पुस्तक का मूल पाठ — ‘पञ्चतन्त्रं नीतिशिक्षाप्रदानां रोचकानां कथानां सङ्ग्रहः वर्तते। अस्य ग्रन्थस्य लेखकः विष्णुशर्मा अस्ति। पशुपक्षिणां कथामाध्यमेन नीतिशास्त्रस्य गहनतत्त्वमपि सरलतया अत्र शिक्षितम्। अस्मिन् ग्रन्थे कथाः पञ्चसु तन्त्रेषु विभक्ताः सन्ति। यथा — मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं चेति। प्रस्तुतकथा मित्रभेदः इति प्रथमतन्त्रात् स्वीकृता।’
उत्तरम् — पञ्चतन्त्रं नीतिशिक्षां प्रदातॄणां रोचकानां कथानां सङ्ग्रहः अस्ति। अस्य लेखकः विष्णुशर्मा। अस्मिन् ग्रन्थे पञ्च तन्त्राणि सन्ति — मित्रभेदः, मित्रसम्प्राप्तिः, काकोलूकीयम्, लब्धप्रणाशः, अपरीक्षितकारकं च। प्रस्तुतकथा प्रथमतन्त्रात् ‘मित्रभेदः’ इत्यस्मात् स्वीकृता।
(हिन्दी — पञ्चतन्त्र नीति की शिक्षा देने वाली रोचक कथाओं का संग्रह है। इसके लेखक विष्णुशर्मा हैं। पशु-पक्षियों की कथाओं के माध्यम से यहाँ नीतिशास्त्र के गहरे तत्त्व भी सरलता से सिखाए गए हैं। इस ग्रन्थ में कथाएँ पाँच तन्त्रों में बँटी हैं — मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलूकीय, लब्धप्रणाश तथा अपरीक्षितकारक। प्रस्तुत कथा पहले तन्त्र ‘मित्रभेद’ से ली गई है।)
| तन्त्रम् | शाब्दिक अर्थ | विषय | प्रसिद्ध कथा |
|---|---|---|---|
| १. मित्रभेदः | मित्रों में फूट | चुगली और लोभ मित्रता कैसे तोड़ते हैं | सिंह पिङ्गलक तथा वृषभ सञ्जीवक; धर्मबुद्धि-पापबुद्धि (यही पाठ) |
| २. मित्रसम्प्राप्तिः | मित्रों का मिलना | सच्चे मित्र मिलकर कैसे संकट जीतते हैं | कपोत, मूषक हिरण्यक, कच्छप तथा मृग की मैत्री |
| ३. काकोलूकीयम् | काक तथा उलूक | शत्रु से व्यवहार, गुप्तचर-नीति, सन्धि-विग्रह | कौओं और उल्लुओं का युद्ध; बकाः तथा नकुलः |
| ४. लब्धप्रणाशः | पाई हुई वस्तु का नष्ट होना | हाथ आई वस्तु मूर्खता से कैसे निकल जाती है | वानर तथा मकर (मगर) की कथा |
| ५. अपरीक्षितकारकम् | बिना जाँचे काम करना | बिना सोचे किया काम कैसे पछतावा देता है | ब्राह्मण तथा नकुल (नेवले) की कथा |