प्र1.
गुरुजनाज्ञया
उत्तर
विग्रहः — गुरुजनानाम् आज्ञया। (हिन्दी — गुरुजनों की आज्ञा से।)
समस्तपदम् — गुरुजनाज्ञया
सन्धिविच्छेदः — गुरुजन + आज्ञया (अ + आ = आ, दीर्घ सन्धि)
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः (लुप्त विभक्ति — षष्ठी ‘नाम्’)
पदस्य विभक्तिः — करणे तृतीया एकवचन (‘आज्ञा से’)
सन्धिविच्छेदः — गुरुजन + आज्ञया (अ + आ = आ, दीर्घ सन्धि)
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः (लुप्त विभक्ति — षष्ठी ‘नाम्’)
पदस्य विभक्तिः — करणे तृतीया एकवचन (‘आज्ञा से’)
समास का नाम कैसे तय होता है: पुस्तक ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ में स्वयं नियम देती है — ‘यस्याः विभक्तेः लोपं कृत्वा पदमेलनं भवति तन्नाम्ना एव तस्य तत्पुरुष-समासस्य नाम भवति।’ यहाँ विग्रह में ‘गुरुजनानाम्’ षष्ठी बहुवचन है और समास बनाते समय वही विभक्ति लुप्त हुई, अतः यह षष्ठीतत्पुरुष है। ध्यान रहे — समास का नाम पूरे पद की विभक्ति (यहाँ तृतीया) से नहीं, पूर्वपद की लुप्त विभक्ति से तय होता है।
पाठ का वाक्य: ‘अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः।’ — धर्मबुद्धि का यह उत्तर उसके चरित्र का पहला परिचय है : परदेश जाने को तैयार तो है, पर बड़ों की अनुमति के बिना नहीं। आगे कथा कहती है — ‘ततस्तौ गुरुजनानामनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।’