आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥
पदच्छेदः — आदित्य-चन्द्रौ + अनिलः + अनलः + च + द्यौः + भूमिः + आपः + हृदयम् + यमः + च + अहः + च + रात्रिः + च + उभे + च + संध्ये + धर्मः + हि + जानाति + नरस्य + वृत्तम्।
अन्वयः — आदित्यचन्द्रौ, अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः, आपः, हृदयम्, यमः, अहः, रात्रिः, उभे संध्ये, धर्मः च — (एते सर्वे) हि नरस्य वृत्तं जानाति (जानन्ति)।
हिन्दी अर्थ — सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ (प्रातः तथा सायं) और धर्म — ये सब मनुष्य के आचरण को जानते हैं।
भावः — यह साक्षी-श्लोक है, जो भारतीय न्याय-परम्परा में शपथ के समय पढ़ा जाता था। इसका सन्देश एक ही है — कोई कर्म गुप्त नहीं होता। यदि कोई मनुष्य न हो तो भी प्रकृति के तत्त्व और सबसे बढ़कर अपना हृदय साक्षी रहता ही है। सूची का क्रम भी सोचकर रखा गया है : बाहर से भीतर की ओर — पहले आकाश के प्रकाशपिण्ड, फिर पंचमहाभूत, फिर हृदय, फिर यम और अन्त में धर्म।
कथा की विडम्बना: यह श्लोक कथा में पापबुद्धि स्वयं पढ़ता है — वनदेवता के सामने खड़ा होकर, जब उसने अपने पिता को कोटर में झूठी गवाही के लिए बैठा रखा है। जो व्यक्ति सूर्य, अग्नि और धर्म को साक्षी बुलाकर झूठ बोलता है, उसका अन्त कथा में तुरन्त आ जाता है — और वह भी अग्नि के ही हाथों। कथा कहती है कि साक्षी बुलाने से नहीं, सच बोलने से न्याय मिलता है।
सन्धि-विच्छेदः: आदित्यचन्द्रावनिलः = आदित्यचन्द्रौ + अनिलः (औ + अ → आव् — अयादि सन्धि); अनिलोऽनलः = अनिलः + अनलः (विसर्ग + अ → ओ, तथा परवर्ती ‘अ’ का लोप, अवग्रह ‘ऽ’ से सूचित — विसर्गसन्धि/पूर्वरूप); द्यौर्भूमिः = द्यौः + भूमिः (विसर्ग → र्); भूमिरापः = भूमिः + आपः। पुस्तक ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में विशेष रूप से कहती है कि इस श्लोक में अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः एकवचन में हैं, परन्तु ‘आपः’ बहुवचन में — क्योंकि ‘आपः’ नित्यबहुवचनान्त शब्द है।