शारदा अध्याय 7 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
गुरुजनाज्ञया
उत्तर

विग्रहः — गुरुजनानाम् आज्ञया। (हिन्दी — गुरुजनों की आज्ञा से।)

समस्तपदम् — गुरुजनाज्ञया
सन्धिविच्छेदः — गुरुजन + आज्ञया (अ + आ = आ, दीर्घ सन्धि)
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः (लुप्त विभक्ति — षष्ठी ‘नाम्’)
पदस्य विभक्तिः — करणे तृतीया एकवचन (‘आज्ञा से’)
समास का नाम कैसे तय होता है: पुस्तक ‘स्वाध्यायान्मा प्रमदः’ में स्वयं नियम देती है — ‘यस्याः विभक्तेः लोपं कृत्वा पदमेलनं भवति तन्नाम्ना एव तस्य तत्पुरुष-समासस्य नाम भवति।’ यहाँ विग्रह में ‘गुरुजनानाम्’ षष्ठी बहुवचन है और समास बनाते समय वही विभक्ति लुप्त हुई, अतः यह षष्ठीतत्पुरुष है। ध्यान रहे — समास का नाम पूरे पद की विभक्ति (यहाँ तृतीया) से नहीं, पूर्वपद की लुप्त विभक्ति से तय होता है।
पाठ का वाक्य: ‘अस्तु तावत् गुरुजनाज्ञया गच्छावः।’ — धर्मबुद्धि का यह उत्तर उसके चरित्र का पहला परिचय है : परदेश जाने को तैयार तो है, पर बड़ों की अनुमति के बिना नहीं। आगे कथा कहती है — ‘ततस्तौ गुरुजनानामनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।’
प्र2.
वनदेवता
उत्तर

विग्रहः — वनस्य देवता। (हिन्दी — वन की देवी / जंगल की अधिष्ठात्री देवता।)

समस्तपदम् — वनदेवता
विग्रहः — वनस्य देवता
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः (लुप्त विभक्ति — षष्ठी ‘स्य’)
लिङ्गम् — स्त्रीलिङ्गम् (देवता), प्रथमा एकवचन
उत्तरपद ही प्रधान है: तत्पुरुष समास में अर्थ का भार उत्तरपद पर होता है — ‘वनदेवता’ कोई वन नहीं, देवता है; वन केवल यह बताता है कि कौन-सी देवता। इसी कसौटी से इसे बहुव्रीहि से अलग कीजिए : यदि ‘वनदेवता’ का अर्थ ‘वह जिसकी देवता वन में हो’ होता, तब वह बहुव्रीहि होता — पर यहाँ ऐसा नहीं है।
कथा में इसकी भूमिका: धर्माधिकारी कहता है — ‘यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति।’ अर्थात् मनुष्य-साक्षी न मिलने पर दैव-साक्ष्य की पुरानी प्रथा। कथा इस प्रथा का मज़ाक नहीं उड़ाती, पर यह ज़रूर दिखा देती है कि छल इस प्रथा का दुरुपयोग कर सकता है — और अन्ततः सत्य विवेक से ही सामने आता है, चमत्कार से नहीं।
प्र3.
………………… — विग्रहः दत्तः : वित्तस्य अभावात्
उत्तर

समस्तपदम् — वित्ताभावात् (हिन्दी — धन के अभाव से / धन न होने के कारण।)

विग्रहः — वित्तस्य अभावात्
समस्तपदम् — वित्ताभावात् (वित्त + अभावात् → अ + अ = आ, दीर्घ सन्धि)
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः
विभक्तिः — हेतौ पञ्चमी (‘के कारण’)
यह उलटी दिशा वाला प्रश्न है: (क) और (ख) में समस्तपद दिया था और विग्रह बनाना था; यहाँ विग्रह दिया है और समस्तपद बनाना है — इसीलिए प्रश्न का शीर्षक ‘विग्रहं मेलनं वा कुरुत’ है। विधि सीधी है : विग्रह के पूर्वपद की विभक्ति (यहाँ ‘वित्तस्य’ की षष्ठी) हटाइए, प्रातिपदिक ‘वित्त’ बचाइए, और सन्धि करके उत्तरपद जोड़ दीजिए।
पाठ से मिलाइए: कथा में यही भाव दूसरे शब्द से आया है — ‘मम कुटुम्बे बहवः जनाः सन्ति, धनाभावात् कष्टम् अनुभवामि।’ ‘धनाभावात्’ = धनस्य अभावात् — बनावट बिलकुल वही है, केवल ‘वित्त’ के स्थान पर उसका पर्याय ‘धन’ है। दोनों शुद्ध हैं।
प्र4.
बुद्धिप्रभावेण
उत्तर

