उत्तरम् — आदित्यः, चन्द्रः, अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः, आपः, हृदयम्, यमः, अहः, रात्रिः, उभे संध्ये, धर्मः च — एते सर्वे नरस्य वृत्तं जानन्ति।
(हिन्दी — सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ तथा धर्म — ये सब मनुष्य के आचरण को जानते हैं।)
आधार-श्लोकः (पृष्ठ ८३) —
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
उत्तर कैसे बनाया गया: प्रश्न में ‘के’ है — यह ‘किम्’ का पुंलिङ्ग · प्रथमा · बहुवचन रूप है, अतः उत्तर में अनेक कर्ता प्रथमा बहुवचन में चाहिए और क्रिया भी बहुवचन में — ‘जानन्ति’। श्लोक में छन्द के कारण एकवचन क्रिया ‘जानाति’ आई है (अन्तिम कर्ता ‘धर्मः’ के साथ मेल), किन्तु गद्य में पूरे वाक्य के लिए ‘जानन्ति’ लिखना ही शुद्ध है।
ध्यान दें: श्लोक के सन्धियुक्त पदों को खोलकर लिखिए, वरना उत्तर अशुद्ध हो जाएगा — ‘आदित्यचन्द्रौ’ = आदित्यः + चन्द्रः (द्वन्द्व समास, द्विवचन), ‘द्यौर्भूमिरापः’ = द्यौः + भूमिः + आपः। यह श्लोक इसी पाठ के प्रश्न ५ (क) में भी लौटकर आया है।