शारदा अध्याय 7 स्वाध्यायान्मा प्रमदः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘पञ्चतन्त्रम्’ इति ग्रन्थस्य परिचयं लिखत — तस्य लेखकः कः, तत्र कति तन्त्राणि, कानि च ? प्रस्तुतकथा कस्मात् तन्त्रात् स्वीकृता ?
उत्तर

पुस्तक का मूल पाठ — ‘पञ्चतन्त्रं नीतिशिक्षाप्रदानां रोचकानां कथानां सङ्ग्रहः वर्तते। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः विष्णुशर्मा अस्ति। पशुपक्षिणां कथामाध्यमेन नीतिशास्त्रस्य गहनतत्त्वमपि सरलतया अत्र शिक्षितम्। अस्मिन् ग्रन्थे कथाः पञ्चसु तन्त्रेषु विभक्ताः सन्ति। यथा — मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं चेति। प्रस्तुतकथा मित्रभेदः इति प्रथमतन्त्रात् स्वीकृता।’

उत्तरम् — पञ्चतन्त्रं नीतिशिक्षां प्रदातॄणां रोचकानां कथानां सङ्ग्रहः अस्ति। अस्य लेखकः विष्णुशर्मा। अस्मिन् ग्रन्थे पञ्च तन्त्राणि सन्ति — मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं च। प्रस्तुतकथा प्रथमतन्त्रात् ‘मित्रभेदः’ इत्यस्मात् स्वीकृता।

(हिन्दी — पञ्चतन्त्र नीति की शिक्षा देने वाली रोचक कथाओं का संग्रह है। इसके लेखक विष्णुशर्मा हैं। पशु-पक्षियों की कथाओं के माध्यम से यहाँ नीतिशास्त्र के गहरे तत्त्व भी सरलता से सिखाए गए हैं। इस ग्रन्थ में कथाएँ पाँच तन्त्रों में बँटी हैं — मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षितकारक। प्रस्तुत कथा पहले तन्त्र ‘मित्रभेद’ से ली गई है।)

तन्त्रम्शाब्दिक अर्थविषयप्रसिद्ध कथा
१. मित्रभेदःमित्रों में फूटचुगली और लोभ मित्रता कैसे तोड़ते हैंसिंह पिङ्गलक तथा वृषभ सञ्जीवक; धर्मबुद्धि-पापबुद्धि (यही पाठ)
२. मित्रसम्प्राप्तिःमित्रों का मिलनासच्चे मित्र मिलकर कैसे संकट जीतते हैंकपोत, मूषक हिरण्यक, कच्छप तथा मृग की मैत्री
३. काकोलूकीयम्काक तथा उलूकशत्रु से व्यवहार, गुप्तचर-नीति, सन्धि-विग्रहकौओं और उल्लुओं का युद्ध; बकाः तथा नकुलः
४. लब्धप्रणाशःपाई हुई वस्तु का नष्ट होनाहाथ आई वस्तु मूर्खता से कैसे निकल जाती हैवानर तथा मकर (मगर) की कथा
५. अपरीक्षितकारकम्बिना जाँचे काम करनाबिना सोचे किया काम कैसे पछतावा देता हैब्राह्मण तथा नकुल (नेवले) की कथा
‘तन्त्र’ शब्द का अर्थ यहाँ क्या है: ‘तन्त्र’ का अर्थ है व्यवस्था, प्रबन्ध, कोई एक सुसंगठित सिद्धान्त (√तन् = फैलाना, बुनना)। पञ्चतन्त्र इसलिए ‘पाँच अध्याय’ नहीं, ‘राजनीति तथा व्यवहार के पाँच सूत्र’ है। परम्परा कहती है कि विष्णुशर्मा ने राजा अमरशक्ति के तीन मन्दबुद्धि पुत्रों को छह महीने में नीतिशास्त्र सिखाने का वचन दिया था — और उपदेश देने के बदले उन्हें ये कथाएँ सुनाईं। यही विधि इस पाठ के आरम्भ में माता भी अपनाती है : प्रश्न का उत्तर उपदेश से नहीं, कथा से।
ध्यान देने योग्य बात: पुस्तक कहती है ‘पशुपक्षिणां कथामाध्यमेन’, किन्तु प्रस्तुत कथा में एक भी पशु-पक्षी नहीं है — सब पात्र मनुष्य हैं। इससे यह समझिए कि पञ्चतन्त्र केवल पशु-कथाओं का ग्रन्थ नहीं; उसमें मनुष्य-कथाएँ भी हैं। पशु-रूपक वहाँ आता है जहाँ बात सीधे कहने में संकोच हो।
Did you know? पञ्चतन्त्र संसार में सबसे अधिक अनूदित भारतीय ग्रन्थों में है। छठी शताब्दी में यह पहलवी में गया, वहाँ से अरबी में ‘कलीला व दिमना’ बना (यह नाम ‘करटक-दमनक’ का ही रूपान्तर है — मित्रभेद तन्त्र के दो सियार), और फिर हिब्रू, लातिन तथा यूरोप की अनेक भाषाओं में पहुँचा। भारत में ही इसका एक संक्षिप्त रूप ‘हितोपदेश’ भी प्रसिद्ध है।
प्र2.
‘क्तवतुप्रत्ययः’ इति व्याकरण-बिन्दुं सोदाहरणं स्पष्टीकुरुत। पुस्तके दत्तां सारणीं पूरयत तथा उदाहरणवाक्यानि लिखत।
उत्तर

