प्र1.
अधोलिखितानि वाक्यानि कः कं प्रति कथयति इति लिखत — (क) वत्स ! द्रुतं वद येन तद् द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्। (ख) प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। (ग) त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। (घ) भोः दुरात्मन् ! मा मैवं वद। (ङ) एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्।
उत्तर
| क्रमः | वाक्यम् | कः (वक्ता) | कं प्रति (श्रोता) | प्रसङ्गः |
|---|---|---|---|---|
| (क) | वत्स! द्रुतं वद येन तद् द्रव्यं स्थिरं तिष्ठेत्। | पापबुद्धेः पिता | पापबुद्धिं प्रति | रात में पुत्र घर आकर चोरी की बात बताता है; व्याकुल पिता झट पूछता है कि धन कैसे टिकेगा |
| (ख) | प्रातःकाले युवामस्माभिः सह तत्र वनप्रदेशं गच्छतम्। | धर्माधिकारी | धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च (द्वौ) प्रति | साक्षी न मिलने पर वनदेवता से निर्णय कराने का आदेश |
| (ग) | त्वया हृतम् एतद्धनं, नान्येन। | पापबुद्धिः | धर्मबुद्धिं प्रति | घड़ा खाली मिलने पर सिर पीटते हुए झूठा आरोप |
| (घ) | भोः दुरात्मन्! मा मैवं वद। | धर्मबुद्धिः | पापबुद्धिं प्रति | आरोप का प्रतिवाद — ‘धर्मबुद्धिः खल्वहम्’ |
| (ङ) | एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। | पापबुद्धेः पिता | सर्वान् जनान् (धर्माधिकारिणं सामाजिकांश्च) प्रति | कोटर से जलकर बाहर निकलते हुए अन्तिम सत्य-वचन, और वह मर जाता है |
पूर्णवाक्येन उत्तराणि —
- (क) पापबुद्धेः पिता पापबुद्धिं प्रति कथयति। (पिता अपने पुत्र से कहता है।)
- (ख) धर्माधिकारी धर्मबुद्धिं पापबुद्धिं च प्रति कथयति। (न्यायाधीश दोनों मित्रों से कहता है।)
- (ग) पापबुद्धिः धर्मबुद्धिं प्रति कथयति। (पापबुद्धि धर्मबुद्धि से कहता है।)
- (घ) धर्मबुद्धिः पापबुद्धिं प्रति कथयति। (धर्मबुद्धि पापबुद्धि से कहता है।)
- (ङ) पापबुद्धेः पिता सर्वान् जनान् प्रति कथयति। (पापबुद्धि का पिता वहाँ उपस्थित सब लोगों से कहता है।)
वक्ता पहचानने की तीन कुंजियाँ: (१) सम्बोधन — वाक्य में जो सम्बोधन है, वही श्रोता है और उससे वक्ता का सम्बन्ध खुल जाता है। ‘वत्स!’ पिता ही कहेगा; ‘दुरात्मन्!’ वही कहेगा जिस पर झूठा आरोप लगा है। (२) पुरुष तथा वचन — ‘युवाम् … अस्माभिः … गच्छतम्’ — ‘युवाम्’ मध्यमपुरुष द्विवचन है, अर्थात् श्रोता दो हैं; और ‘अस्माभिः’ बताता है कि वक्ता अपने साथ किसी दल की बात कर रहा है — यह धर्माधिकारी ही हो सकता है। (३) विषय — ‘पापबुद्धेः चेष्टितम्’ में पापबुद्धि का नाम तीसरे व्यक्ति की तरह आया है, अतः वक्ता स्वयं पापबुद्धि नहीं हो सकता।
(घ) का व्याकरण: ‘मा मैवं वद’ = मा + मा + एवम् + वद। ‘मा’ निषेधार्थक अव्यय है और इसका प्रयोग सदा लोट्/लुङ् के साथ होता है (‘मा वद’ = मत बोलो)। यहाँ ‘मा’ दो बार आया है — यह आवृत्ति से आया बल है, अर्थात् ‘बिलकुल मत बोलो, कभी ऐसा मत कहो’। धर्मबुद्धि का क्रोध और पीड़ा दोनों इसी दोहराव में हैं।
(ग) की सूक्ष्म बात: कथा में यह वाक्य ‘त्वयैवापहृतम् एतद्धनं, नान्येन’ रूप में छपा है (त्वया + एव + अपहृतम्), जबकि अभ्यास में उसे सरल करके ‘त्वया हृतम्’ कर दिया गया है। दोनों का अर्थ एक ही है; ‘एव’ हट जाने से केवल बल कम हुआ है।