कक्षा ९ संस्कृत अध्याय 6 मनःपूतं समाचरेत् के लिए एनसीईआरटी समाधान
अद्यतन 2026-09-19
इस अध्याय के बारे में
पाठ-परिचय — पाठ का शीर्षक ही उसका सार है — ‘ मनःपूतं समाचरेत् ’ अर्थात् ‘जो मन से पवित्र हो, वही आचरण करो’। यह वाक्य मनुस्मृति के पहले ही श्लोक से लिया गया है। आरम्भ में एक चित्रकथा है : आचार्या पूछती हैं कि कोई काम करना हो तो सबसे पहले क्या आवश्यक है? छात्र उत्तर देते हैं — विचिन्त्य कार्यकरणम्, उचितविधिना कार्यकरणम्, पूर्णमनसा कार्यकरणम्। आचार्या तब मूल बात कहती हैं — ‘यदि मनः एव मलिनं स्यात्, उद्देश्यम् एव अनुचितं स्यात्, तर्हि किमपि कार्यं सम्यक् कथं भवेत्?’ इसी प्रश्न का उत्तर पाठ के आठ सुभाषित देते हैं। विधा तथा स्रोत — यह सुभाषित-सङ्कलन है; इसका कोई एक रचयिता नहीं। आठ श्लोक आठ अलग-अलग परम्पराओं से आए हैं — धर्मशास्त्र (मनुस्मृति २), दर्शन-उपदेश (गीता), सुभाषित-सङ्ग्रह (सुभाषितरत्नभाण्डागारः), नीति-काव्य (नीतिशतकम्), कथा-साहित्य (पञ्चतन्त्रम्), रूपक (मालविकाग्निमित्रम्) तथा महाकाव्य
त्वरित पुनरावृत्ति
| शब्दः | अर्थः (संस्कृतम्) | हिन्दी अर्थ | पाठ का वाक्य / श्लोक |
|---|---|---|---|
| पूतम् (√पू + क्त) | शुद्धम् | शुद्ध, पवित्र किया हुआ | दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम् (श्लोक १) |
| न्यसेत् (नि + √अस्, विधिलिङ्) | स्थापयेत् | रखे | दृष्टिपूतं न्यसेत् पादम् (श्लोक १) |
| शौचम् (नपुं.) | शुचेः भावः, पावित्र्यम् | पवित्रता | शौचमिन्द्रियनिग्रहः (श्लोक २) |
| दमः (पुं.) | इन्द्रियाणां मनसः च नियन्त्रणम् | इन्द्रिय एवं मन को वश में करना | धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् (श्लोक २) |
| अस्तेयम् (नञ्-तत्पुरुषः) | न स्तेयम् | चोरी न करना | धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयम् (श्लोक २) |
| अनुवर्तते (अनु + √वृत्) | अनुसरति | अनुसरण करता है | लोकस्तदनुवर्तते (श्लोक ३) |
| नीचैः | अधमजनैः | अधम लोगों द्वारा | प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः (श्लोक ५) |
| विघ्नविहताः (तृतीया-तत्पुरुषः) | विघ्नैः विहताः | विघ्नों से आहत | विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः (श्लोक ५) |
| प्रतिहन्यमानाः (प्रति + √हन् + यक् शानच्) | बाधिताः | बार-बार रोके जाने पर भी | विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः (श्लोक ५) |
| उद्योगिनम् (पुं.द्वि.ए.व.) | उद्योगः अस्य अस्ति इति, तम् | प्रयत्न करने वाले को | उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः (श्लोक ६) |
| कापुरुषाः (कर्मधारयसमासः) | कुत्सिताः पुरुषाः | कायर, अधम पुरुष | दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति (श्लोक ६) |
| निहत्य (नि + √हन् + ल्यप्) | अतिक्रम्य | अतिक्रमण करके, हराकर | दैवं निहत्य कुरु पौरुषम् (श्लोक ६) |
| अवद्यम् (नञ्-तत्पुरुषः, न+वद्+यत्) | न वद्यम् | निम्नस्तरीय, निन्दनीय | काव्यं नवमित्यवद्यम् (श्लोक ७) |
| परप्रत्ययनेयबुद्धिः (बहुव्रीहिः) | परप्रत्ययेन नेया बुद्धिः यस्य सः | जिसकी बुद्धि दूसरों के भरोसे चलती हो | मूढः परप्रत्ययनेयबुद्धिः (श्लोक ७) |
| विदधीत (वि + √धा, विधिलिङ्) | कुर्यात् | करना चाहिए | सहसा विदधीत न क्रियाम् (श्लोक ८) |
| विमृश्यकारिणम् (पुं.द्वि.ए.व.) | यः चिन्तयित्वा कार्यं करोति, तम् | सोच-विचारकर काम करने वाले को | वृणते हि विमृश्यकारिणम् (श्लोक ८) |
| गुणलुब्धाः (सप्तमीतत्पुरुषः) | गुणेषु लुब्धाः, गुणानाम् अभिलाषिणः | गुणों की चाह रखने वाली | गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः (श्लोक ८) |
| सम्पदः (स्त्री.प्र.ब.व.) | ऐश्वर्यम् | सम्पत्तियाँ | गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः (श्लोक ८) |
अभ्यास
- पाठ-प्रस्तावना
- सुभाषितानि
- सर्वं शब्देन भासते
- अत्र इदम् अवधेयम् (श्लोकानाम् अन्वयः)
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- अभ्यासाद् जायते सिद्धिः
- स्वाध्यायान्मा प्रमदः
- यस्तु क्रियावान् मनुजः स विद्वान्