शारदा अध्याय 7 कथा

अद्यतन2026-09-06

प्र1.
‘उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्’ इति पाठस्य कथां स्वशब्देषु संस्कृतेन संक्षेपेण लिखत।
उत्तर

कथासारः (संस्कृतेन) —

कस्मिंश्चिद् देशे धर्मबुद्धिः पापबुद्धिश्च द्वे मित्रे प्रतिवसतः स्म।
पापबुद्धिः अचिन्तयत् — ‘अहं मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च। अतः एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य देशान्तरं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि’ इति।
सः धर्मबुद्धिं देशाटनस्य महत्त्वं बोधयति। तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।
पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्।
प्रत्यागमनकाले पापबुद्धेः वचनेन तौ सर्वं धनं गहनारण्ये भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रम् आदाय गृहं गतवन्तौ।
अनन्तरं पापबुद्धिः निशीथे एकाकी अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।
कतिचिद् दिनानन्तरं द्वावपि तत्र गत्वा यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।
पापबुद्धिः शिरः ताडयन् धर्मबुद्धिम् एव चौरम् अवदत्, राजकुले निवेदनस्य भयं च दर्शितवान्।
विवदमानौ तौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ। साक्षिणः अभावात् धर्माधिकारी वनदेवतायाः न्यायनिर्णयं निश्चितवान्।
पापबुद्धिः स्वपितरं शमीवृक्षस्य महाकोटरे निगूह्य मिथ्यासाक्ष्यं दापितवान्।
धर्मबुद्धिः तत् कोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालितवान्। अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः पापबुद्धेः पिता बहिरागत्य सत्यम् उक्त्वा मृतः।
राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च।
सर्वे जनाः अवदन् — ‘पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधूक्तम् — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।

(हिन्दी सारांश —) किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। पापबुद्धि ने सोचा — ‘मैं मूर्ख भी हूँ और दरिद्रता से पीड़ित भी; इसलिए इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर परदेश जाता हूँ, वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा और फिर इसे ठगकर सुखी हो जाऊँगा।’ उसने धर्मबुद्धि को देशाटन का महत्त्व समझाया और दोनों गुरुजनों की अनुमति लेकर शुभ दिन परदेश चले गए। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से बहुत धन कमाया। लौटते समय पापबुद्धि के कहने पर दोनों ने सारा धन घने जंगल में ज़मीन में गाड़ दिया और थोड़ा-सा लेकर घर आ गए। बाद में पापबुद्धि आधी रात में अकेला जंगल जाकर सारा धन निकाल लाया और गड्ढा भर दिया। कुछ दिन बाद दोनों गए और खोदने पर घड़ा खाली मिला। पापबुद्धि सिर पीटता हुआ धर्मबुद्धि को ही चोर कहने लगा और राजकुल में शिकायत की धमकी दी। झगड़ते हुए दोनों धर्माधिकारी के पास पहुँचे। कोई साक्षी न होने से धर्माधिकारी ने वनदेवता से निर्णय कराना तय किया। पापबुद्धि ने अपने पिता को शमी वृक्ष के बड़े कोटर में छिपाकर झूठी गवाही दिलवाई। धर्मबुद्धि ने कोटर को जलने वाली वस्तुओं से घेरकर आग लगा दी; आधा जला, फटी आँखों वाला पापबुद्धि का पिता बाहर निकला, सच बताकर मर गया। राजपुरुषों ने पापबुद्धि को दण्ड दिया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की। सब लोग बोले — ‘पापबुद्धि के व्यर्थ पाण्डित्य से उसका पिता आग से मारा गया। इसलिए ठीक ही कहा गया है — बुद्धिमान् उपाय सोचे, साथ ही उसकी हानि भी सोचे।’

