उत्तरम् — अत्यन्तं सूक्ष्मचिन्तनेन तपसा च भृगुः एवम् अवबुद्धवान् — ‘आनन्दो वै ब्रह्म’। तस्य हेतवः — (१) अस्माकं सर्वकर्माणि आनन्दाय एव भवन्ति, (२) अस्माकं कर्मणः लक्ष्यम् आनन्दप्राप्तिः एव, (३) आनन्देन एव प्राणिनः जीवन्ति, (४) आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम् एव। तस्मात् ‘आनन्दो वै ब्रह्म’।
वरुणस्य उपदेशः — ‘हे वत्स! त्वया सत्यं प्रकटितम्। अतः आनन्दप्राप्तये प्रतिदिनं ध्यानं योगासनं च कर्तव्यम्। प्राणिषु दया कर्तव्या। परोपकारः कर्तव्यः। रागः, द्वेषः, ईर्ष्या, क्रोधः, लोभः, मोहश्च हातव्याः। सर्वदा ईश्वरं सेवतां मोदतां च।’
उपसंहारे वरुणः अवदत् — ‘हे पुत्र! त्वं तपसा सूक्ष्मविज्ञानेन च अन्नस्य, प्राणस्य, मनसः, विज्ञानस्य, आनन्दस्य च महत्त्वं ज्ञातवान्। एतैः पञ्चभिः एव अस्माकं पूर्णविकासो भवति, अतः एते ब्रह्मपदेन व्यवह्रियन्ते। ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति। एतानि ब्रह्मज्ञानाय द्वाराणि सन्ति। यदि एतेषां क्रमशः विकासं करिष्यसि तर्हि ब्रह्मणः स्वरूपबोधो भविष्यति।’
(हिन्दी — अत्यन्त सूक्ष्म चिन्तन और तप से भृगु ने समझा कि ‘आनन्द ही ब्रह्म है’ — क्योंकि हमारे सारे कर्म आनन्द के लिए ही होते हैं, कर्म का लक्ष्य ही आनन्द-प्राप्ति है, प्राणी आनन्द से ही जीते हैं, और आनन्द से रहित जीवन मृत्यु के समान है। वरुण ने कहा — ‘तुमने सच प्रकट किया। इसलिए आनन्द की प्राप्ति के लिए प्रतिदिन ध्यान और योगासन करना चाहिए, प्राणियों पर दया करनी चाहिए, परोपकार करना चाहिए; राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध, लोभ और मोह छोड़ देने चाहिए; सदा ईश्वर की सेवा करो और प्रसन्न रहो।’ अन्त में वरुण बोले — ‘पुत्र! तुमने अन्न, प्राण, मन, विज्ञान और आनन्द — पाँचों का महत्त्व जान लिया। इन्हीं पाँच से हमारा पूर्ण विकास होता है, इसलिए इन्हें ब्रह्म कहा जाता है। किन्तु ब्रह्म का स्वरूप इनसे भी परे है। ये तो ब्रह्मज्ञान के द्वार हैं। यदि तुम इनका क्रम से विकास करोगे तो ब्रह्म के स्वरूप का बोध हो जाएगा।’)
आहारशुद्धौ सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धौ ध्रुवा स्मृतिः।
स्मृतिलम्भे सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः इति॥
(छान्दोग्योपनिषद् ७/२६/२)
भावः — पूरे पाठ का निचोड़: पाँचवाँ सोपान सबसे सूक्ष्म है और सबसे सच्चा भी। पूछिए : हम खाते क्यों हैं? जीते क्यों हैं? पढ़ते क्यों हैं? हर उत्तर के पीछे अन्ततः एक ही उत्तर है — आनन्द के लिए। ‘आनन्देन रहितं जीवनं मृत्युरूपम्’ — यह वाक्य पूरे पाठ का शिखर है। पर सबसे बड़ी बात वरुण की अन्तिम पंक्ति है : ये पाँचों ब्रह्म ‘हैं’ नहीं, ब्रह्म तक पहुँचने के द्वार हैं — ‘ब्रह्मणः स्वरूपं तु ततोऽपि परे अस्ति’। और द्वार क्रम से ही खुलते हैं : ‘यदि एतेषां क्रमशः विकासं करिष्यसि’। यही ‘अन्नाद् आनन्दं प्रति’ — अन्न से चलकर आनन्द तक की यात्रा।
व्याकरण: ‘हातव्याः’ = √हा + तव्यत्, पुंलिङ्ग प्रथमा बहुवचन — क्योंकि कर्म छह हैं (रागः, द्वेषः… मोहः)। ‘दया कर्तव्या’ स्त्रीलिङ्ग, ‘परोपकारः कर्तव्यः’ पुंलिङ्ग, ‘योगासनं कर्तव्यम्’ नपुंसकलिङ्ग — तव्यत्-प्रत्ययान्त पद का लिङ्ग-वचन सदा कर्मपद के अनुसार होता है; यही नियम पृष्ठ १०६–१०७ के व्याकरण-बक्से में तालिका बनाकर समझाया गया है। ‘व्यवह्रियन्ते’ — वि + अव + √हृ, लट्, कर्मवाच्य, बहुवचन। ‘मोदताम्’ — √मुद्, लोट्, आत्मनेपद (‘प्रसन्न रहें’)।