शारदा अध्याय 7 पाठगताः श्लोकाः

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
प्रथमस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्। भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥”
उत्तर
देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि येन न ज्ञातम्।
भ्रमता धरणीपीठे तस्य फलं जन्मनो व्यर्थम्॥

पदच्छेदः — देश-अन्तरेषु + बहुविध-भाषा-वेष-आदि + येन + न + ज्ञातम् + भ्रमता + धरणी-पीठे + तस्य + फलम् + जन्मनः + व्यर्थम्।

अन्वयः — धरणीपीठे भ्रमता येन देशान्तरेषु बहुविधभाषावेषादि न ज्ञातम्, तस्य जन्मनः फलं व्यर्थम् (अस्ति)।

पदम्शब्दार्थः
देशान्तरेषुअन्येषु देशेषु — दूसरे देशों में (देश + अन्तर = ‘दूसरा देश’)
बहुविधभाषावेषादिबहुविधाः भाषाः वेषाः आदयः च — अनेक प्रकार की भाषा, वेशभूषा आदि
येन न ज्ञातम्यस्य पुरुषेण न ज्ञातम् — जिसने नहीं जाना (भावे/कर्मणि प्रयोगः)
भ्रमताभ्रमन् (शतृ) इत्यस्य तृतीया — घूमते हुए (उसी ‘येन’ का विशेषण)
धरणीपीठेधरण्याः पीठे — पृथ्वी के तल पर, धरती पर
जन्मनः फलम्जन्म लेने का फल, जीवन की उपलब्धि
व्यर्थम्निष्फलम्, निरर्थकम् — बेकार

हिन्दी अर्थ — धरती पर घूमते हुए भी जिस मनुष्य ने दूसरे देशों की अनेक प्रकार की भाषाओं, वेशभूषा आदि को नहीं जाना, उसके जन्म का फल व्यर्थ है।

भावः — यह श्लोक देशाटन की महिमा कहता है। कवि की दृष्टि तीखी है — वह यह नहीं कहता कि ‘जो घर में बैठा रहा, उसका जीवन व्यर्थ’; वह कहता है कि जो घूमा भी (‘भ्रमता’) और फिर भी कुछ न सीखा, उसका जीवन व्यर्थ है। अर्थात् यात्रा का मूल्य दूरी में नहीं, सीख में है। जो दूसरे देश की भाषा और रहन-सहन को समझने की चेष्टा करता है, वही सचमुच यात्रा करता है; शेष तो केवल स्थान बदलते हैं।
कथा में इसका काम: यह श्लोक पापबुद्धि बोलता है — धर्मबुद्धि को परदेश ले जाने के लिए। ध्यान दीजिए, श्लोक सत्य है, पर बोलने वाले की नीयत झूठी है। सच्ची बात भी छल का औज़ार बन सकती है — कथा यहीं से अपना पहला पाठ आरम्भ करती है।
व्याकरण: ‘ज्ञातम्’ भावे प्रयोग में क्त-प्रत्ययान्त है, इसलिए कर्ता ‘येन’ तृतीया में आया — «भावे प्रयोगे कर्तरि तृतीया»। ‘भ्रमता’ = √भ्रम् + शतृ (भ्रमत्) की तृतीया एकवचन; वह ‘येन’ का विशेषण है, इसलिए उसी विभक्ति-वचन में है। ‘धरणीपीठे’ षष्ठी-तत्पुरुष समास है (धरण्याः पीठे) — पुस्तक की शब्दार्थ-तालिका स्वयं यह विग्रह देती है।
प्र2.
द्वितीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक्। यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥”
उत्तर
विद्यां वित्तं शिल्पं तावन्नाप्नोति मानवः सम्यक्।
यावद् व्रजति न भूमौ देशाद्देशान्तरं हृष्टः॥

पदच्छेदः — विद्याम् + वित्तम् + शिल्पम् + तावत् + न + आप्नोति + मानवः + सम्यक् + यावत् + व्रजति + न + भूमौ + देशात् + देश-अन्तरम् + हृष्टः।

अन्वयः — मानवः तावत् विद्यां वित्तं शिल्पं च सम्यक् न आप्नोति, यावत् (सः) हृष्टः (सन्) भूमौ देशात् देशान्तरं न व्रजति।