पुस्तक का नियम — ‘भूतकालार्थे कर्तरि धातोः क्तवतुप्रत्ययस्य प्रयोगः भवति। क्तवतुप्रत्ययान्तपदानि विशेषणपदत्वेन प्रयुज्यन्ते। कर्तृपदानुसारं क्तवतुप्रत्ययान्तपदानां लिङ्गवचननिर्धारणं भवति।’

उत्तरम् — भूतकाल में कर्तृवाच्य का अर्थ बताने के लिए धातु में ‘क्तवतु’ प्रत्यय जोड़ा जाता है। क्तवतु-प्रत्ययान्त पद वाक्य में विशेषण की तरह प्रयुक्त होते हैं, इसलिए उनका लिङ्ग तथा वचन कर्ता के अनुसार तय होता है।

पुस्तक की सारणी (पूर्ण रूप में) —

धातुः + प्रत्ययःपुंलिङ्गेस्त्रीलिङ्गेनपुंसकलिङ्गे
पठ् + क्तवतुबालकः पठितवान्बालिका पठितवतीमित्रं पठितवत्
खाद् + क्तवतुबालकः खादितवान्बालिका खादितवतीमित्रं खादितवत्
कृ + क्तवतुबालकः कृतवान्बालिका कृतवतीमित्रं कृतवत्

