शारदा अध्याय 7 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
एनम् अपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि।
उत्तर

प्रश्ननिर्माणम् — कम् अपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि ?

(हिन्दी — किसको भी ठगकर सुखी होता हूँ ? — अर्थात् ‘एनम्’ के स्थान पर उसी विभक्ति-वचन का प्रश्नवाचक ‘कम्’ रखा गया।)

स्थूलपदम् — एनम् (एतद्/इदम् इत्यस्य द्वितीया · एकवचन · पुंलिङ्ग)
तत्स्थाने प्रश्नवाचकम् — किम् इत्यस्य द्वितीया एकवचन पुंलिङ्ग = कम्
शेषं वाक्यं यथावत् एव तिष्ठति।
प्रश्ननिर्माण का एक ही नियम है: जिस पद पर प्रश्न बनाना है, उसे हटाइए और उसी लिङ्ग · विभक्ति · वचन का प्रश्नवाचक सर्वनाम वहीं रख दीजिए; वाक्य का शेष भाग बिलकुल न छेड़िए। ‘एनम्’ पुंलिङ्ग द्वितीया एकवचन है (यह ‘एतद्’ का ही अन्वादेश-रूप है), अतः ‘कम्’ आएगा — ‘कः’ या ‘केन’ नहीं।
ध्यान दें: ‘एनम्’ का प्रयोग तभी होता है जब उस व्यक्ति की चर्चा पहले हो चुकी हो — यहाँ धर्मबुद्धि की। इसीलिए अनुवाद में ‘इसको भी’ आता है, ‘किसी को’ नहीं।
प्र2.
सर्वं धनं स्वीकृत्य स्वग्रामं गच्छावः।
उत्तर

प्रश्ननिर्माणम् — सर्वं धनं स्वीकृत्य कुत्र गच्छावः ?

(हिन्दी — सारा धन लेकर हम दोनों कहाँ जाएँ ?)

स्थूलपदम् — स्वग्रामम् (स्थानवाचकम्, कर्मणि द्वितीया — गन्तव्य स्थान)
स्थानस्य प्रश्नवाचकम् अव्ययम् — कुत्र (कहाँ)
वैकल्पिकम् — कं ग्रामं गच्छावः ? (यदि ‘ग्राम’ शब्द पर ही बल देना हो)
दोनों में से कौन-सा उत्तर लिखें: जब स्थूल पद कोई स्थान हो, तब सामान्यतः कुत्र ही सबसे उपयुक्त प्रश्नवाचक है, क्योंकि वह अव्यय है और विभक्ति की झंझट नहीं आती। यदि प्रश्न विशेष रूप से ‘कौन-सा गाँव’ पूछना चाहे, तब ‘कं ग्रामम्’ भी शुद्ध है। परीक्षा में ‘कुत्र’ लिखिए और चाहें तो कोष्ठक में दूसरा विकल्प जोड़ दीजिए।
व्याकरण: ‘गच्छावः’ — √गम्, लट् लकार, उत्तमपुरुष द्विवचन (‘हम दोनों जाते हैं / चलें’)। पूरे पाठ में द्विवचन के रूप बार-बार आते हैं, क्योंकि पात्र दो ही हैं — गच्छावः, कुर्वः, प्रविशावः, आनयावः, आवाम्, आवाभ्याम्।
प्र3.
निशीथे अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तम् आनीतवान्।
उत्तर

प्रश्ननिर्माणम् — कदा अटव्यां गत्वा तत् सर्वं वित्तम् आनीतवान् ?

(हिन्दी — कब जंगल में जाकर वह सारा धन ले आया ?)