पदम्शब्दार्थः
विद्याम्ज्ञानम्, शास्त्रज्ञानम् — विद्या
वित्तम्धनम् — धन, सम्पत्ति
शिल्पम्कला, कौशलम् — हुनर, कारीगरी
तावत् … यावत्तब तक … जब तक (नित्यसम्बन्धी अव्ययद्वयम्)
आप्नोतिप्राप्नोति, लभते — पाता है (√आप्, लट्, प्र.पु.ए.व.)
सम्यक्सम्यक् रूपेण, पूर्णतया — भली-भाँति
व्रजतिगच्छति — जाता है (√व्रज्, लट्, प्र.पु.ए.व.)
हृष्टःप्रसन्नः, उत्साहयुक्तः — प्रसन्न होकर, उत्साह से भरा हुआ

हिन्दी अर्थ — मनुष्य विद्या, धन तथा कला (हुनर) को तब तक भली-भाँति नहीं पाता, जब तक वह प्रसन्न मन से पृथ्वी पर एक देश से दूसरे देश की यात्रा नहीं करता।

भावः — पिछला श्लोक कहता था कि बिना सीखे घूमना व्यर्थ है; यह श्लोक उसका दूसरा पहलू कहता है — बिना घूमे सीखना अधूरा है। तीनों वस्तुएँ जो यहाँ गिनाई गई हैं, अनुभव से ही पूरी होती हैं : विद्या तब पकती है जब वह भिन्न परिवेश में परखी जाए, वित्त तब बढ़ता है जब नए बाज़ार मिलें, और शिल्प तब निखरता है जब दूसरे कारीगरों की कारीगरी देखी जाए। ‘हृष्टः’ पद सबसे मार्मिक है — यात्रा विवशता से नहीं, प्रसन्न मन से होनी चाहिए; बोझ की तरह की गई यात्रा कुछ नहीं सिखाती।
व्याकरण-सङ्केत: ‘तावत् … यावत्’ जोड़े में आने वाले अव्यय हैं और वाक्य को दो खण्डों में बाँधते हैं। ‘देशाद्देशान्तरम्’ = देशात् + देशान्तरम् (व्यञ्जनसन्धि — त् + द् → द्द्); ‘देशात्’ में अपादाने पञ्चमी है (जहाँ से चला) और ‘देशान्तरम्’ में कर्मणि द्वितीया (जहाँ पहुँचा)। ‘तावन्नाप्नोति’ = तावत् + न + आप्नोति (त् + न → न्न्, फिर न + आ = ना)।
प्र3.
तृतीयस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्। आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥”
उत्तर
मातृवत्परदारेषु परद्रव्येषु लोष्ठवत्।
आत्मवत्सर्वभूतेषु वीक्षन्ते धर्मबुद्धयः॥

पदच्छेदः — मातृवत् + परदारेषु + परद्रव्येषु + लोष्ठवत् + आत्मवत् + सर्वभूतेषु + वीक्षन्ते + धर्मबुद्धयः।

अन्वयः — धर्मबुद्धयः परदारेषु मातृवत्, परद्रव्येषु लोष्ठवत्, सर्वभूतेषु च आत्मवत् वीक्षन्ते।

पदम्शब्दार्थः
मातृवत्मातुः इव — माता के समान (मातृ + वति प्रत्ययः)
परदारेषुपरेषां दारेषु — दूसरों की स्त्रियों में (‘दाराः’ नित्यबहुवचनान्त शब्द है)
परद्रव्येषुपरेषां द्रव्येषु — दूसरों के धन में
लोष्ठवत्पाषाणखण्डवत् — मिट्टी के ढेले / पत्थर के टुकड़े के समान
आत्मवत्आत्मनः इव — अपने ही समान
सर्वभूतेषुसर्वेषु प्राणिषु — सब प्राणियों में
वीक्षन्तेपश्यन्ति — देखते हैं (वि + √ईक्ष्, लट्, प्र.पु.ब.व., आत्मनेपदी)
धर्मबुद्धयःधार्मिकबुद्धियुक्ताः जनाः — धर्म-बुद्धि वाले लोग

हिन्दी अर्थ — धर्मबुद्धि वाले लोग दूसरों की स्त्रियों को माता के समान देखते हैं, दूसरों के धन को मिट्टी के ढेले के समान देखते हैं, और सब प्राणियों को अपने ही समान देखते हैं।