कथा की रचना-कुशलता: ध्यान दीजिए कि कथा में दण्ड बाहर से नहीं आता। पापबुद्धि को किसी देवता ने नहीं पकड़ा — उसकी अपनी चाल ने उसे पकड़ा। जिस कोटर में उसने पिता को छिपाया, वही चिता बन गया; जिस झूठ को उसने ‘पक्का सबूत’ समझा, वही उसका सबसे बड़ा गवाह बन गया। यही ‘अपाय’ है जिसे वह सोचना भूल गया था।
ध्यान दें: कथा का यह अंश नाट्य-शैली में है, इसलिए कोष्ठकों में रङ्ग-सङ्केत (stage directions) आते हैं — ‘(तथा करोति)’, ‘(इत्युक्त्वा मृतः)’, ‘(साश्चर्यम्)’, ‘(यदा तौ स्वनगरसमीपमागतवन्तौ तदा)’। उत्तर लिखते समय इन्हें संवाद के साथ मत मिलाइए; ये पात्र के कार्य बताते हैं, उसका कथन नहीं।
प्र2.
कथायाः पात्राणां परिचयं दत्त्वा तेषां चरित्रं विश्लेषयत। ‘पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यम्’ इत्यस्य कः आशयः ?
उत्तर

उत्तरम् — कथायां पञ्च पात्राणि सन्ति — धर्मबुद्धिः, पापबुद्धिः, पापबुद्धेः पिता, धर्माधिकारी, सर्वे जनाः (सामाजिकाः) च।

पात्रम्कः / काचरित्रस्य विशेषतापाठात् प्रमाणम्
धर्मबुद्धिःकथायाः नायकः, पापबुद्धेः मित्रम्सत्यनिष्ठः, विश्वासपात्रः, बुद्धिमान् — किन्तु दुष्टं मित्रं पर्यन्तं न परीक्षितवान्‘धर्मबुद्धिः खल्वहम्। नैतत् चौरकर्म करोमि।’
पापबुद्धिःकथायाः खलनायकःलोभी, कपटी, आत्मनिन्दकः अपि (‘अहं मूर्खः’), किन्तु चातुर्येण गर्वितः‘एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि इति।’
पापबुद्धेः पितावृद्धः जनकःपुत्रस्नेहेन अन्धः; अधर्मे सहायकः बनकर स्वयं नष्टः; अन्ते सत्यवादी‘एतत् सर्वमपि पापबुद्धेः चेष्टितम्। (इत्युक्त्वा मृतः)’
धर्माधिकारीन्यायाधीशःविवेकी — साक्ष्यं विना निर्णयं न करोति, प्रचलितां प्रथाम् आश्रयति‘यत्र मानुषप्रमाणम् अनुपलब्धं तत्र वनदेवता एव न्यायनिर्णयं करिष्यति।’
सर्वे जनाःसामाजिकाःसमाजस्य विवेकः — प्रथमं भ्रान्ताः, अन्ते सत्यं ज्ञात्वा नीतिं घोषयन्ति‘अतः साधूक्तम् — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।’

‘व्यर्थपाण्डित्यम्’ इत्यस्य आशयः — यत् पाण्डित्यं केवलं कपटाय प्रयुज्यते, यस्य परिणामः पूर्वं न विचारितः, तत् पाण्डित्यं व्यर्थम् एव, प्रत्युत विनाशकम्।

(हिन्दी — ‘व्यर्थ पाण्डित्य’ का अर्थ है वह चतुराई जो केवल छल के लिए लगाई जाए और जिसका परिणाम पहले न सोचा जाए। ऐसी चतुराई बेकार ही नहीं, नाश करने वाली होती है।)

कथा की सबसे तीखी विडम्बना: पूरे न्याय-प्रसंग में ‘धर्मो हि जानाति नरस्य वृत्तम्’ वाला पवित्र साक्षी-श्लोक पापबुद्धि स्वयं पढ़ता है — और उसी साँस में झूठी गवाही की व्यवस्था कर चुका होता है। जो व्यक्ति सूर्य, चन्द्र, अग्नि, आकाश और धर्म को साक्षी बुलाकर झूठ बोलता है, वह किसी बाहरी दण्ड की प्रतीक्षा नहीं करता — वह पहले ही अपना दण्ड बुला चुका होता है। पुस्तक इसी को ‘व्यर्थपाण्डित्य’ कहती है।
तुलना करके देखिए: धर्मबुद्धि भी उपाय ही करता है — कोटर जलाने का। किन्तु उसका उपाय सत्य को प्रकट करने के लिए है, छिपाने के लिए नहीं; इसीलिए वह सफल होता है और सब उसकी प्रशंसा करते हैं। दोनों बुद्धि लगाते हैं; अन्तर बुद्धि की मात्रा में नहीं, उसकी दिशा में है।
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