कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 7 उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत् के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ-परिचय — पाठ का आरम्भ चित्र-संवाद से होता है। एक बालक कहता है — ‘मातः! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि।’ माता उत्तर देती है — ‘न हि पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।’ बालक पूछता है कि दूसरे का धन तिनके के समान कैसे होता है, और माता उसे उत्तर देने के लिए पञ्चतन्त्र की एक कथा सुनाती है। यही कथा पूरा पाठ है — अर्थात् पाठ की भूमिका ही उसका प्रश्न है और कथा उसका उत्तर। विधा तथा स्रोत — यह कथा है, नाट्य-संवाद की शैली में लिखी हुई (पात्रों के नाम बाईं ओर और कोष्ठक में रङ्ग-सङ्केत)। पुस्तक स्वयं बताती है — ‘पञ्चतन्त्रं नीतिशिक्षाप्रदानां रोचकानां कथानां सङ्ग्रहः वर्तते। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः विष्णुशर्मा अस्ति। … प्रस्तुतकथा मित्रभेदः इति प्रथमतन्त्रात् स्वीकृता।’ पञ्चतन्त्र के पाँच तन
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| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी अर्थ | पाठ का वाक्य |
|---|---|---|---|
| अटव्याम् (स्त्री.स.ए.व.) | वने | जंगल में | पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय… |
| अपायम् (पुं.द्वि.ए.व.) | विघ्नम् | समस्या / संकट | उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्। |
| अहनि (अहन्, नपुं.स.ए.व.) | दिवसे | दिन के समय | अथान्यस्मिन् अहनि धर्मबुद्धिमुपेत्याह — |
| आपः (स्त्री.प्र.ब.व.) | जलम् | जल | द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च। |
| उत्फुल्ललोचनाः (बहुव्रीहिः, पुं.प्र.ब.व.) | उत्फुल्लानि लोचनानि येषां ते | आश्चर्य से फटी हुई आँखों वाले | ते सर्वे जनाः विस्मयेन उत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः। |
| खनित्वा (√खन् + क्त्वा) | खननं कृत्वा | खोदकर | भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। |
| द्यौः (स्त्री.प्र.ए.व.) | आकाशः | आकाश | द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च। |
| धरणीपीठे (षष्ठीतत्पुरुषः, नपुं.स.ए.व.) | धरण्याः पीठे | धरती पर | भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥ |
| निक्षिप्य (नि + √क्षिप् + ल्यप्) | स्थापयित्वा | रखकर | भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रमादाय गृहं प्रविशावः। |
| निशीथे (पुं.स.ए.व.) | अर्धरात्रे | आधी रात में | पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा… |
| परिवेष्ट्य (परि + √वेष्ट् + ल्यप्) | आवृत्य | घेरकर | शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि। |
| प्रहृष्टमनाः (बहुव्रीहिः, पुं.प्र.ब.व/ए.व.) | प्रहृष्टं मनः यस्य सः | प्रसन्न मन वाला | तद्वचनमाकर्ण्य प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह — |
| भाण्डम् (नपुं.द्वि.ए.व.) | पात्रम् | घड़े को | यावत् खनतः तावद्रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। |
| यास्यति (√या + लृट्, प्र.पु.ए.व.) | गमिष्यति | जाएगा | अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्यति। |
| वञ्चयित्वा (√वञ्च् + क्त्वा) | वञ्चनं कृत्वा | ठगकर | अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति। |
| वीक्षन्ते (वि + √ईक्ष्, लट्, प्र.पु.ब.व.) | पश्यन्ति | देखते हैं | आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥ |
| व्रजति (√व्रज्, लट्, प्र.पु.ए.व.) | गच्छति | जाता है | यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥ |
| लोष्ठवत् (लोष्ठ + वत्) | पाषाणखण्डवत् | पत्थर के टुकड़े के समान | मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्। |
| स्फुटितेक्षणः (बहुव्रीहिः, पुं.प्र.ए.व.) | स्फुटिते ईक्षणे यस्य सः | नष्ट हुई आँखों वाला | अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः। |
अभ्यास
- पाठ-परिचयः
- कथा
- पाठगताः श्लोकाः
- सर्वं शब्देन भासते
- अत्र इदम् अवधेयम्
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः
- यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्