः…’ सब षष्ठी में हैं क्योंकि ‘विकासः’ के साथ सम्बन्ध है — सम्बन्धे षष्ठी। ‘वेत्तुम्’ = √विद् + तुमुन् (जानने के लिए)।
प्र6.
‘आनन्दो वै ब्रह्म’ इति भृगुः कथम् अवाबुध्यत ? संवादस्य अन्ते वरुणः पञ्चकोषविषये किम् उपादिशत् ? — “अस्माकं सर्वकर्माणि आनन्दाय भवन्ति। अस्माकं कर्मणो लक्ष्यम् आनन्दप्राप्तिरेव। आनन्देन एव प्राणिनो जीवन्ति। आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपमिति।”
उत्तर

उत्तरम् — अत्यन्तं सूक्ष्मचिन्तनेन तपसा च भृगुः एवम् अवबुद्धवान् — ‘आनन्दो वै ब्रह्म’। तस्य हेतवः — (१) अस्माकं सर्वकर्माणि आनन्दाय एव भवन्ति, (२) अस्माकं कर्मणः लक्ष्यम् आनन्दप्राप्तिः एव, (३) आनन्देन एव प्राणिनः जीवन्ति, (४) आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम् एव। तस्मात् ‘आनन्दो वै ब्रह्म’।

वरुणस्य उपदेशः — ‘हे वत्स! त्वया सत्यं प्रकटितम्। अतः आनन्दप्राप्तये प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। प्राणिषु दया कर्तव्या। परोपकारः कर्तव्यः। रागः, द्वेषः, ईर्ष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः। सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च।’

उपसंहारे वरुणः अवदत् — ‘हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिः एव अस्माकं पूर्णविकासो भवति, अतः एते ब्रह्मपदेन व्यवह्रियन्ते। ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति। यदि एतेषां क्रमशः विकासं करिष्यसि तर्हि ब्रह्मणः स्वरूपबोधो भविष्यति।’

(हिन्दी — अत्यन्त सूक्ष्म चिन्तन और तप से भृगु ने समझा कि ‘आनन्द ही ब्रह्म है’ — क्योंकि हमारे सारे कर्म आनन्द के लिए ही होते हैं, कर्म का लक्ष्य ही आनन्द-प्राप्ति है, प्राणी आनन्द से ही जीते हैं, और आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के समान है। वरुण ने कहा — ‘तुमने सच प्रकट किया। इसलिए आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करना चाहिए, प्राणियों पर दया करनी चाहिए, परोपकार करना चाहिए; राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और मोह छोड़ देने चाहिए; सदा ईश्वर की सेवा करो और प्रसन्न रहो।’ अन्त में वरुण बोले — ‘पुत्र! तुमने अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द — पाँचों का महत्त्व जान लिया। इन्हीं पाँच से हमारा पूर्ण विकास होता है, इसलिए इन्हें ब्रह्म कहा जाता है। किन्तु ब्रह्म का स्वरूप इनसे भी परे है। ये तो ब्रह्मज्ञान के द्वार हैं। यदि तुम इनका क्रम से विकास करोगे तो ब्रह्म के स्वरूप का बोध हो जाएगा।’)

आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति॥
(छान्दोग्योपनिषद् ७/२६/२)
भावः — पूरे पाठ का निचोड़: पाँचवाँ सोपान सबसे सूक्ष्म है और सबसे सच्चा भी। पूछिए : हम खाते क्यों हैं? जीते क्यों हैं? पढ़ते क्यों हैं? हर उत्तर के पीछे अन्ततः एक ही उत्तर है — आनन्द के लिए। ‘आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्’ — यह वाक्य पूरे पाठ का शिखर है। पर सबसे बड़ी बात वरुण की अन्तिम पंक्ति है : ये पाँचों ब्रह्म ‘हैं’ नहीं, ब्रह्म तक पहुँचने के द्वार हैं — ‘ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति’। और द्वार क्रम से ही खुलते हैं : ‘यदि एतेषां क्रमशः विकासं करिष्यसि’। यही ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ — अन्न से चलकर आनन्द तक की यात्रा।
व्याकरण: ‘हातव्याः’ = √हा + तव्यत्, पुंलिङ्ग प्रथमा बहुवचन — क्योंकि कर्म छह हैं (रागः, द्वेषः… मोहः)। ‘दया कर्तव्या’ स्त्रीलिङ्ग, ‘परोपकारः कर्तव्यः’ पुंलिङ्ग, ‘योगासनं कर्तव्यम्’ नपुंसकलिङ्ग — तव्यत्-प्रत्ययान्त पद का लिङ्ग-वचन सदा कर्मपद के अनुसार होता है; यही नियम पृष्ठ १०६–१०७ के व्याकरण-बक्से में तालिका बनाकर समझाया गया है। ‘व्यवह्रियन्ते’ — वि + अव + √हृ, लट्, कर्मवाच्य, बहुवचन। ‘मोदताम्’ — √मुद्, लोट्, आत्मनेपद (‘प्रसन्न रहें’)।
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