शारदा अध्याय 7 अत्र इदम् अवधेयम्

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘नित्यबहुवचनान्तशब्दाः’ के भवन्ति ? पाठे दत्तानाम् उदाहरणानां सूचीं लिखत, तथा च वदत यत् ‘आदित्यचन्द्रावनिलः…’ इति श्लोके कः शब्दः बहुवचने अस्ति, कस्मात् च।
उत्तर

उत्तरम् — ये शब्दाः केवलं बहुवचने एव प्रयुज्यन्ते, एकवचने द्विवचने वा न प्रयुज्यन्ते, ते नित्यबहुवचनान्तशब्दाः कथ्यन्ते। यद्यपि अर्थः एकवचनस्य इव भवति, तथापि रूपं सदा बहुवचनान्तम् एव भवति।

(हिन्दी — जो शब्द सदा बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं, एकवचन या द्विवचन में नहीं, वे ‘नित्यबहुवचनान्त शब्द’ कहलाते हैं। अर्थ भले एक वस्तु का हो, रूप सदा बहुवचन का ही रहेगा।)

क्रमःशब्दःEnglishहिन्दी अर्थ
आपःWaterजल — यही शब्द पाठ के श्लोक में आया है
दाराःWifeपत्नी
लाजाःPuffed Riceखील, लावा
अक्षतानिRice-grainsअक्षत, साबुत चावल
गृहाःWife / Houseघर (पुंलिङ्ग में नित्यबहुवचन)
प्राणाःLife-forceप्राण
असवःLife-forceप्राण, जीवनशक्ति
वर्षाःRainवर्षा
समाःRainवर्षा / वर्ष
१०सिकताःSandबालू, रेत
११कतिHow manyकितने
१२यतिAs manyजितने
१३ततिSo manyउतने
१४त्रि-आरभ्य संख्याःNumbers from three onwardsत्रयः / तिस्रः / त्रीणि, चत्वारः / चतस्रः / चत्वारि, पञ्च, षट् इत्यादि

श्लोक-सम्बन्धी उत्तरम् — ‘आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च’ इति श्लोके आपः इति शब्दः बहुवचने अस्ति; अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः इति शब्दाः तु एकवचने विद्यन्ते। कारणम् — ‘आपः’ नित्यबहुवचनान्तः शब्दः, अतः जलम् एकम् एव सत् अपि तस्य रूपं बहुवचनम् एव भवति।

यह अन्तर क्यों दिखाया गया: श्लोक में सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी — सब एकवचन में हैं, फिर बीच में अचानक ‘आपः’ बहुवचन में आ जाता है। पढ़ते समय विद्यार्थी को लगता है कि यह कोई छन्द की मजबूरी है या छपाई की भूल। पुस्तक यहीं रोककर बताती है कि यह न भूल है न मजबूरी — यह शब्द का अपना स्वभाव है। ‘आपः’ का एकवचन रूप होता ही नहीं। हिन्दी में भी ‘प्राण’ और ‘दर्शन’ ऐसे ही चलते हैं — ‘उसके प्राण निकल गए’, ‘दर्शन हुए’ — एक ही वस्तु, फिर भी बहुवचन।
‘आपः’ के रूप देख लीजिए (स्त्रीलिङ्ग, नित्यबहुवचन): प्रथमा — आपः; द्वितीया — अपः; तृतीया — अद्भिः; चतुर्थी — अद्भ्यः; पञ्चमी — अद्भ्यः; षष्ठी — अपाम्; सप्तमी — अप्सु। इसी ‘अद्भिः’ से ‘अब्धि’ (जल का धारक = समुद्र) तथा ‘अप्सरा’ (अप्सु सरति इति = जल में विचरने वाली) जैसे शब्द बने हैं।
प्र2.
‘प्रहृष्टमनाः पापबुद्धिः’ इत्यत्र विशेष्यपदं विशेषणपदं च किम् ? विशेषण-विशेष्ययोः मध्ये कीदृशः सम्बन्धः भवति ? पाठात् उदाहरणानि दत्त्वा स्पष्टीकुरुत। सर्वनामशब्दाः अपि कथं विशेषणानि भवन्ति ?
उत्तर

