शारदा अध्याय 7 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति इति लिखत — (क) वत्स ! द्रुतं वद येन तद् द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्। (ख) प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। (ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। (घ) भोः दुरात्मन् ! मा मैवं वद। (ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्।
उत्तर
क्रमःवाक्यम्कः (वक्ता)कं प्रति (श्रोता)प्रसङ्गः
(क)वत्स! द्रुतं वद येन तद् द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्।पापबुद्धेः पितापापबुद्धिं प्रतिरात में पुत्र घर आकर चोरी की बात बताता है; व्याकुल पिता झट पूछता है कि धन कैसे टिकेगा
(ख)प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्।धर्माधिकारीधर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च (द्वौ) प्रतिसाक्षी न मिलने पर वनदेवता से निर्णय कराने का आदेश
(ग)त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन।पापबुद्धिःधर्मबुद्धिं प्रतिघड़ा खाली मिलने पर सिर पीटते हुए झूठा आरोप
(घ)भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद।धर्मबुद्धिःपापबुद्धिं प्रतिआरोप का प्रतिवाद — ‘धर्मबुद्धिः खल्वहम्’
(ङ)एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्।पापबुद्धेः पितासर्वान् जनान् (धर्माधिकारिणं सामाजिकांश्च) प्रतिकोटर से जलकर बाहर निकलते हुए अन्तिम सत्य-वचन, और वह मर जाता है

पूर्णवाक्येन उत्तराणि —

  • (क) पापबुद्धेः पिता पापबुद्धिं प्रति कथयति। (पिता अपने पुत्र से कहता है।)
  • (ख) धर्माधिकारी धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च प्रति कथयति। (न्यायाधीश दोनों मित्रों से कहता है।)
  • (ग) पापबुद्धिः धर्मबुद्धिं प्रति कथयति। (पापबुद्धि धर्मबुद्धि से कहता है।)
  • (घ) धर्मबुद्धिः पापबुद्धिं प्रति कथयति। (धर्मबुद्धि पापबुद्धि से कहता है।)
  • (ङ) पापबुद्धेः पिता सर्वान् जनान् प्रति कथयति। (पापबुद्धि का पिता वहाँ उपस्थित सब लोगों से कहता है।)
वक्ता पहचानने की तीन कुंजियाँ: (१) सम्बोधन — वाक्य में जो सम्बोधन है, वही श्रोता है और उससे वक्ता का सम्बन्ध खुल जाता है। ‘वत्स!’ पिता ही कहेगा; ‘दुरात्मन्!’ वही कहेगा जिस पर झूठा आरोप लगा है। (२) पुरुष तथा वचन —युवाम्अस्माभिः … गच्छतम्’ — ‘युवाम्’ मध्यमपुरुष द्विवचन है, अर्थात् श्रोता दो हैं; और ‘अस्माभिः’ बताता है कि वक्ता अपने साथ किसी दल की बात कर रहा है — यह धर्माधिकारी ही हो सकता है। (३) विषय — ‘पापबुद्धेः चेष्टितम्’ में पापबुद्धि का नाम तीसरे व्यक्ति की तरह आया है, अतः वक्ता स्वयं पापबुद्धि नहीं हो सकता।
(घ) का व्याकरण: ‘मा मैवं वद’ = मा + मा + एवम् + वद। ‘मा’ निषेधार्थक अव्यय है और इसका प्रयोग सदा लोट्/लुङ् के साथ होता है (‘मा वद’ = मत बोलो)। यहाँ ‘मा’ दो बार आया है — यह आवृत्ति से आया बल है, अर्थात् ‘बिलकुल मत बोलो, कभी ऐसा मत कहो’। धर्मबुद्धि का क्रोध और पीड़ा दोनों इसी दोहराव में हैं।
(ग) की सूक्ष्म बात: कथा में यह वाक्य ‘त्वयैवापहृतम् एतद्धनं, नान्येन’ रूप में छपा है (त्वया + एव + अपहृतम्), जबकि अभ्यास में उसे सरल करके ‘त्वया हृतम्’ कर दिया गया है। दोनों का अर्थ एक ही है; ‘एव’ हट जाने से केवल बल कम हुआ है।
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