स्थूलपदम् — निशीथे (कालवाचकम्, अधिकरणे सप्तमी — ‘आधी रात में’)
कालस्य प्रश्नवाचकम् अव्ययम् — कदा (कब)
वैकल्पिकम् — कस्मिन् काले अटव्यां गत्वा … ?
पहचान का सूत्र: स्थूल पद यदि समय बताता है तो ‘कदा’, यदि स्थान बताता है तो ‘कुत्र’, यदि कारण बताता है तो ‘कुतः/किमर्थम्’, और यदि ढंग बताता है तो ‘कथम्’। ‘निशीथे’ का अर्थ पुस्तक स्वयं देती है — ‘अर्धरात्रे’ — इसलिए यह स्पष्ट रूप से कालवाचक है और उत्तर ‘कदा’ ही होगा।
जोड़कर देखिए: यही वाक्य कथा में कुछ बदले रूप में आया है — ‘पापबुद्धिः निशीथे अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।’ अभ्यास में उसे सरल करके ‘आनीतवान्’ कर दिया गया है। ‘आनीतवान्’ क्तवतु-प्रत्ययान्त है — आ + √नी + क्तवतु।
प्र4.
तत् आकर्ण्य सर्वे ते जनाः विस्मयोत्फुल्ललोचनाः सञ्जाताः।
उत्तर

प्रश्ननिर्माणम् — तत् आकर्ण्य सर्वे ते जनाः कीदृशाः सञ्जाताः ?

(हिन्दी — वह सुनकर वे सब लोग कैसे हो गए ?)

स्थूलपदम् — विस्मयोत्फुल्ललोचनाः (विशेषणम्, बहुव्रीहि समासः, पुं.प्र.ब.व.)
विग्रहः — विस्मयेन उत्फुल्लानि लोचनानि येषां ते
विशेषणस्य प्रश्नवाचकम् — कीदृशाः (पुंलिङ्ग · प्रथमा · बहुवचन)
‘कीदृश’ का रूप विशेष्य से मिलाइए: ‘कीदृश’ स्वयं विशेषण है, इसलिए वह भी विशेष्य ‘जनाः’ (पुंलिङ्ग, प्रथमा, बहुवचन) के अनुसार कीदृशाः बनेगा — ‘कीदृशः’ (एकवचन) या ‘कीदृशी’ (स्त्रीलिङ्ग) लिखना अशुद्ध होगा। यही नियम पुस्तक ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में ‘विशेषणानि विशेष्याणि च’ शीर्षक से पढ़ा चुकी है।
समास पहचानिए: ‘उत्फुल्ललोचनाः’ बहुव्रीहि है — इसका अर्थ न ‘उत्फुल्ल’ है न ‘लोचन’, बल्कि वे लोग जिनकी आँखें फैल गई हों। अर्थात् समास किसी तीसरे पद (अन्यपद) का बोध कराता है — यही बहुव्रीहि की पहचान है। इसी पाठ का दूसरा बहुव्रीहि है ‘स्फुटितेक्षणः’ (जिसकी आँखें फूट गई हों) तथा ‘प्रहृष्टमनाः’ (जिसका मन प्रसन्न हो)।
प्र5.
अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निना प्रज्वालयामि।
उत्तर

प्रश्ननिर्माणम् — अहम् एतत् शमीकोटरं केन प्रज्वालयामि ?

(हिन्दी — मैं इस शमी वृक्ष के कोटर को किससे जलाता हूँ ?)

स्थूलपदम् — वह्निना (करणे तृतीया · एकवचन · पुंलिङ्ग)
नियमः — «साधकतमं करणम्» — जिस साधन से क्रिया की जाए, उसमें तृतीया
तत्स्थाने प्रश्नवाचकम् — केन (किम् इत्यस्य तृतीया एकवचन)
‘केन’ ही क्यों, ‘कथम्’ क्यों नहीं: ‘कथम्’ का उत्तर ढंग होता है (कैसे — दौड़कर, धीरे-धीरे), जबकि यहाँ स्थूल पद एक साधन है — आग। साधन के लिए तृतीया आती है और उसका प्रश्नवाचक ‘केन’ (पुं./नपुं.) या ‘कया’ (स्त्री.) होता है। जैसे — ‘सः लेखन्या लिखति’ → ‘सः कया लिखति ?’
पाठ का पूरा वाक्य: ‘अहम् एतत् शमीकोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालयामि।’ यहाँ ‘वह्निभोज्यद्रव्यैः’ भी तृतीया बहुवचन में है (जलने योग्य वस्तुओं से) — अर्थात् एक ही वाक्य में करण-तृतीया दो बार आई है। यह वाक्य ध्यान से पढ़िए; इसी में कथा का निर्णायक मोड़ है।
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