शारदा अध्याय 7 अभ्यासाद् जायते सिद्धिः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
नरस्य वृत्तं के जानन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — आदित्यः, चन्द्रः, अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः, आपः, हृदयम्, यमः, अहः, रात्रिः, उभे संध्ये, धर्मः च — एते सर्वे नरस्य वृत्तं जानन्ति।

(हिन्दी — सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ तथा धर्म — ये सब मनुष्य के आचरण को जानते हैं।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८३) —
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
उत्तर कैसे बनाया गया: प्रश्न में ‘के’ है — यह ‘किम्’ का पुंलिङ्ग · प्रथमा · बहुवचन रूप है, अतः उत्तर में अनेक कर्ता प्रथमा बहुवचन में चाहिए और क्रिया भी बहुवचन में — ‘जानन्ति’। श्लोक में छन्द के कारण एकवचन क्रिया ‘जानाति’ आई है (अन्तिम कर्ता ‘धर्मः’ के साथ मेल), किन्तु गद्य में पूरे वाक्य के लिए ‘जानन्ति’ लिखना ही शुद्ध है।
ध्यान दें: श्लोक के सन्धियुक्त पदों को खोलकर लिखिए, वरना उत्तर अशुद्ध हो जाएगा — ‘आदित्यचन्द्रौ’ = आदित्यः + चन्द्रः (द्वन्द्व समास, द्विवचन), ‘द्यौर्भूमिरापः’ = द्यौः + भूमिः + आपः। यह श्लोक इसी पाठ के प्रश्न ५ (क) में भी लौटकर आया है।
प्र2.
धर्मबुद्धयः किं वीक्षन्ते ?
उत्तर

उत्तरम् — धर्मबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।

(हिन्दी — धर्मबुद्धि वाले लोग पराई स्त्रियों को माता के समान, पराए धन को मिट्टी के ढेले के समान और सब प्राणियों को अपने ही समान देखते हैं।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८२) —
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥
तीनों उपमाएँ एक ही सीढ़ी हैं: पहली उपमा काम पर संयम सिखाती है, दूसरी लोभ पर, और तीसरी अहंकार पर — क्योंकि जो सबको अपने समान देखता है, वह किसी को छोटा नहीं समझ सकता। कथा में धर्मबुद्धि यही श्लोक तब पढ़ता है जब पापबुद्धि उस पर चोरी का आरोप लगाता है — अर्थात् वह अपने बचाव में सफ़ाई नहीं देता, अपना सिद्धान्त रखता है।
व्याकरण: ‘वीक्षन्ते’ आत्मनेपदी क्रिया है (वि + √ईक्ष्), लट् लकार, प्रथमपुरुष, बहुवचन — इसीलिए ‘-न्ते’। ‘मातृवत्’, ‘लोष्ठवत्’, ‘आत्मवत्’ — तीनों वति-प्रत्ययान्त अव्यय हैं; अव्यय होने के कारण इनका रूप कभी नहीं बदलता।
प्र3.
कस्य जन्मनः फलं व्यर्थम् ?
उत्तर

उत्तरम् — येन धरणीपीठे भ्रमता अपि देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यर्थम् (भवति)।

(हिन्दी — धरती पर घूमते हुए भी जिसने दूसरे देशों की अनेक प्रकार की भाषाओं, वेशभूषा आदि को नहीं जाना, उसके जन्म का फल व्यर्थ होता है।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८०) —
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥
‘कस्य’ का उत्तर कैसे दें: प्रश्न षष्ठी एकवचन में है, इसलिए उत्तर भी ‘तस्य’ (षष्ठी एकवचन) से जुड़ना चाहिए। सबसे सुरक्षित विधि यह है कि श्लोक के ‘येन … तस्य’ वाले यत्-तत् ढाँचे को ज्यों का त्यों रखकर वाक्य पूरा कर दिया जाए — तब न विभक्ति बिगड़ेगी, न अर्थ।
बारीकी: ध्यान रखिए कि श्लोक उन लोगों की निन्दा नहीं करता जो घर से नहीं निकले; वह उनकी निन्दा करता है जो ‘भ्रमता’ — घूमते हुए भी — कुछ न सीखे। इसीलिए उत्तर में ‘भ्रमता अपि’ लिखना अर्थ को और स्पष्ट कर देता है।
प्र4.
पापबुद्धिः स्वपितरं किम् उक्तवान् ?
उत्तर