उत्तरम् — ‘प्रहृष्टमनाः पापबुद्धिः’ इत्यत्र पापबुद्धिः विशेष्यपदम्, प्रहृष्टमनाः च विशेषणपदम्। विशेषण-विशेष्ययोः मध्ये लिङ्ग-विभक्ति-वचन — इति त्रिविधः सम्बन्धः भवति, अर्थात् विशेषणं सदा विशेष्यस्य लिङ्गं, विभक्तिं वचनं च अनुसरति।

(हिन्दी — यहाँ ‘पापबुद्धि’ विशेष्य है और ‘प्रहृष्टमनाः’ विशेषण। विशेषण और विशेष्य के बीच लिङ्ग, विभक्ति तथा वचन — तीनों का मेल होता है; विशेषण सदा विशेष्य के अनुसार बदलता है।)

पुस्तक की अपनी तालिका (तीन प्रकार के सम्बन्ध) —

उदाहरणम् १उदाहरणम् २कः सम्बन्धःक्या बदला
नूतनं भवनम्नूतनः विद्यालयः(लिङ्ग सम्बन्धः)भवनम् नपुंसकलिङ्ग है तो ‘नूतनम्’, विद्यालयः पुंलिङ्ग है तो ‘नूतनः’
चतुरः बालःचतुराः बालाः(वचन सम्बन्धः)एक बालक → ‘चतुरः’, अनेक बालक → ‘चतुराः’
बुद्धिमती गृहिणीबुद्धिमत्या गृहिण्या(विभक्ति सम्बन्धः)प्रथमा → ‘बुद्धिमती’, तृतीया → ‘बुद्धिमत्या’

सर्वनामशब्दाः अपि विशेषणानि भवन्ति — पुस्तक कहती है : ‘सर्वनामशब्दाः अपि विशेषणानि भवन्ति।’ जब कोई सर्वनाम किसी संज्ञा के साथ जुड़कर आता है, तब वह उस संज्ञा का विशेषण बन जाता है और उसी के लिङ्ग-विभक्ति-वचन में ढल जाता है।

पाठगतम् उदाहरणम्सर्वनाम (विशेषणम्)विशेष्यम्लिङ्ग · विभक्ति · वचन
एतेन धनेनएतेनधनेननपुंसकलिङ्ग · तृतीया · एकवचन
एनं धर्मबुद्धिम्एनम्धर्मबुद्धिम्पुंलिङ्ग · द्वितीया · एकवचन
यः चौरःयःचौरःपुंलिङ्ग · प्रथमा · एकवचन
तस्मिन् वृक्षेतस्मिन्वृक्षेपुंलिङ्ग · सप्तमी · एकवचन
कां कथाम्काम्कथाम्स्त्रीलिङ्ग · द्वितीया · एकवचन
एतत् चौरकर्मएतत्चौरकर्मनपुंसकलिङ्ग · प्रथमा/द्वितीया · एकवचन

पुस्तक की दूसरी तालिका —

एषः पिताएषा माताएतत् मित्रम्
कः समर्थः ?का चतुरा ?किम् उत्तमम् ?
यह नियम व्यवहार में कैसे काम आता है: संस्कृत में शब्दों का क्रम स्वतन्त्र होता है — ‘प्रहृष्टमनाः धर्मबुद्धिः आह’ में विशेषण पहले है, ‘पापबुद्धिः प्रहृष्टमनाः’ भी लिखा जा सकता था। तब पाठक कैसे जाने कि कौन-सा विशेषण किस संज्ञा का है ? उत्तर यही तीन-सूत्री मेल है — जिस संज्ञा से विशेषण का लिङ्ग, विभक्ति और वचन तीनों मिलें, विशेषण उसी का है। इसीलिए अनुवाद करते समय पहले विभक्ति देखिए, अर्थ बाद में।
पाठ से एक कठिन उदाहरण:अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः करुणं विलपन् पापबुद्धिपिता बहिरागतः’ — यहाँ एक ही विशेष्य ‘पापबुद्धिपिता’ (पुंलिङ्ग, प्रथमा, एकवचन) के चार विशेषण हैं और चारों उसी रूप में हैं : अर्धदग्धशरीरः, स्फुटितेक्षणः, विलपन्, बहिरागतः। एक भी विशेषण का लिङ्ग-वचन अलग नहीं — यही संस्कृत वाक्य की कसावट है।
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