शारदा अध्याय 7 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः।
उत्तर

वर्तमानकालिकवाक्यम् — राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डयन्ति

(हिन्दी — राजपुरुष पापबुद्धि को दण्ड देते हैं।)

भूतकालिकम् — दण्डितवन्तः (√दण्ड् + णिच् + क्तवतु, पुं.प्र.ब.व.)
वर्तमानकालिकम् — दण्डयन्ति (लट् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन)
कर्ता ‘राजपुरुषाः’ बहुवचने अस्ति, अतः क्रिया अपि बहुवचने।
नियम पहले, प्रयोग बाद में: क्तवतु-प्रत्ययान्त पद विशेषण की तरह चलता है, इसलिए वह कर्ता के लिङ्ग-वचन से मेल खाता है (राजपुरुषाः → दण्डितवन्तः)। जब उसे वर्तमानकाल में बदलते हैं, तब वह क्रियापद बन जाता है और अब उसे कर्ता के पुरुष तथा वचन से मिलना पड़ता है — ‘राजपुरुषाः’ प्रथमपुरुष बहुवचन है, अतः ‘दण्डयन्ति’। यही एक अन्तर पूरे प्रश्न ४ में लागू होता है।
ध्यान दें: ‘दण्ड्’ धातु का प्रयोग णिजन्त रूप में होता है — दण्डयति / दण्डयन्ति (दण्ड देता है / देते हैं)। ‘दण्डति’ लिखना अशुद्ध है।
प्र2.
पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादितवान्।
उत्तर

वर्तमानकालिकवाक्यम् — पापबुद्धिः अत्यधिकं धनं सम्पादयति

(हिन्दी — पापबुद्धि बहुत अधिक धन कमाता है।)

भूतकालिकम् — सम्पादितवान् (सम् + √पद् + णिच् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.)
वर्तमानकालिकम् — सम्पादयति (लट्, प्रथमपुरुष, एकवचन)
कर्ता ‘पापबुद्धिः’ एकवचने, अतः क्रिया अपि एकवचने।
‘-वान्’ बनाम ‘-वन्तः’ पर ध्यान दीजिए: (क) में कर्ता बहुवचन था तो ‘दण्डितवन्तः’, यहाँ कर्ता एकवचन है तो ‘सम्पादितवान्’। इसी सङ्केत से आप बिना अर्थ जाने भी बता सकते हैं कि वर्तमान क्रिया एकवचन में बनेगी या बहुवचन में — क्तवतु का रूप ही वचन बता देता है
कथा का सन्दर्भ: मूल पाठ में यह वाक्य है — ‘पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्’। अर्थात् धन उसने अपने बल पर नहीं, मित्र के प्रभाव से कमाया — और उसी मित्र को उसने ठगा। अभ्यास में ‘प्रभूतम्’ के स्थान पर ‘अत्यधिकम्’ रखा गया है; दोनों का अर्थ एक ही है — बहुत अधिक।
प्र3.
पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगतवान्।
उत्तर

वर्तमानकालिकवाक्यम् — पापबुद्धिः वनदेवतायाः समीपम् आगच्छति

(हिन्दी — पापबुद्धि वनदेवता के पास आता है।)

भूतकालिकम् — आगतवान् (आ + √गम् + क्तवतु, पुं.प्र.ए.व.)
वर्तमानकालिकम् — आगच्छति (आ + √गम्, लट्, प्र.पु.ए.व.)
√गम् धातोः लट्-लकारे ‘गच्छ्’ इति आदेशः भवति — गच्छति, आगच्छति।
धातु का रूप बदलता है, अर्थ नहीं: ‘गम्’ धातु लट् लकार में ‘गच्छ्’ हो जाती है (शप् विकरण के साथ ‘इषुगमियमां छः’ नियम से), इसलिए ‘गमति’ नहीं, गच्छति बनता है। भूतकाल के क्तवतु-रूप में यह परिवर्तन नहीं होता — वहाँ मूल ‘गत’ ही रहता है (गतवान्, आगतवान्)। यही कारण है कि दोनों रूप देखने में इतने अलग लगते हैं।
‘समीपम्’ का प्रयोग: ‘समीपम्’ के योग में सम्बन्धवाची पद षष्ठी में आता है — ‘वनदेवताया समीपम्’। इसी प्रकार ‘गृहस्य समीपम्’, ‘नद्याः समीपम्’। ‘समीपे’ (सप्तमी) भी शुद्ध है, तब अर्थ ‘पास में’ होगा, ‘पास की ओर’ नहीं।
प्र4.
अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् उक्तवान्।
उत्तर

