शारदा अध्याय 7 सर्वं शब्देन भासते

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘सर्वं शब्देन भासते’ इति तालिकायाः अन्तिमः स्तम्भः — ‘मातृभाषया अर्थं लिखत’ — रिक्तः अस्ति। पाठे प्रयुक्तानां शब्दानाम् अर्थान् ज्ञात्वा तं स्तम्भं पूरयत।
उत्तर

पुस्तक में यह अन्तिम स्तम्भ जान-बूझकर खाली छोड़ा गया है — विद्यार्थी को हर शब्द का अर्थ अपनी मातृभाषा में लिखना है। नीचे की तालिका में वह स्तम्भ हिन्दी (हमारी माध्यम-भाषा) में भर दिया गया है; जिनकी मातृभाषा मराठी, बाङ्ग्ला, गुजराती, तमिऴ, तेलुगु, कन्नड, ओड़िआ या कोई अन्य भारतीय भाषा है, वे इसी अर्थ के आधार पर अपनी भाषा का शब्द रखें।

शब्दःअर्थःहिन्दीEnglishमातृभाषया अर्थम् (भरा हुआ — हिन्दी)
अटव्याम् (स्त्री.स.ए.व.)वनेजंगल मेंIn the forestवन में, घने जंगल के भीतर
अपायम् (पुं.द्वि.ए.व.)विघ्नम्समस्या / संकटProblemआने वाली हानि, अड़चन, विपत्ति
अहनि (अहन्, नपुं.स.ए.व.)दिवसेदिन के समयDuring the dayदिन में, किसी एक दिन
आपः (स्त्री.प्र.ब.व.)जलम्जलWaterपानी (यह शब्द सदा बहुवचन में ही चलता है)
उत्फुल्ललोचनाः (बहुव्रीहिः, पुं.प्र.ब.व.)उत्फुल्लानि लोचनानि येषां तेआश्चर्य से फटी हुई आँखों वालेWith surpriseजिनकी आँखें अचरज से खुली रह गई हों, चकित
खनित्वा (√खन् + क्त्वा)खननं कृत्वाखोद करHaving dugज़मीन खोदकर
द्यौः (स्त्री.प्र.ए.व.)आकाशःआकाशSkyआसमान, अन्तरिक्ष
धरणीपीठे (षष्ठी तत्पुरुषः, नपुं.स.ए.व.)धरण्याः पीठेधरती परOn the earthपृथ्वी के तल पर, इस धरती पर
निक्षिप्य (नि + √क्षिप् + ल्यप्)स्थापयित्वारखकरHaving keptडालकर, गाड़कर, रख देने के बाद
निशीथे (पुं.स.ए.व.)अर्धरात्रेआधी रात मेंAt midnightआधी रात के समय, निशीथ काल में
परिवेष्ट्य (परि + √वेष्ट् + ल्यप्)आवृत्यघेरकरEncirclingचारों ओर से लपेटकर, घेरा बनाकर
प्रहृष्टमनाः (बहुव्रीहिः, पुं.प्र.ब.व)प्रहृष्टं मनः यस्य सःप्रसन्न मन वालाJoyful mindedजिसका मन ख़ुशी से भरा हो, हर्षित
भाण्डम् (नपुं.द्वि.ए.व.)पात्रम्घड़े कोPotबरतन, घड़ा, मटका
यास्यति (√या + लृट्, प्र.पु.ए.व.)गमिष्यतिजाएगाWill goचला जाएगा (भविष्यकाल)
वञ्चयित्वा (√वञ्च् + क्त्वा)वञ्चनं कृत्वाठग करHaving Deceivedधोखा देकर, छलकर
वीक्षन्ते (वि + √ईक्ष्, लट्, प्र.पु.ब.व.)पश्यन्तिदेखते हैंSeeदेखते हैं, दृष्टि रखते हैं
व्रजति (√व्रज्, लट्, प्र.पु.ए.व.)गच्छतिजाता हैHe goesजाता है, यात्रा करता है
लोष्ठवत् (लोष्ठ + वत्)पाषाणखण्डवत्पत्थर के टुकड़े के समानLike a stoneमिट्टी के ढेले जैसा, बेकार
स्फुटितेक्षणः (बहुव्रीहिः, पुं.प्र.ब.व)स्फुटिते ईक्षणे यस्य सःनष्ट हुई आँखों वालाOne with damaged eyesजिसकी आँखें फूट गई हों
नमूना उत्तर (अन्य मातृभाषाओं में) — मराठी: अटव्याम् = ‘रानात’, भाण्डम् = ‘भांडे’, निशीथे = ‘मध्यरात्री’। बाङ्ग्ला: आपः = ‘जल’, द्यौः = ‘आकाश’, वञ्चयित्वा = ‘ठकिये’। गुजराती: खनित्वा = ‘खोदीने’, लोष्ठवत् = ‘माटीना ढेफा जेवुं’। तमिऴ: अटव्याम् = ‘काट्टिल्’, आपः = ‘नीर्’। अपनी भाषा में लिखते समय ध्यान रखिए कि अर्थ वही रहे जो ‘अर्थः’ स्तम्भ में संस्कृत में दिया है।
इस तालिका को पढ़ने का ढंग: यह केवल शब्दकोश नहीं है — कोष्ठक में दी गई सूचना ही असली शिक्षा है। ध्यान दीजिए कि तालिका तीन प्रकार के सङ्केत देती है : (१) विभक्ति-वचन (अटव्याम् — स्त्री.स.ए.व., अर्थात् सप्तमी एकवचन, इसलिए ‘में’), (२) प्रत्यय-विच्छेद (निक्षिप्य = नि + √क्षिप् + ल्यप् — उपसर्ग होने से क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आता है), तथा (३) समास का नाम (उत्फुल्ललोचनाः — बहुव्रीहिः; धरणीपीठे — षष्ठी तत्पुरुषः)। परीक्षा में यही तीनों सूचनाएँ प्रश्न बनकर लौटती हैं।
क्त्वा तथा ल्यप् का नियम एक बार पकड़ लीजिए: धातु से पहले उपसर्ग न हो तो ‘क्त्वा’ लगता है — खन् + क्त्वा = खनित्वा, वञ्च् + क्त्वा = वञ्चयित्वा। धातु से पहले उपसर्ग हो तो ‘क्त्वा’ के स्थान पर ‘ल्यप्’ आता है — नि + क्षिप् = निक्षिप्य, परि + वेष्ट् = परिवेष्ट्य, आ + कर्ण् = आकर्ण्य, स्वी + कृ = स्वीकृत्य। दोनों का अर्थ एक ही है — ‘…करके’।
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