शारदा अध्याय 7 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
सूर्यः चन्द्रः ………… अग्निः आकाशः भूमिः जलं ………… यमः दिवसः रात्रिः प्रभातं सायं च मनुष्याणां सर्वविधं ………… जानन्ति। अतः वयं सर्वदा उत्तमं व्यवहारं कुर्मः। (व्यवहारं / पवनः / हृदयं)
उत्तर

पूर्णं वाक्यम् — सूर्यः चन्द्रः पवनः अग्निः आकाशः भूमिः जलं हृदयं यमः दिवसः रात्रिः प्रभातं सायं च मनुष्याणां सर्वविधं व्यवहारं जानन्ति। अतः वयं सर्वदा उत्तमं व्यवहारं कुर्मः।

(हिन्दी — सूर्य, चन्द्रमा, पवन, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, प्रातःकाल और सायंकाल — ये सब मनुष्यों के सब प्रकार के व्यवहार को जानते हैं। इसलिए हम सदा उत्तम व्यवहार करें।)

रिक्तस्थानम्उत्तरम्श्लोक का कौन-सा पदक्यों यही
पहला — ‘चन्द्रः ___ अग्निः’पवनःअनिलःश्लोक का क्रम ही है — आदित्य, चन्द्र, अनिल, अनल; ‘अनिल’ का हिन्दी-सुलभ पर्याय ‘पवन’ है
दूसरा — ‘जलं ___ यमः’हृदयंहृदयम्श्लोक में ठीक यही क्रम है — ‘आपो हृदयं यमश्च’
तीसरा — ‘सर्वविधं ___ जानन्ति’व्यवहारंवृत्तम्‘वृत्तम्’ का अर्थ है आचरण; उसी का सरल पर्याय ‘व्यवहार’ बचा हुआ तीसरा पद है
तीनों पद कैसे तय हुए: यह प्रश्न पाठ के चौथे श्लोक ‘आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च…’ का सरल गद्य-रूपान्तर है। सबसे भरोसेमन्द विधि यह है कि दिए गए वाक्य और श्लोक को आमने-सामने रखकर मिलाया जाए — जो पद वाक्य में नहीं है, वही रिक्तस्थान का उत्तर है। ‘पवनः’ के लिए स्थान भी प्रमाण देता है : वह ‘चन्द्रः’ और ‘अग्निः’ के बीच है, ठीक वैसे ही जैसे श्लोक में ‘अनिलः’ ‘चन्द्र’ और ‘अनल’ के बीच है।
पर्यायों की जोड़ी याद रखिए: आदित्यः = सूर्यः · अनिलः = पवनः/वायुः · अनलः = अग्निः/वह्निः · द्यौः = आकाशः · आपः = जलम् · वृत्तम् = व्यवहारः/आचरणम्। परीक्षा में यही पर्याय पूछकर एक-अङ्क का प्रश्न बनाया जाता है।
प्र2.
यः ………… न अटति, विविधदेशानां संस्कृतीः ………… च न जानाति, पृथिवीपृष्ठे तस्य जन्म ………… भाति। (भाषाः / व्यर्थं / अन्यदेशेषु)
उत्तर

पूर्णं वाक्यम् — यः अन्यदेशेषु न अटति, विविधदेशानां संस्कृतीः भाषाः च न जानाति, पृथिवीपृष्ठे तस्य जन्म व्यर्थं भाति।

(हिन्दी — जो दूसरे देशों में नहीं घूमता और विविध देशों की संस्कृतियों तथा भाषाओं को नहीं जानता, पृथ्वी के तल पर उसका जन्म व्यर्थ ही जान पड़ता है।)

रिक्तस्थानम्उत्तरम्विभक्ति-सङ्केतश्लोक का आधार
‘यः ___ न अटति’अन्यदेशेषुसप्तमी बहुवचन — ‘अटति’ (घूमना) के साथ स्थान सप्तमी मेंदेशान्तरेषु
‘संस्कृतीः ___ च न जानाति’भाषाःद्वितीया बहुवचन — ‘संस्कृतीः’ के साथ समान विभक्ति चाहिएबहुविधभाषावेषादि
‘तस्य जन्म ___ भाति’व्यर्थंक्रियाविशेषण/विशेषण — ‘जन्म’ नपुंसकलिङ्ग के अनुरूपतस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्
विभक्ति ही उत्तर पकड़ा देती है: तीनों विकल्पों के रूप देखिए — ‘अन्यदेशेषु’ सप्तमी में है, ‘भाषाः’ प्रथमा/द्वितीया बहुवचन में और ‘व्यर्थं’ अव्यय-सा विशेषण। अब वाक्य में देखिए कि किस स्थान पर कौन-सी विभक्ति चाहिए : ‘न अटति’ के पहले स्थान चाहिए → सप्तमी; ‘संस्कृतीः … च’ में ‘च’ बता रहा है कि दूसरा पद भी उसी विभक्ति में होगा → ‘भाषाः’; बचा ‘व्यर्थम्’, जो ‘जन्म’ का विशेषण बनेगा। अर्थ बाद में देखिए, विभक्ति पहले — इस प्रकार के प्रश्न में यही सबसे तेज़ रास्ता है।
ध्यान दें: ‘संस्कृतीः’ ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग ‘संस्कृति’ का द्वितीया बहुवचन रूप है (संस्कृतिः → संस्कृतीः)। ‘भाषाः’ भी आकारान्त स्त्रीलिङ्ग का द्वितीया बहुवचन ही है (भाषा → भाषाः) — इसीलिए दोनों ‘च’ से ठीक जुड़ जाते हैं।
प्र3.
सज्जनाः सर्वासु नारीषु ………… इव, अन्येषां ………… मृत्पिण्डम् इव, सर्वेषु प्राणिषु च ………… इव चिन्तयन्ति। (द्रव्येषु / स्वयम् / मातरः)
उत्तर