वर्तमानकालिकवाक्यम् — अत्रान्तरे पापबुद्धिः शिरस्ताडयन् वदति

(हिन्दी — इसी बीच पापबुद्धि सिर पीटता हुआ कहता है।) — ‘ब्रवीति’ अथवा ‘कथयति’ भी शुद्ध हैं।

भूतकालिकम् — उक्तवान् (√वच् + क्तवतु; ‘वच्’ धातोः ‘उक्त’ इति रूपम्)
वर्तमानकालिकम् — वदति (√वद्, लट्, प्र.पु.ए.व.)
‘शिरस्ताडयन्’ इति शतृ-प्रत्ययान्त पदं यथावत् एव तिष्ठति — तत् कालं न सूचयति, अपि तु ‘साथ-साथ चलने वाली क्रिया’ सूचयति।
‘शिरस्ताडयन्’ को क्यों नहीं बदला: यही इस प्रश्न की परीक्षा है। ‘-अन्’ पर समाप्त होने वाला यह शतृ प्रत्ययान्त पद (ताडयत् → ताडयन्) मुख्य क्रिया के साथ-साथ होने वाली क्रिया बताता है — ‘पीटता हुआ’। इसका अपना कोई काल नहीं होता; वह मुख्य क्रिया से ही काल लेता है। इसलिए मुख्य क्रिया बदलिए, यह पद ज्यों का त्यों रहने दीजिए।
धातु-रूप की सावधानी: √वच् का लट् में रूप ‘वक्ति’ बनता है, जो सामान्य प्रयोग में विरल है; व्यवहार में ‘वदति’ (√वद्) या ‘ब्रवीति’ (√ब्रू) लिखा जाता है। ‘उक्तवान्’ का स्वाभाविक वर्तमान-प्रतिरूप वदति ही है।
प्र5.
सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः।
उत्तर

वर्तमानकालिकवाक्यम् — सर्वे जनाः धर्मबुद्धिं प्रशंसन्ति

(हिन्दी — सब लोग धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हैं।)

भूतकालिकम् — प्रशंसितवन्तः (प्र + √शंस् + क्तवतु, पुं.प्र.ब.व.)
वर्तमानकालिकम् — प्रशंसन्ति (प्र + √शंस्, लट्, प्र.पु.ब.व.)
‘धर्मबुद्धिम्’ — कर्मणि द्वितीया (संस्कृते ‘प्रशंसा करना’ सकर्मक क्रिया अस्ति)
हिन्दी और संस्कृत की रचना में अन्तर: हिन्दी में हम कहते हैं ‘धर्मबुद्धि की प्रशंसा करते हैं’ — यहाँ सम्बन्ध-कारक दिखता है। संस्कृत में ‘प्रशंसन्ति’ सीधी सकर्मक क्रिया है, इसलिए वहाँ कर्म द्वितीया में आएगा — ‘धर्मबुद्धिम् प्रशंसन्ति’, ‘धर्मबुद्धेः’ नहीं। हिन्दी की छाया में अनुवाद करने पर यही भूल सबसे अधिक होती है।
पाँचों उत्तर एक साथ — (क) दण्डयन्ति · (ख) सम्पादयति · (ग) आगच्छति · (घ) वदति · (ङ) प्रशंसन्ति। जाँच का सरल तरीका : हर वाक्य में कर्ता देखिए और गिनिए — एक है तो ‘-ति’, अनेक हैं तो ‘-न्ति’।
क्या यह उपयोगी रहा? त्रुटि बताएँ