उत्तरम् — पापबुद्धिः स्वपितरम् उक्तवान् — “तात! मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः। भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति, अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्यति।” अपि च सः पितरं वनप्रदेशे स्थितस्य महाशमीवृक्षस्य महाकोटरे प्रवेष्टुं, प्रभाते च ‘धर्मबुद्धिः चौरः’ इति वक्तुम् आदिष्टवान्।

(हिन्दी — पापबुद्धि ने अपने पिता से कहा — ‘पिताजी! मैंने धर्मबुद्धि का बहुत-सा धन चुरा लिया है। यदि आप मेरे कहे अनुसार बोलेंगे तो वह धन मेरे पास टिका रहेगा, नहीं तो हमारे प्राणों के साथ ही चला जाएगा।’ आगे उसने पिता से कहा कि वे वन में स्थित महाशमी वृक्ष के बड़े कोटर में अभी जाकर बैठ जाएँ और सवेरे जब वह सत्य-श्रवण के लिए निवेदन करे, तब कह दें कि ‘धर्मबुद्धि चोर है’।)

क्रमःपापबुद्धेः वचनम्उसका आशय
मया धर्मबुद्धेः प्रभूतः अर्थः चोरितः।पिता के सामने वह अपना अपराध खुलकर मानता है — अर्थात् उसे अपने पाप का पूरा ज्ञान है
भवान् यदि मदुक्तप्रकारेण वदति तर्हि तद्धनं मयि स्थिरं तिष्ठति।झूठी गवाही की माँग, वह भी लालच दिखाकर
अन्यथास्माकं प्राणैः सह यास्यति।भय दिखाना — ‘नहीं तो हम प्राणों से भी जाएँगे’
अस्ति वनप्रदेशे महाशमी नाम वृक्षः। तस्मिन् महाकोटरम् अस्ति। तत्र भवान् साम्प्रतमेव प्रविशतु।छिपने का पूरा प्रबन्ध — ‘अभी जाकर बैठ जाइए’
तदा भवता वक्तव्यं यद् धर्मबुद्धिः चौर इति।क्या बोलना है, यह भी सिखा दिया
यह प्रसंग कथा का केन्द्र क्यों है: यहीं पापबुद्धि का ‘उपाय’ पूरा होता है — और यहीं उसका ‘अपाय’ जन्म लेता है। उसने सोचा कि लकड़ी के कोटर में बैठा पिता सुरक्षित रहेगा; उसने यह नहीं सोचा कि सूखा कोटर आग पकड़ता है। इसीलिए अन्त में सब लोग कहते हैं — ‘पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः’।
व्याकरण-सङ्केत: ‘उक्तवान्’ क्तवतु-प्रत्ययान्त पद है (√वच् → उक्तवान्), जो भूतकाल कर्तरि में आता है और कर्ता ‘पापबुद्धिः’ पुंलिङ्ग एकवचन होने से ‘-वान्’ रूप में है। ‘मदुक्तप्रकारेण’ = मया उक्तः प्रकारः, तेन — तृतीया विभक्ति ‘जिस ढंग से’ के अर्थ में।
प्र5.
प्राज्ञः किं-किं चिन्तयेत् ?
उत्तर

उत्तरम् — प्राज्ञः उपायं चिन्तयेत्, तथा अपायं च चिन्तयेत्।

(हिन्दी — बुद्धिमान् मनुष्य को उपाय सोचना चाहिए और साथ ही उससे आने वाली हानि भी सोचनी चाहिए।)

आधार-सूक्तिः (पृष्ठ ८४) — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।
यही पाठ का शीर्षक है।
‘किं-किम्’ क्यों दोहराया गया: संस्कृत में किसी प्रश्नवाचक शब्द की आवृत्ति का अर्थ होता है ‘एक-एक करके सब’ — जैसे ‘कः-कः आगतः ?’ = कौन-कौन आया ? इसलिए ‘किं-किं चिन्तयेत्’ पूछने का अर्थ है कि उत्तर में एक नहीं, दो वस्तुएँ चाहिए। यदि केवल ‘उपायम्’ लिख दिया तो आधा उत्तर ही हुआ — और मज़े की बात यह है कि पापबुद्धि की भूल भी ठीक यही थी।
शब्द-रचना पकड़ लीजिए: दोनों शब्द एक ही धातु √इ (जाना) से बने हैं — उप + आय = पास लाने वाला मार्ग, साधन; अप + आय = दूर ले जाने वाला मार्ग, हानि। उपसर्ग बदलते ही अर्थ उलट गया। यही जोड़ी ‘प्रयोग/अपप्रयोग’, ‘मान/अपमान’, ‘यश/अपयश’ में भी दिखती है।
प्र6.
मानवः कदा विद्यां वित्तं शिल्पं च प्राप्नोति ?
उत्तर