पूर्णं वाक्यम् — सज्जनाः सर्वासु नारीषु मातरः इव, अन्येषां द्रव्येषु मृत्पिण्डम् इव, सर्वेषु प्राणिषु च स्वयम् इव चिन्तयन्ति।

(हिन्दी — सज्जन लोग सब स्त्रियों में माताओं के समान, दूसरों के धन में मिट्टी के ढेले के समान और सब प्राणियों में स्वयं अपने ही समान विचार करते हैं।)

रिक्तस्थानम्उत्तरम्श्लोक का पदभाव
‘सर्वासु नारीषु ___ इव’मातरःमातृवत् (= मातुः इव)पराई स्त्री माता के समान — काम पर संयम
‘अन्येषां ___ मृत्पिण्डम् इव’द्रव्येषुपरद्रव्येषु लोष्ठवत्पराया धन मिट्टी का ढेला — लोभ पर संयम
‘सर्वेषु प्राणिषु च ___ इव’स्वयम्आत्मवत्सर्वभूतेषुसब प्राणी अपने समान — अहंकार पर संयम
यह वाक्य तीसरे श्लोक का गद्य-रूप है: श्लोक में तीनों उपमाएँ ‘-वत्’ प्रत्यय से बनी थीं — मातृवत्, लोष्ठवत्, आत्मवत्। गद्य में ‘वत्’ के स्थान पर ‘इव’ आ गया है, इसलिए उससे पहले वाला पद अब प्रथमा में रहेगा — ‘मातरः इव’, ‘स्वयम् इव’। यही कारण है कि उत्तर ‘मातृवत्’ नहीं, ‘मातरः’ है। दूसरे रिक्तस्थान में ‘अन्येषां’ (षष्ठी बहुवचन) पहले से दिया है, इसलिए उसके साथ ‘द्रव्येषु’ (सप्तमी बहुवचन) ही बैठता है — ठीक जैसे ‘सर्वासु नारीषु’, ‘सर्वेषु प्राणिषु’।
‘मातरः’ बहुवचन क्यों: क्योंकि विशेष्य ‘सर्वासु नारीषु’ बहुवचन में है — एक नहीं, अनेक स्त्रियाँ। ‘मातृ’ का प्रथमा बहुवचन ‘मातरः’ होता है (मातृ → माता, मातरौ, मातरः)।
प्र4.
बुद्धिमान् मनुष्यः ………… मार्गान् समस्यादूरीकरणस्य ………… च ………… । (कौशलानि / कार्यसाधनस्य / जानीयात्)
उत्तर

पूर्णं वाक्यम् — बुद्धिमान् मनुष्यः कार्यसाधनस्य मार्गान् समस्यादूरीकरणस्य कौशलानिजानीयात्

(हिन्दी — बुद्धिमान् मनुष्य को काम बनाने के मार्ग तथा समस्या दूर करने के कौशल — दोनों जानने चाहिए।)

रिक्तस्थानम्उत्तरम्विभक्ति / रूपक्यों यही
‘मनुष्यः ___ मार्गान्’कार्यसाधनस्यषष्ठी एकवचन‘मार्गान्’ के साथ ‘किसके मार्ग’ चाहिए — सम्बन्धे षष्ठी
‘समस्यादूरीकरणस्य ___ च’कौशलानिनपुंसकलिङ्ग द्वितीया बहुवचन‘समस्यादूरीकरणस्य’ षष्ठी में है, अतः उसका आश्रयपद (‘किसके कौशल’) चाहिए; और वह ‘मार्गान्’ की तरह कर्म होगा
वाक्य का अन्तजानीयात्√ज्ञा, विधिलिङ् लकार, प्र.पु.ए.व.वाक्य में कोई क्रिया नहीं थी; ‘जानना चाहिए’ का भाव विधिलिङ् से आता है
यह वाक्य पाठ का शीर्षक ही खोलता है: ‘कार्यसाधनस्य मार्गान्’ = उपायः, और ‘समस्यादूरीकरणस्य कौशलानि’ = अपायात् रक्षणम्। अर्थात् यह वाक्य ‘उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्’ का ही सरल संस्कृत गद्य-रूप है। ‘च’ शब्द बताता है कि दोनों बातें साथ चाहिए — केवल एक से काम नहीं चलेगा; यही पापबुद्धि से हुई चूक थी।
विधिलिङ् क्यों, लट् क्यों नहीं: यहाँ बात यह नहीं हो रही कि बुद्धिमान् मनुष्य ‘जानता है’, बल्कि यह कि उसे ‘जानना चाहिए’ — यह कर्तव्य/उपदेश का भाव है, और वह विधिलिङ् लकार से आता है। इसी लकार में पाठ का शीर्षक-पद ‘चिन्तयेत्’ भी है। ‘जानाति’ लिखने पर वाक्य का उपदेशात्मक स्वर मर जाएगा।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