प्र1.
अधोलिखितानि वाक्यानि कथाक्रमानुसारं पुनः लिखत — (क) भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति। (ख) ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। (ग) द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। (घ) कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। (ङ) यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। (च) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
उत्तर
शुद्धः कथाक्रमः — (घ) → (ख) → (ङ) → (ग) → (क) → (च)।
१. कस्मिंश्चिद्देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म। (घ)
२. ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। (ख)
३. यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। (ङ)
४. द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। (ग)
५. भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति। (क)
६. राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। (च)
२. ततस्तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ। (ख)
३. यथा द्वाभ्यां चिन्तितं तथैव भूमिं खनित्वा तत्रैव धनं निक्षिप्य स्वगृहं गतवन्तौ। (ङ)
४. द्वावपि गत्वा तत् स्थानं यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। (ग)
५. भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति। (क)
६. राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। (च)
| क्रमः | वाक्यम् (सङ्केतेन) | कथायाः घटना | क्रम का प्रमाण |
|---|---|---|---|
| १ | (घ) कस्मिंश्चिद्देशे … प्रतिवसतः स्म। | कथा का आरम्भ — दो मित्रों का परिचय | ‘कस्मिंश्चिद् देशे’ — कथाओं का पारम्परिक आरम्भ-वाक्य |
| २ | (ख) ततस्तौ … देशान्तरं प्रस्थितौ। | गुरुजनों की अनुमति लेकर परदेश-गमन | ‘ततः’ (उसके बाद) — पिछली घटना की ओर सङ्केत |
| ३ | (ङ) यथा द्वाभ्यां चिन्तितं … स्वगृहं गतवन्तौ। | लौटकर धन जंगल में गाड़ना | धन पहले कमाया गया, तभी गाड़ा जा सकता है |
| ४ | (ग) द्वावपि गत्वा … रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ। | खोदने पर घड़ा खाली मिलना | ‘रिक्तं भाण्डम्’ तभी दिखेगा जब धन पहले गाड़ा जा चुका हो |
| ५ | (क) भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति … | पापबुद्धि का अपने पिता से झूठी गवाही का अनुरोध | यह विवाद के बाद, न्याय से पहले की रात का प्रसंग है |
| ६ | (च) राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः। | कथा का अन्त — पापबुद्धि को दण्ड | दण्ड सत्य प्रकट होने के बाद ही सम्भव है |
क्रम लगाने की विधि (दो कसौटियाँ): (१) भाषिक सङ्केत — वाक्य में छिपे शब्द ही क्रम बता देते हैं। ‘कस्मिंश्चिद् देशे’ सदा आरम्भ में आता है; ‘ततः’ का अर्थ ही ‘उसके बाद’ है, इसलिए वह पहला वाक्य नहीं हो सकता; ‘तत् स्थानम्’ में ‘तत्’ बता रहा है कि उस स्थान की चर्चा पहले हो चुकी है। (२) कार्य-कारण — धन पहले कमाया जाएगा, तब गाड़ा जाएगा, तब चोरी होगी, तब घड़ा खाली मिलेगा, तब विवाद होगा, तब दण्ड मिलेगा। दोनों कसौटियाँ एक ही क्रम देती हैं — तभी उत्तर पक्का है।
एक चूक से बचिए: (ङ) और (ग) दोनों में ‘खनन’ की बात है, इसलिए इन्हें उलट देने की भूल आम है। अन्तर पकड़िए — (ङ) में खनित्वा … निक्षिप्य (खोदकर धन रखा) है, अर्थात् धन गाड़ा जा रहा है; (ग) में यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ (खोदते ही खाली घड़ा दिखा) है, अर्थात् धन निकालने आए हैं। रखना पहले, निकालना बाद में — इसलिए (ङ) पहले।
व्याकरण-सङ्केत: ‘प्रतिवसतः स्म’ — वर्तमानकालिक क्रिया के साथ ‘स्म’ लगने पर अर्थ भूतकाल का हो जाता है (‘रहते थे’)। ‘शुभेऽहनि’ = शुभे + अहनि (विसर्ग-रहित सन्धि; ‘अ’ का लोप अवग्रह ‘ऽ’ से सूचित)। ‘यावत् … तावत्’ यहाँ ‘ज्यों ही … त्यों ही’ के अर्थ में है, ‘जब तक … तब तक’ के अर्थ में नहीं।