पुस्तक के उदाहरणवाक्यानि —

क्रमःवाक्यम्क्तवतु-पदम्कर्ता (लिङ्ग · वचन)हिन्दी अर्थ
(क)ह्यः शिक्षकः पञ्च श्लोकान् पाठितवान्।पाठितवान्शिक्षकः — पुं. · ए.व.कल शिक्षक ने पाँच श्लोक पढ़ाए।
(ख)गतशनिवासरे छात्राः विद्यालयपरिसरे स्वच्छतां कृतवन्तः।कृतवन्तःछात्राः — पुं. · ब.व.पिछले शनिवार छात्रों ने विद्यालय-परिसर में सफ़ाई की।
(ग)माता प्रातः स्वल्पाहारं दत्तवती।दत्तवतीमाता — स्त्री. · ए.व.माता ने सवेरे अल्पाहार दिया।
(घ)गतवर्षे वार्षिकोत्सवे नवमकक्षायाः छात्राः नाटके अभिनीतवन्तः।अभिनीतवन्तःछात्राः — पुं. · ब.व.पिछले वर्ष वार्षिकोत्सव में नवीं कक्षा के छात्रों ने नाटक में अभिनय किया।
(ङ)गतसप्ताहे वयं जयपुरं गतवन्तः।गतवन्तःवयम् — उत्तम पुरुष · ब.व.पिछले सप्ताह हम जयपुर गए।
क्तवतु का असली रहस्य — वह क्रिया नहीं, विशेषण है: ‘गच्छति’ जैसी क्रिया कर्ता के पुरुष तथा वचन से मिलती है, पर लिङ्ग से नहीं (बालकः गच्छति / बालिका गच्छति — क्रिया एक ही)। क्तवतु इसके ठीक उलट चलता है — वह कर्ता के लिङ्ग तथा वचन से मिलता है : बालकः गतवान् / बालिका गतवती / मित्रं गतवत्। इसीलिए (ङ) में ‘वयम्’ उत्तमपुरुष होते हुए भी रूप ‘गतवन्तः’ ही है — क्योंकि क्तवतु पुरुष नहीं देखता, वचन देखता है।
पाठ से क्तवतु-पदों की सूचीधातु + उपसर्गकर्ताअर्थ
सम्पादितवान्सम् + √पद् + णिच्पापबुद्धिः (पुं. ए.व.)कमाया
गतवान् / गतवन्तौ√गम्पापबुद्धिः / तौ द्वौगया / दोनों गए
दृष्टवन्तौ√दृश्तौ द्वौ (द्विवचन)दोनों ने देखा
उक्तवान्√वच्पापबुद्धिःकहा
प्रबोधितवान्प्र + √बुध् + णिच्पापबुद्धिःसमझा दिया
आगतवन्तौआ + √गम्तौ द्वौदोनों आए
दण्डितवन्तः / प्रशंसितवन्तः√दण्ड् + णिच् / प्र + √शंस्राजपुरुषाः (ब.व.)दण्ड दिया / प्रशंसा की
क्त तथा क्तवतु का अन्तर एक बार में समझिए: दोनों भूतकाल बताते हैं, पर वाच्य अलग है। क्त (‘-त’) प्रायः कर्मवाच्य में आता है और कर्म से मेल खाता है — ‘मया धनं चोरितम्’ (मेरे द्वारा धन चुराया गया), कर्ता तृतीया में। क्तवतु (‘-तवत्’) कर्तृवाच्य में आता है और कर्ता से मेल खाता है — ‘अहं धनं चोरितवान्’ (मैंने धन चुराया), कर्ता प्रथमा में। पाठ में दोनों साथ-साथ मिलते हैं — ‘मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः’ (क्त) और ‘पापबुद्धिः … गतवान्’ (क्तवतु)।
अभ्यास के लिए: इसी नियम से पाँच नए वाक्य बनाइए — ‘सीता गीतं गीतवती।’ · ‘बालकाः क्रीडाक्षेत्रे क्रीडितवन्तः।’ · ‘पत्रं भूमौ पतितवत्।’ · ‘अहं पुस्तकं पठितवान्/पठितवती।’ · ‘छात्रे प्रश्नम् उक्तवत्यौ।’ हर बार पहले कर्ता का लिङ्ग-वचन देखिए, फिर प्रत्यय का रूप लगाइए।
प्र3.
‘तत्पुरुषसमासः’ किम् ? तस्य नामकरणं कथं भवति ? पुस्तके दत्तानि उदाहरणानि विभक्तिनामसहितं लिखत।
उत्तर

पुस्तक का नियम — ‘द्वयोः पदयोः, अनेकेषां पदानां वा एकपदीकरणं भवति समासः। तत्पुरुषसमासे उत्तरपदस्य प्रधानता भवति। यस्य पदस्य क्रियया सह सम्बन्धः भवति तत् पदं प्रधानम् इत्युच्यते। पूर्वपदस्य विभक्तीनां लोपः क्रियते। यस्याः विभक्तेः लोपं कृत्वा पदमेलनं भवति तन्नाम्ना एव तस्य तत्पुरुष-समासस्य नाम भवति।’

