चित्रगतः संवादः —
पुत्रः — मातः! पश्यतु, अद्य अहं मार्गे पतितं धनं प्राप्तवान्। एतेन धनेन बहूनि क्रीडनकानि क्रीणामि।
माता — न हि पुत्र! एतत् अन्यस्य श्रमार्जितं धनमस्ति, तस्मै एव प्रत्यर्पणीयम्। अन्यस्य धनं तृणम् इव गणनीयम्।
पुत्रः — मातः! अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति ?
माता — एहि पुत्र! अहं तुभ्यं पञ्चतन्त्रस्य काञ्चन कथां श्रावयामि यया त्वं स्वप्रश्नस्य उत्तरं प्राप्तुं शक्नोषि।
पुत्रः — मातः! तर्हि कृपया सत्वरं श्रावयतु।
(हिन्दी — पुत्र: माँ! देखिए, आज मुझे रास्ते में गिरा हुआ धन मिला है। इस धन से मैं बहुत-से खिलौने खरीदूँगा। माँ: नहीं बेटा! यह किसी दूसरे का परिश्रम से कमाया हुआ धन है, उसी को लौटा देना चाहिए। दूसरे का धन तिनके के समान गिनना चाहिए। पुत्र: माँ! दूसरे का धन तिनके के समान कैसे होता है ? माँ: आओ बेटा! मैं तुम्हें पञ्चतन्त्र की एक कथा सुनाती हूँ, जिससे तुम अपने प्रश्न का उत्तर पा सकोगे। पुत्र: माँ! तो कृपया शीघ्र सुनाइए।)
आशयः — यह संवाद पूरे पाठ की कुंजी है। ध्यान दीजिए, माता ने बालक को उपदेश देकर चुप नहीं कराया। बालक ने प्रश्न पूछा — ‘अन्यस्य धनं तृणम् इव कथं भवति ?’ — और माता ने उत्तर में कथा दी। यही भारतीय शिक्षण-परम्परा की विधि है : सिद्धान्त पहले नहीं, कथा पहले; निष्कर्ष विद्यार्थी स्वयं निकाले। इसीलिए पूरा पाठ एक ही प्रश्न का उत्तर है, और अन्त में जब पापबुद्धि दूसरे का धन हड़पने के कारण नष्ट होता है, तब बालक को उत्तर मिल जाता है — पराया धन तिनका इसलिए है कि वह टिकता नहीं, और जो उसे पकड़ता है उसे ही जला देता है।
व्याकरण-सङ्केत: ‘प्रत्यर्पणीयम्’, ‘गणनीयम्’ — दोनों अनीयर् प्रत्ययान्त कृदन्त हैं, अर्थात् ‘लौटाया जाना चाहिए’, ‘गिना जाना चाहिए’ — इनमें विधि/कर्तव्य का भाव है (कर्मवाच्य)। ‘श्रावयामि’ णिजन्त रूप है — √श्रु (सुनना) + णिच् = श्रावयति (सुनाना)। ‘पश्यतु’, ‘श्रावयतु’ — लोट् लकार, प्रथमपुरुष एकवचन; माता के लिए आदरसूचक प्रयोग।