कथासारः (संस्कृतेन) —
पापबुद्धिः अचिन्तयत् — ‘अहं मूर्खः दरिद्रतया पीडितश्च। अतः एनं धर्मबुद्धिं स्वीकृत्य देशान्तरं गच्छामि, तत्र अस्य आश्रयणेन धनं सम्पादयामि, अनन्तरम् एनमपि वञ्चयित्वा सुखी भवामि’ इति।
सः धर्मबुद्धिं देशाटनस्य महत्त्वं बोधयति। तौ गुरुजनानाम् अनुमतिं प्राप्य शुभेऽहनि देशान्तरं प्रस्थितौ।
पापबुद्धिः धर्मबुद्धेः प्रभावेण प्रभूतं धनं सम्पादितवान्।
प्रत्यागमनकाले पापबुद्धेः वचनेन तौ सर्वं धनं गहनारण्ये भूमौ निक्षिप्य किञ्चिन्मात्रम् आदाय गृहं गतवन्तौ।
अनन्तरं पापबुद्धिः निशीथे एकाकी अटव्यां गत्वा तत्सर्वं वित्तं समादाय गर्तं पूरयित्वा स्वभवनं गतवान्।
कतिचिद् दिनानन्तरं द्वावपि तत्र गत्वा यावत् खनतः तावद् रिक्तं भाण्डं दृष्टवन्तौ।
पापबुद्धिः शिरः ताडयन् धर्मबुद्धिम् एव चौरम् अवदत्, राजकुले निवेदनस्य भयं च दर्शितवान्।
विवदमानौ तौ धर्माधिकारिणं निकषा गतौ। साक्षिणः अभावात् धर्माधिकारी वनदेवतायाः न्यायनिर्णयं निश्चितवान्।
पापबुद्धिः स्वपितरं शमीवृक्षस्य महाकोटरे निगूह्य मिथ्यासाक्ष्यं दापितवान्।
धर्मबुद्धिः तत् कोटरं वह्निभोज्यद्रव्यैः परिवेष्ट्य वह्निना प्रज्वालितवान्। अर्धदग्धशरीरः स्फुटितेक्षणः पापबुद्धेः पिता बहिरागत्य सत्यम् उक्त्वा मृतः।
राजपुरुषाः पापबुद्धिं दण्डितवन्तः धर्मबुद्धिं प्रशंसितवन्तः च।
सर्वे जनाः अवदन् — ‘पापबुद्धेः व्यर्थपाण्डित्यात् पिता वह्निना घातितः। अतः साधूक्तम् — उपायं चिन्तयेत् प्राज्ञस्तथापायं च चिन्तयेत्।’
(हिन्दी सारांश —) किसी देश में धर्मबुद्धि और पापबुद्धि नाम के दो मित्र रहते थे। पापबुद्धि ने सोचा — ‘मैं मूर्ख भी हूँ और दरिद्रता से पीड़ित भी; इसलिए इस धर्मबुद्धि को साथ लेकर परदेश जाता हूँ, वहाँ इसके सहारे धन कमाऊँगा और फिर इसे ठगकर सुखी हो जाऊँगा।’ उसने धर्मबुद्धि को देशाटन का महत्त्व समझाया और दोनों गुरुजनों की अनुमति लेकर शुभ दिन परदेश चले गए। पापबुद्धि ने धर्मबुद्धि के प्रभाव से बहुत धन कमाया। लौटते समय पापबुद्धि के कहने पर दोनों ने सारा धन घने जंगल में ज़मीन में गाड़ दिया और थोड़ा-सा लेकर घर आ गए। बाद में पापबुद्धि आधी रात में अकेला जंगल जाकर सारा धन निकाल लाया और गड्ढा भर दिया। कुछ दिन बाद दोनों गए और खोदने पर घड़ा खाली मिला। पापबुद्धि सिर पीटता हुआ धर्मबुद्धि को ही चोर कहने लगा और राजकुल में शिकायत की धमकी दी। झगड़ते हुए दोनों धर्माधिकारी के पास पहुँचे। कोई साक्षी न होने से धर्माधिकारी ने वनदेवता से निर्णय कराना तय किया। पापबुद्धि ने अपने पिता को शमी वृक्ष के बड़े कोटर में छिपाकर झूठी गवाही दिलवाई। धर्मबुद्धि ने कोटर को जलने वाली वस्तुओं से घेरकर आग लगा दी; आधा जला, फटी आँखों वाला पापबुद्धि का पिता बाहर निकला, सच बताकर मर गया। राजपुरुषों ने पापबुद्धि को दण्ड दिया और धर्मबुद्धि की प्रशंसा की। सब लोग बोले — ‘पापबुद्धि के व्यर्थ पाण्डित्य से उसका पिता आग से मारा गया। इसलिए ठीक ही कहा गया है — बुद्धिमान् उपाय सोचे, साथ ही उसकी हानि भी सोचे।’