उत्तरम् — मानवः तदा एव विद्यां वित्तं शिल्पं च सम्यक् प्राप्नोति, यदा सः हृष्टः (सन्) भूमौ देशात् देशान्तरं व्रजति।

(हिन्दी — मनुष्य विद्या, धन तथा कला को तभी भली-भाँति पाता है, जब वह प्रसन्न मन से पृथ्वी पर एक देश से दूसरे देश की यात्रा करता है।)

आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८०) —
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक्।
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥
दो निषेधों को एक विधान में बदलिए: श्लोक कहता है ‘तावत् आप्नोति … यावत् व्रजति’ — अर्थात् ‘तब तक नहीं पाता, जब तक नहीं जाता’। ‘कदा’ (कब) का उत्तर देते समय इस दोहरे निषेध को सीधे विधान में पलट दीजिए — ‘तदा एव प्राप्नोति यदा व्रजति’। गणित की तरह : दो नकार मिलकर हाँ बनाते हैं। यही अनुवाद की सबसे आम भूल है, इसलिए इसे यहीं पकड़ लीजिए।
‘हृष्टः’ को मत छोड़िए: श्लोक केवल यात्रा नहीं कहता, प्रसन्न मन से की गई यात्रा कहता है। मन मारकर की गई यात्रा न विद्या देती है, न कौशल। उत्तर में यह पद रखने से अर्थ पूरा होता है।
प्र7.
पापबुद्धिः किं चिन्तयित्वा देशान्तरं प्रस्थितः ?
उत्तर

उत्तरम् — पापबुद्धिः एवं चिन्तयित्वा देशान्तरं प्रस्थितः — “अहं तावान् मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च। अत एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि” इति।

(हिन्दी — पापबुद्धि ने यह सोचकर परदेश के लिए प्रस्थान किया — ‘मैं इतना मूर्ख हूँ और दरिद्रता से पीड़ित भी। इसलिए इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर दूसरे देश जाता हूँ; वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा और उसके बाद इसे भी ठगकर सुखी हो जाऊँगा।’)

चरणःपापबुद्धेः विचारःवह क्या दिखाता है
अहं तावान् मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च।आत्म-स्वीकृति — वह अपनी दरिद्रता जानता है और अपनी मूर्खता भी
एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य अन्यं देशं गच्छामि।मित्रता को साधन बनाना — यहीं छल का बीज है
तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि।वह जानता है कि कमाई धर्मबुद्धि के प्रभाव से होगी, अपनी योग्यता से नहीं
अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि।पहले दिन से ही ठगने की योजना — यात्रा उद्देश्य नहीं, बहाना है
कथा का सबसे बड़ा सन्देश यहीं छिपा है: पापबुद्धि की योजना का पहला भाग पूरी तरह सफल रहा — वह परदेश गया, धन भी कमाया। भूल दूसरे भाग में हुई, जहाँ उसने ‘वञ्चयित्वा सुखी भवामि’ सोचा। अर्थात् उसका उपाय तो चला, पर उसने यह नहीं सोचा कि छल का अपाय क्या होगा। पूरा पाठ इसी एक वाक्य का विस्तार है।
व्याकरण: ‘चिन्तयित्वा’, ‘स्वीकृत्य’, ‘वञ्चयित्वा’ — तीनों पूर्वकालिक कृदन्त हैं। ‘स्वीकृत्य’ में उपसर्ग होने से ल्यप् लगा (स्वी + √कृ + ल्यप्), शेष दोनों में उपसर्ग न होने से क्त्वा। ‘प्रस्थितः’ क्त-प्रत्ययान्त (प्र + √स्था) है, जो कर्ता ‘पापबुद्धिः’ के अनुसार पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन में है।
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