भावः — यह श्लोक कथा में धर्मबुद्धि का आत्म-प्रमाण है। पापबुद्धि जब उस पर चोरी का आरोप लगाता है, तब वह न गाली देता है, न लड़ता है — वह अपने नाम का अर्थ खोलकर रख देता है : ‘धर्मबुद्धिः खल्वहम्’ (मैं तो धर्मबुद्धि हूँ), और यह श्लोक पढ़ देता है। शब्द-चातुर्य देखिए — जिसका नाम ‘धर्मबुद्धि’ है, वह ‘धर्मबुद्धयः’ की परिभाषा सुनाता है; अर्थात् नाम केवल पहचान नहीं, व्रत है।
पुस्तक के भीतर जोड़िए: इसी शारदा पुस्तक के तृतीय पाठ का शीर्षक ही है — ‘आत्मवत्सर्वभूतेषु यः पश्यति सः पण्डितः’। वह श्लोक इसी श्लोक का दूसरा पाठभेद है (चाणक्यनीति में ‘मातृवत्परदारेषु परद्रव्याणि लोष्टवत्। आत्मवत्सर्वभूतानि यः पश्यति स पण्डितः॥’)। यहाँ ‘पण्डितः’ के स्थान पर ‘धर्मबुद्धयः’ है — क्योंकि कथा का नायक ही धर्मबुद्धि है।
व्याकरण: ‘वत्’ (वति प्रत्यय) से बने पद अव्यय होते हैं — इनका रूप कभी नहीं बदलता : मातृवत्, लोष्ठवत्, आत्मवत्, पुत्रवत्। इनका अर्थ सदा ‘…के समान’ होता है। ‘वीक्षन्ते’ आत्मनेपदी क्रिया है, इसीलिए ‘-न्ते’ अन्त है, ‘-न्ति’ नहीं।
प्र4.
चतुर्थस्य श्लोकस्य पदच्छेदम् अन्वयं शब्दार्थं भावं च लिखत — “आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च। अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥”
उत्तर
आदित्यचन्द्रावनिलोऽनलश्च द्यौर्भूमिरापो हृदयं यमश्च।
अहश्च रात्रिश्च उभे च संध्ये धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्॥

पदच्छेदः — आदित्य-चन्द्रौ + अनिलः + अनलः + च + द्यौः + भूमिः + आपः + हृदयम् + यमः + च + अहः + च + रात्रिः + च + उभे + च + संध्ये + धर्मः + हि + जानाति + नरस्य + वृत्तम्।

अन्वयः — आदित्यचन्द्रौ, अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः, आपः, हृदयम्, यमः, अहः, रात्रिः, उभे संध्ये, धर्मः च — (एते सर्वे) हि नरस्य वृत्तं जानाति (जानन्ति)।

पदम्शब्दार्थःकिसका साक्षी
आदित्यःसूर्यःदिन का प्रत्यक्षदर्शी
चन्द्रःशशीरात का प्रत्यक्षदर्शी
अनिलःपवनः, वायुःजो सर्वत्र पहुँचता है
अनलःअग्निः, वह्निःयज्ञ तथा शपथ का साक्षी
द्यौःआकाशःऊपर से सब देखने वाला
भूमिःपृथिवीनीचे से सब सहने वाली
आपःजलम् (नित्यबहुवचनान्तः शब्दः)जीवन का आधार
हृदयम्अन्तःकरणम्भीतर बैठा सबसे कड़ा गवाह
यमःधर्मराजः, मृत्युदेवःअन्तिम न्यायाधीश
अहः, रात्रिः, उभे संध्येदिवसः, रजनी, प्रातःसन्ध्या सायंसन्ध्या चसमय के चार पहर
धर्मःसनातनः नियमःसबका आधार
वृत्तम्आचरणम्, चरित्रम्जो जाना जा रहा है

हिन्दी अर्थ — सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी, जल, हृदय, यम, दिन, रात, दोनों सन्ध्याएँ (प्रातः तथा सायं) और धर्म — ये सब मनुष्य के आचरण को जानते हैं।