उत्तरम् — दो अथवा अनेक पदों को मिलाकर एक पद बनाना ‘समास’ कहलाता है। जिस समास में उत्तरपद प्रधान होता है, वह तत्पुरुष समास है। समास बनाते समय पूर्वपद की विभक्ति लुप्त हो जाती है, और जिस विभक्ति का लोप हुआ, उसी के नाम पर तत्पुरुष का नाम पड़ता है।

पुस्तक के उदाहरण —

विग्रहःसमस्तपदम्समासस्य नामलुप्त विभक्तिहिन्दी
शरणम् आगतःशरणागतःद्वितीयातत्पुरुषःद्वितीया (‘-म्’)शरण में आया हुआ
सुखेन अन्वितःसुखान्वितःतृतीयातत्पुरुषःतृतीया (‘-एन’)सुख से युक्त
छात्रेभ्यः हितम्छात्रहितम्चतुर्थीतत्पुरुषःचतुर्थी (‘-भ्यः’)छात्रों के लिए हितकर
रोगात् भयम्रोगभयम्पञ्चमीतत्पुरुषःपञ्चमी (‘-आत्’)रोग से भय
देशस्य भक्तःदेशभक्तःषष्ठीतत्पुरुषःषष्ठी (‘-स्य’)देश का भक्त
कार्ये कुशलःकार्यकुशलःसप्तमीतत्पुरुषःसप्तमी (‘-ए’)काम में कुशल
‘उत्तरपद प्रधान’ का अर्थ क्या है: पुस्तक कसौटी भी देती है — ‘यस्य पदस्य क्रियया सह सम्बन्धः भवति तत् पदं प्रधानम्’। परखिए : ‘देशभक्तः विद्यालयम् आगच्छति’ में आने वाला कौन है — देश या भक्त ? उत्तर ‘भक्तः’, अर्थात् उत्तरपद। इसीलिए यह तत्पुरुष है। यही कसौटी बहुव्रीहि पर लगाइए — ‘उत्फुल्ललोचनाः जनाः’ में क्रिया का सम्बन्ध न ‘उत्फुल्ल’ से है न ‘लोचन’ से, बल्कि किसी तीसरे पद (जनाः) से; इसीलिए वह तत्पुरुष नहीं, बहुव्रीहि है।
प्रथमा तत्पुरुष क्यों नहीं होता: सूची द्वितीया से आरम्भ होकर सप्तमी पर समाप्त होती है — प्रथमा छूट जाती है। कारण यह है कि प्रथमा ‘सम्बन्ध’ नहीं दिखाती, केवल कर्ता/नाम बताती है; उसका लोप करके कुछ जोड़ने को बचता ही नहीं। प्रथमा-विभक्ति वाले समास कर्मधारय तथा द्विगु कहलाते हैं (नीलकमलम् = नीलं कमलम्; त्रिभुवनम् = त्रयाणां भुवनानां समाहारः) — वे भी तत्पुरुष के ही भेद माने जाते हैं।
पाठ से तत्पुरुष के अपने उदाहरण: गुरुजनाज्ञया (= गुरुजनानाम् आज्ञया — षष्ठी) · वनदेवता (= वनस्य देवता — षष्ठी) · धरणीपीठे (= धरण्याः पीठे — षष्ठी) · बुद्धिप्रभावेण (= बुद्धेः प्रभावेण — षष्ठी) · राजकुले (= राज्ञः कुले — षष्ठी) · अर्थोपार्जनम् (= अर्थस्य उपार्जनम् — षष्ठी) · शमीकोटरम् (= शम्याः कोटरम् — षष्ठी) · धनाभावात् (= धनस्य अभावात् — षष्ठी) · चौरकर्म (= चौरस्य कर्म — षष्ठी)। इसी सूची से अभ्यास का प्रश्न ६ बना है — इसलिए दोनों को साथ पढ़िए।
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