विग्रहः — बुद्धेः प्रभावेण। (हिन्दी — बुद्धि के प्रभाव से।)

समस्तपदम् — बुद्धिप्रभावेण
विग्रहः — बुद्धेः प्रभावेण
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः (लुप्त विभक्ति — षष्ठी)
‘बुद्धिः’ इकारान्त स्त्रीलिङ्गः → षष्ठी एकवचन बुद्धेः (मतिः → मतेः इव)
विग्रह लिखते समय यही एक जगह भूल होती है: विद्यार्थी प्रायः ‘बुद्धिस्य प्रभावेण’ लिख देते हैं। ‘बुद्धि’ इकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द है, इसलिए उसकी षष्ठी एकवचन बुद्धेः बनती है, ‘बुद्धिस्य’ नहीं। ‘-स्य’ केवल अकारान्त शब्दों में आता है (वन → वनस्य, राम → रामस्य)। समास खोलते समय पूर्वपद का शब्दरूप ठीक-ठीक लगाना ही असली परीक्षा है।
कथा से सम्बन्ध: मूल पाठ में मिलती-जुलती रचना आई है — ‘पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्।’ वहाँ विग्रह-रूप ही रखा गया है; समास बनाने पर वह ‘धर्मबुद्धिप्रभावेण’ हो जाता। दोनों को साथ रखकर पढ़िए, तो षष्ठीतत्पुरुष का ढाँचा अपने-आप बैठ जाएगा।
प्र5.
………………… — विग्रहः दत्तः : धरण्याः पीठे
उत्तर

समस्तपदम् — धरणीपीठे (हिन्दी — धरती पर / पृथ्वी के तल पर।)

विग्रहः — धरण्याः पीठे
समस्तपदम् — धरणीपीठे
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः (पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका स्वयं यही नाम देती है)
विभक्तिः — अधिकरणे सप्तमी, नपुंसकलिङ्ग एकवचन
‘धरण्याः’ से ‘धरणी’ कैसे बना: विग्रह में ‘धरणी’ की षष्ठी एकवचन ‘धरण्याः’ है (नदी → नद्याः के समान)। समास बनाते समय यह विभक्ति लुप्त होकर मूल प्रातिपदिक ‘धरणी’ बचता है, और वही ‘पीठ’ से जुड़ जाता है। इसीलिए समस्तपद में दीर्घ ‘ई’ बनी रहती है — ‘धरणिपीठे’ लिखना अशुद्ध होगा।
पाठ का प्रमाण: ‘भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥’ — यह पद पहले श्लोक में आया है और पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका उसका विग्रह, समास तथा विभक्ति तीनों देती है : ‘धरणीपीठे (षष्ठी तत्पुरुषः, नपुं.स.ए.व) — धरण्याः पीठे — धरती पर — On the earth’।
प्र6.
राजकुले
उत्तर

विग्रहः — राज्ञः कुले। (हिन्दी — राजा के कुल में / राजदरबार में।)

समस्तपदम् — राजकुले
विग्रहः — राज्ञः कुले
समासः — षष्ठीतत्पुरुषः
‘राजन्’ इति नकारान्तः पुंलिङ्गः → षष्ठी एकवचन राज्ञः; समासे तस्य ‘राज’ इति रूपम्
विभक्तिः — अधिकरणे सप्तमी एकवचन
समास में ‘राजन्’ का ‘राज’ क्यों हो जाता है: ‘राजन्’ नकारान्त शब्द है; समास में पूर्वपद के रूप में आने पर उसका अन्तिम ‘न्’ लुप्त हो जाता है — राजन् + पुरुषः = राजपुरुषः, राजन् + कुलम् = राजकुलम्, राजन् + पथः = राजपथः। यही रूप पाठ में भी है — ‘राजपुरुषाः नियमानुसारं पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।’
पाठ का वाक्य तथा एक सूचना: ‘तत्प्रयच्छ मे तदर्धम्। अन्यथा अहं राजकुले निवेदयिष्यामि।’ — अर्थात् ‘नहीं तो मैं राजदरबार में शिकायत करूँगा’। ध्यान दीजिए कि प्रश्न ६ के सभी छह पद षष्ठीतत्पुरुष ही हैं — उदाहरण ‘अर्थोपार्जनम् = अर्थस्य उपार्जनम्’ से लेकर अन्तिम ‘राजकुले’ तक। यह संयोग नहीं; पुस्तक जान-बूझकर एक ही समास को छह बार दोहराकर पक्का करा रही है।
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