भावः — यह साक्षी-श्लोक है, जो भारतीय न्याय-परम्परा में शपथ के समय पढ़ा जाता था। इसका सन्देश एक ही है — कोई कर्म गुप्त नहीं होता। यदि कोई मनुष्य न हो तो भी प्रकृति के तत्त्व और सबसे बढ़कर अपना हृदय साक्षी रहता ही है। सूची का क्रम भी सोचकर रखा गया है : बाहर से भीतर की ओर — पहले आकाश के प्रकाशपिण्ड, फिर पंचमहाभूत, फिर हृदय, फिर यम और अन्त में धर्म।
कथा की विडम्बना: यह श्लोक कथा में पापबुद्धि स्वयं पढ़ता है — वनदेवता के सामने खड़ा होकर, जब उसने अपने पिता को कोटर में झूठी गवाही के लिए बैठा रखा है। जो व्यक्ति सूर्य, अग्नि और धर्म को साक्षी बुलाकर झूठ बोलता है, उसका अन्त कथा में तुरन्त आ जाता है — और वह भी अग्नि के ही हाथों। कथा कहती है कि साक्षी बुलाने से नहीं, सच बोलने से न्याय मिलता है।
सन्धि-विच्छेदः: आदित्यचन्द्रावनिलः = आदित्यचन्द्रौ + अनिलः (औ + अ → आव् — अयादि सन्धि); अनिलोऽनलः = अनिलः + अनलः (विसर्ग + अ → ओ, तथा परवर्ती ‘अ’ का लोप, अवग्रह ‘ऽ’ से सूचित — विसर्गसन्धि/पूर्वरूप); द्यौर्भूमिः = द्यौः + भूमिः (विसर्ग → र्); भूमिरापः = भूमिः + आपः। पुस्तक ‘अत्र इदम् अवधेयम्’ में विशेष रूप से कहती है कि इस श्लोक में अनिलः, अनलः, द्यौः, भूमिः एकवचन में हैं, परन्तु ‘आपः’ बहुवचन में — क्योंकि ‘आपः’ नित्यबहुवचनान्त शब्द है।
प्र5.
पाठस्य शीर्षकं यस्मात् गृहीतम्, तस्याः सूक्तेः पदच्छेदम् अन्वयं भावं च लिखत — “उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।”
उत्तर
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।

पदच्छेदः — उपायम् + चिन्तयेत् + प्राज्ञः + तथा + अपायम् + च + चिन्तयेत्।

अन्वयः — प्राज्ञः उपायं चिन्तयेत्, तथा अपायं च चिन्तयेत्।

पदम्शब्दार्थः
उपायम्साधनम्, युक्तिम् — काम बनाने का ढंग, तरकीब
अपायम्विघ्नम् — उससे आने वाली हानि, संकट, समस्या
प्राज्ञःबुद्धिमान्, विवेकी — समझदार व्यक्ति
चिन्तयेत्विचारयेत् — सोचना चाहिए (√चिन्त् + णिच्, विधिलिङ् लकार, प्र.पु.ए.व.)

हिन्दी अर्थ — बुद्धिमान् मनुष्य को (काम बनाने का) उपाय सोचना चाहिए, और साथ ही उस उपाय से आने वाली हानि भी सोचनी चाहिए।

भावः — यही पूरे पाठ की एक-पंक्ति है। ‘उपाय’ और ‘अपाय’ शब्दों की जोड़ी देखिए — दोनों में मूल एक ही है (√इ = जाना), केवल उपसर्ग बदला है : उप + आय = पास ले जाने वाला मार्ग, अप + आय = दूर ले जाने वाला मार्ग, हानि। कवि कहता है कि हर उपाय के साथ एक अपाय छिपा रहता है; प्राज्ञ वही है जो दोनों को एक साथ सोचे। पापबुद्धि ने उपाय बहुत सोचा — गड्ढा, गवाही, पिता को कोटर में बैठाना — पर अपाय एक बार भी नहीं सोचा कि यदि कोटर जला दिया गया तो ? इसी एक चूक ने उसका सब कुछ ले लिया।
मूल श्लोक पूरा जानिए: पुस्तक ने केवल पूर्वार्ध दिया है। पञ्चतन्त्र में यह श्लोक पूरा इस प्रकार है —
उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्। पश्यतो बकमूर्खस्य नकुलेन हता बकाः॥
अर्थात् — ‘उस मूर्ख बगुले के देखते-देखते ही नेवले ने सब बगुलों को मार डाला।’ उत्तरार्ध पञ्चतन्त्र की एक दूसरी उपकथा की ओर सङ्केत करता है : साँप से बचने के लिए एक बगुले ने नेवले को बुलाने का उपाय किया; साँप तो मरा, पर नेवले ने बगुले के बच्चों को भी खा लिया — क्योंकि उपाय तो सोचा गया था, अपाय नहीं। यही उदाहरण इस सूक्ति को अमर बनाता है।
व्याकरण: चिन्तयेत् — विधिलिङ् लकार का रूप है, जो ‘चाहिए / उचित है’ का भाव देता है (जैसे पठेत् = पढ़ना चाहिए, कुर्यात् = करना चाहिए)। सन्धि — प्राज्ञस्तथा = प्राज्ञः + तथा (विसर्गसन्धि — विसर्ग का ‘स्’, क्योंकि आगे ‘त्’ है); तथापायम् = तथा + अपायम् (आ + अ = आ, दीर्घ सन्धि)।
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