शारदा अध्याय 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् के लिए एनसीईआरटी समाधान

अद्यतन 2026-09-06

इस अध्याय के बारे में

पाठ-परिचय — पाठ का आरम्भ चित्र-संवाद से होता है। एक बालक कहता है — ‘मातः! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि।’ माता उत्तर देती है — ‘न हि पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।’ बालक पूछता है कि दूसरे का धन तिनके के समान कैसे होता है, और माता उसे उत्तर देने के लिए पञ्चतन्त्र की एक कथा सुनाती है। यही कथा पूरा पाठ है — अर्थात् पाठ की भूमिका ही उसका प्रश्न है और कथा उसका उत्तर। विधा तथा स्रोत — यह कथा है, नाट्य-संवाद की शैली में लिखी हुई (पात्रों के नाम बाईं ओर और कोष्ठक में रङ्ग-सङ्केत)। पुस्तक स्वयं बताती है — ‘पञ्चतन्त्रं नीतिशिक्षाप्रदानां रोचकानां कथानां सङ्ग्रहः वर्तते। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः विष्णुशर्मा अस्ति। … प्रस्तुतकथा मित्रभेदः इति प्रथमतन्त्रात् स्वीकृता।’ पञ्चतन्त्र के पाँच तन

  1. पाठ-परिचयः
  2. कथा
  3. पाठगताः श्लोकाः
  4. सर्वं शब्देन भासते
  5. अत्र इदम् अवधेयम्
  6. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  7. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  8. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  9. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  10. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  11. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  12. अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
  13. स्वाध्यायान्मा प्रमदः
  14. यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्
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